कांग्रेस के गठन से झंडे और पंजे तक... वो हिस्ट्री जिसे पीएम मोदी ने बताया 'चोरी'

अव‍िश्वास प्रस्ताव पर बोलते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने विपक्षी दल पर चहुंतरफे हमले किए. उन्होंने कांग्रेस के इतिहास को बताते हुए कहा कि इस दल ने हमेशा पार्टी के नाम से लेकर चुनाव चिह्न तक सब हमेशा चोरी किया. जानिए- जिस पार्टी पर पीएम मोदी ने ये आरोप लगाया, उसका इतिहास क्या है.

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लोकसभा में पीएम नरेंद्र मोदी लोकसभा में पीएम नरेंद्र मोदी

aajtak.in

  • नई दिल्ली ,
  • 10 अगस्त 2023,
  • अपडेटेड 8:41 PM IST

संसद में व‍िपक्षी पार्टी पर हमला बोलते हुए प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने कहा कि 1885 बनी कांग्रेस के संस्थापक एक विदेशी थे. कांग्रेस ने जब देश के राष्ट्रीय ध्वज के प्रति लोगों का स्नेह और विश्वास देखा तो कांग्रेस ने 1920 में देश का झंडा चुराकर अपनी पार्टी का ध्वज बना लिया. यही नहीं वोटर को लुभाने के लिए गांधी नाम चुरा लिया. 

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इनके चुनाव चिह्न हमेशा दो बैल, गाय बछड़ा फिर पंजा कहीं न कहीं से चुराए गए हैं. इनकी सत्ता हमेशा एक परिवार के हाथों में केंद्रित रही. ऐसे तमाम आरोपों के बीच आइए जानते हैं कि 138 साल पुरानी पार्टी और मुख्य विपक्षी दल का इतिहास क्या रहा है. 

इस वायसराय ने रखी थी नींव 
कांग्रेस पार्टी का इतिहास आजादी के पूरे संघर्ष से जुड़ा हुआ है. साल 1885 में इसके गठन का श्रेय एलन ऑक्टेवियन ह्यूम को जाता है. ऐलन ह्यूम इस प्लानिंग के आर्किटेक्ट थे. दिमाग था वायसराय लॉर्ड डफरिन का. ह्यूम सिविल सर्विस में रह चुके थे. तीक्ष्ण बुद्ध‍ि के कहे जाने वाले इस वायसराय ने नींव रखी कांग्रेस की.

बता दें कि देश की आजादी के संघर्ष से जुड़े सबसे मशहूर और जाने-माने लोग इसी कांग्रेस का हिस्सा थे. गांधी-नेहरू से लेकर सरदार पटेल और राजेंद्र प्रसाद तक आजादी की लड़ाई में आम हिंदुस्तानियों की नुमाइंदगी करने वाली पार्टी ने देश को एकता के सूत्र में बांधने की कोशिश की थी.

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इटावा के कलेक्टर थे ह्यूम 
एलेन ओक्टेवियन ह्यूम 1857 के गदर के वक्त इटावा के कलेक्टर थे. ह्यूम ने खुद ब्रटिश सरकार के खिलाफ आवाज उठाई और 1882 में पद से अवकाश लेकर कांग्रेस यूनियन का गठन किया. उन्हीं की अगुआई में बॉम्बे में पार्टी की पहली बैठक हुई थी. व्योमेश चंद्र बनर्जी इसके पहले अध्यक्ष बने. शुरुआती वर्षों में कांग्रेस पार्टी ने ब्रिटिश सरकार के साथ मिलकर भारत की समस्याओं को दूर करने की कोशिश की और इसने प्रांतीय विधायिकाओं में हिस्सा भी लिया लेकिन 1905 में बंगाल के विभाजन के बाद पार्टी का रुख कड़ा हुआ और अंग्रेजी हुकूमत के खि‍लाफ आंदोलन शुरू हुए.


देखिए अविश्वास प्रस्ताव पर बहस की पूरी कवरेज
 

1905 तक कांग्रेस क्या करती है, क्या नहीं, ये कोई मुद्दा नहीं था. जैसे आज के रोटरी क्लब होते हैं, वैसा ही तब कांग्रेस का हाल था. दादाभाई नौरोजी और बदरुद्दीन तैयबजी जैसे नेता इसके साथ आ गए थे. मगर जनता के बीच इसका कोई असर नहीं था. तब कांग्रेस याचिकाएं देने में व्यस्त रहती थी. आवेदन पार्टी टाइप समझ लीजिए. अंग्रेजों से कृपा मांगने का अंदाज था उसका. फिर हुआ बंगाल विभाजन. कर्जन था वायसराय तब. उसने बंगाल को दो हिस्सों में बांटने का ऐलान किया. कांग्रेस ने पहली बार बगावती अंदाज दिखाया.

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आजादी के बाद 1952 में देश के पहले चुनाव में कांग्रेस सत्ता में आई. 1977 तक देश पर केवल कांग्रेस का शासन था. इस साल हुए चुनाव में जनता पार्टी ने कांग्रेस की कुर्सी छीन ली. हालांकि तीन साल के अंदर ही 1980 में कांग्रेस वापस गद्दी पर काबिज हो गई. 1989 में कांग्रेस को फिर हार का सामना करना पड़ा. लेकिन 1991, 2004, 2009 में कांग्रेस ने दूसरी पार्टियों के साथ मिलकर केंद्र की सत्ता हासिल की.

आजादी के बाद कांग्रेस कई बार विभाजित हुई. करीब 50 नई पार्टियां इस संगठन से निकल कर बनीं. इनमें से कई निष्क्रिय हो गए तो कईयों का INC और जनता पार्टी में विलय हो गया. कांग्रेस का सबसे बड़ा विभाजन 1967 में हुआ जब इंदिरा गांधी ने अपनी अलग पार्टी बनाई जिसका नाम INC (R) रखा. 1971 के चुनाव के बाद चुनाव आयोग ने इसका नाम INC कर दिया.

इन दो थ्योरीज की होती है चर्चा 
बता दें कि कांग्रेस की स्थापना के पीछे `सेफ़्टी वॉल्व` और `सेफ़्टी वॉल` नाम से दो थ्योरीज़ दी जाती हैं. बता दें कि साल 1916 में यंग इंडिया में प्रकाशित एक लेख में स्वतंत्रता सेनानी लाला लाजपत राय ने कहा था कि 1885 में रिटायर्ड अंग्रेज अफसर ए.ओ. ह्यूम के नेतृत्व में इंडियन नेशनल कांग्रेस की स्थापना 'सेफ्टी वॉल्व थ्योरी' के तहत की गई थी. इसका अर्थ यह था कि इस साल कांग्रेस की स्थापना भारत में बढ़ रहे राजनीतिक असंतोष को संतुलित करने के लिए की गई थी. 

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इस तरह कांग्रेस में होता है संगठन का काम
ऑल इंडिया कांग्रेस कमिटी (AICC): राष्ट्रीय स्तर पर पार्टी का काम देखना एआईसीसी की जिम्मेदारी होती है. राष्ट्रीय अध्यक्ष और उपाध्यक्ष के अलावा पार्टी के महासचिव, खजांची, पार्टी की अनुशासन समिती के सदस्य और राज्यों के प्रभारी इसके सदस्य होते हैं.

प्रदेश कांग्रेस कमिटी (PCC): हर राज्य में कांग्रेस की ईकाई है जिसका काम स्थानीय और राज्य स्तर पर पार्टी के कामकाज को देखना होता है.

कांग्रेस संसदीय दल (CPP): राज्यसभा और लोकसभा में पार्टी के सांसद संसदीय दल का हिस्सा होते हैं.

कांग्रेस विधायक दल (CLP): राज्य स्तरीय इस ईकाई में राज्य की विधानसभा में पार्टी विधायक सीएलपी के सदस्य होते हैं. अगर किसी राज्य में कांग्रेस की सरकार है तो वहां का मुख्यमंत्री ही विधायक दल का नेता होता है.

युवाओं, छात्रों, महिलाओं, व्यापारियों के लिए पार्टी की अलग अलग विंग है- छात्रों के लिए नेशनल स्टूडेंट यूनियन ऑफ इंडिया (NSUI), युवाओं के लिए इंडियन यूथ कांग्रेस (IYC) है.

पंडित जवाहरलाल नेहरू ने 9 सितंबर 1938 में 'नेशनल हेराल्ड' नाम से एक अखबार निकाला था. इसे नेहरू के मुखपत्र के तौर पर देखा गया. पैसों की कमी के चलते साल 2008 में इसका प्रकाशन बंद कर दिया गया.

कैसे तिरंगा बना पार्टी की पहचान 
साल 1921 में भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस ने सबसे पहले दो रंग के एक झंडे को अनौपचारिक झंडे के तौर पर अपनी पार्टी की पहचान से जोड़ा था. बताया जाता है कि इस झंडे का ड्राफ्ट डिजाइन युवा स्वतंत्रता सेनानी पिंगली वेंकैया ने 1921 में कांग्रेस के विजयवाड़ा में हुए अधिवेशन में महात्मा गांधी के सामने पेश किया था. इस झंडे में लाल और हरा रंग था, जो भारत के दो प्रमुख धर्मों का प्रतिनिधित्व करता था. पिंगली झंडे के जिस डिजाइन को लेकर गांधी जी के पास गए, उसमें उन्होंने झंडे में एक सफेद रंग और चरखे को भी लगाने की सलाह दी. सफेद रंग भारत के बाकी धर्मों और चरखा स्वदेशी आंदोलन और आत्मनिर्भर होने का प्रतिनिधित्व करता था. इस पर कई विवाद भी हुए लेकिन फिर इसमें लाल की जगह केसरिया रंग लेकर इसे पार्टी ने 1931 में मान्यता दे दी. 

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कई बार बदला चुनाव चिह्न 
देश को आजादी मिलने के बाद कांग्रेस का चुनाव चिह्न कई बार बदल चुका है. 1950 में चुनाव आयोग ने कांग्रेस को दो बैलों की जोड़ी चुनाव चिह्न दिया था. 1969 में पार्टी के दो फाड़ होने के बाद चुनाव आयोग ने इस चुनाव चिह्न को फ्रीज कर दिया. एक धड़े (ओल्ड कांग्रेस) को तिरंगे में चरखा चुनाव चिह्न दिया गया. वहीं इंदिरा गांधी के नेतृत्व वाली नई कांग्रेस को गाय और बछड़ा चुनाव चिह्न आवंटित किया गया. 1977 में चुनाव आयोग ने गाय और बछड़े की जगह कांग्रेस को 'हाथ का पंजा' चुनाव चिह्न आवंटित किया. 

चुनाव चिह्न के ख‍िलाफ तर्क दिया जाता है कि जनप्रतिनिधित्व अधिनियम की धारा 130 और चुनाव आचार संहिता के नियम के मुताबिक मानव शरीर का कोई भी अंग चुनाव चिह्न नहीं हो सकता, इसके बावजूद 1977 से कांग्रेस का चुनाव चिह्न 'हाथ का पंजा' बना हुआ है.

 

 

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