स्ट्रेट ऑफ होर्मुज दुनिया के सबसे महत्वपूर्ण समुद्री रास्तों में से एक है. यह फारस की खाड़ी को ओमान की खाड़ी और अरब सागर से जोड़ता है. इस स्ट्रेट की चौड़ाई सबसे कम जगह पर लगभग 39 किलोमीटर है. उत्तर की तरफ ईरान है और दक्षिण की तरफ ओमान.
हर साल दुनिया का लगभग 20 प्रतिशत तेल इसी रास्ते से गुजरता है. इसलिए कोई भी देश इसे बंद करने की धमकी दे तो पूरी दुनिया के तेल के दाम बढ़ जाते हैं और अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है.
अब सवाल यह है कि यह स्ट्रेट ऑफ होर्मुज आखिर किसका है? क्या ईरान इसे अपना मानकर बंद कर सकता है? समुद्र पर किसी देश का दावा कितना वैध हो सकता है. दुनिया ईरान के दावे को स्वीकार करेगी या नहीं?
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स्ट्रेट ऑफ होर्मुज की भौगोलिक स्थिति और महत्व
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज लंबाई में करीब 167 किलोमीटर है. इसमें दो तरफ से जहाजों के लिए अलग-अलग लेन बनी हुई हैं. ईरान की तरफ से कई द्वीप और बंदरगाह हैं जबकि ओमान की तरफ मुसंदम प्रायद्वीप है. क्योंकि यह रास्ता बहुत संकरा है इसलिए बड़े तेल के टैंकर और जहाज दोनों देशों के क्षेत्रीय जल में से गुजरते हैं.
कोई एक देश अकेला इसे अपने कब्जे में नहीं ले सकता. लेकिन ईरान की नौसेना यहां मजबूत है इसलिए व्यावहारिक रूप से वह इस इलाके पर काफी नियंत्रण रखता है. फिर भी कानूनी रूप से यह अंतरराष्ट्रीय समुद्री रास्ता माना जाता है.
समुद्र पर देशों का दावा कितना हो सकता है?
समुद्र पर देशों के दावे को नियंत्रित करने वाला मुख्य कानून संयुक्त राष्ट्र समुद्री कानून संधि (UNCLOS) है. इसके अनुसार हर देश अपनी तट रेखा से 22 किलोमीटर तक क्षेत्रीय जल पर मालिकाना हक रख सकता है. इसके बाद 370 km तक विशेष आर्थिक क्षेत्र (EEZ) होता है जहां मछली पकड़ने और संसाधनों का अधिकार होता है लेकिन दूसरे देशों के जहाजों को गुजरने का अधिकार रहता है.
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होर्मुज जैसे अंतरराष्ट्रीय जलडमरूमध्य में 'ट्रांजिट पैसेज' है. इसका मतलब है कि सभी देशों के जहाज और हवाई जहाज बिना रोके, बिना रुकावट के गुजर सकते हैं. यह अधिकार रद्द नहीं किया जा सकता. UNCLOS के मुताबिक तटीय देश इस रास्ते को रोक नहीं कर सकते. ओमान ने इस संधि को पूरी तरह स्वीकार कर लिया है लेकिन ईरान ने सिर्फ हस्ताक्षर किए हैं, उसे पूरी तरह लागू नहीं किया.
ईरान का दावा क्या है और वह क्यों करता है
ईरान कहता है कि स्ट्रेट ऑफ होर्मुज उसके क्षेत्रीय जल का हिस्सा है. उसने 1993 में अपना घरेलू कानून बनाया जिसमें कहा गया कि विदेशी युद्धपोतों, पनडुब्बियों या खतरनाक सामग्री वाले जहाजों को गुजरने के लिए पहले उसकी अनुमति लेनी होगी. ईरान UNCLOS की ट्रांजिट पैसेज व्यवस्था को पूरी तरह स्वीकार नहीं करता.
वह कहता है कि यहां सिर्फ इनोसेंट पैसेज लागू होता है जो आसानी से रोका जा सकता है, अगर सुरक्षा को खतरा हो। ईरान का तर्क है कि अगर कोई देश उस पर हमला करे तो वह अपनी सुरक्षा के लिए इस रास्ते को सीमित या बंद कर सकता है.
हाल के संघर्ष में ईरान ने कहा कि वह दुश्मन देशों के जहाजों को नहीं गुजरने देगा लेकिन दोस्त देशों को सुरक्षित रास्ता देगा. उसका दावा है कि वह फारस की खाड़ी, ओमान के क्षेत्रीय जल और होर्मुज पर पूर्ण नियंत्रण रखता है.
दुनिया ईरान के दावे को क्यों नहीं मानती?
ज्यादातर देश और विशेषज्ञ ईरान के दावे को अंतरराष्ट्रीय कानून के खिलाफ मानते हैं. अमेरिका, ब्रिटेन और कई यूरोपीय देश UNCLOS को कस्टमरी लॉ का हिस्सा मानते हैं. उनका कहना है कि ट्रांजिट पैसेज का अधिकार हर हाल में लागू होता है.
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अमेरिका ने UNCLOS पर हस्ताक्षर नहीं किए लेकिन फिर भी फ्रीडम ऑफ नेविगेशन अभियान चलाता है. ईरान के दावों को चुनौती देता है. ओमान भी UNCLOS का पालन करता है. ट्रांजिट पैसेज को मानता है. कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार ईरान अकेला होर्मुज को बंद नहीं कर सकता क्योंकि यह ओमान के साथ साझा खाड़ी है.
अगर ईरान बंद करने की कोशिश करे तो यह UNCLOS के अनुच्छेद 38-44 का उल्लंघन होगा. अमेरिका की नौसेना वहां मौजूद है जो रास्ता खुला रखने के लिए तैयार रहती है. कई बार ईरान ने धमकी दी लेकिन पूरी तरह बंद नहीं किया क्योंकि उसका अपना तेल भी इसी रास्ते से निकलता है. दुनिया भर की अर्थव्यवस्था प्रभावित होती है.
वर्तमान स्थिति और भविष्य के प्रभाव
हाल के ईरान-अमेरिका-इजरायल संघर्ष में ईरान ने होर्मुज को लेकर धमकियां दीं लेकिन आधिकारिक तौर पर कहा कि रास्ता पूरी तरह बंद नहीं है. उसने सिर्फ दुश्मन देशों के लिए प्रतिबंध लगाने की बात कही. दुनिया भर के देशों ने चेतावनी दी कि किसी भी तरह का बंद करना अंतरराष्ट्रीय कानून का उल्लंघन होगा.
अगर ईरान ने रास्ता बंद किया तो तेल की कीमतें आसमान छू लेंगी, कई देशों की ऊर्जा सुरक्षा खतरे में पड़ जाएगी और नई ड्रिलिंग व फॉसिल ईंधन परियोजनाएं बढ़ सकती हैं. शोधकर्ता कहते हैं कि ऐसे संघर्ष जलवायु पर भी बुरा असर डालते हैं. अंत में होर्मुज कोई एक देश का नहीं है.
यह अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत सभी के लिए खुला रहना चाहिए. ईरान का दावा कानूनी रूप से कमजोर है लेकिन उसकी भौगोलिक स्थिति और सैन्य ताकत उसे व्यावहारिक लाभ देती है. दुनिया इस दावे को नहीं मानती लेकिन पावर बैलेंस और कूटनीति तय करेगी कि आखिर रास्ता कैसे खुला रहेगा.
ऋचीक मिश्रा