भारत बंद: दंगाइयों के आगे बेबस दिखी पुलिस, आखिर कैसे मिली हिंसा की खुली छूट?

हर बार हक और आरक्षण के नाम पर आंदोलन और विरोध-प्रदर्शन होते हैं. हर बार कुछ बेगुनाह आंदोलन के नाम पर होने वाली हिंसा के शिकार हो जाते हैं. हर बार पुलिस प्रशासन और सरकारी मशीनरी नाकाम साबित होती है.

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यूपी के मुजफ्फरनगर के थाना मंडी के पास हुई हिंसा की तस्वीर यूपी के मुजफ्फरनगर के थाना मंडी के पास हुई हिंसा की तस्वीर

मुकेश कुमार

  • नई दिल्ली,
  • 03 अप्रैल 2018,
  • अपडेटेड 10:08 AM IST

हर बार हक और आरक्षण के नाम पर आंदोलन और विरोध-प्रदर्शन होते हैं. हर बार कुछ बेगुनाह आंदोलन के नाम पर होने वाली हिंसा के शिकार हो जाते हैं. हर बार पुलिस प्रशासन और सरकारी मशीनरी नाकाम साबित होती है. सोमवार को भारत बंद के दौरान भी यही हुआ. 10 बेगुनाहों को अपनी जान गंवानी पड़ी, लेकिन सवाल ये कि आखिर 10 मौतों का मुजरिम कौन है? दलितों के बंद के दौरान हिंसा की ऐसी आग भड़की पूरा देश झुलस उठा.

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एससी-एसटी एक्ट को लेकर हुई हिंसा ने पूरे देश को हाईजैक कर लिया. शहर-शहर सड़कों पर संग्राम हुआ. क्या बस, क्या बाइक, क्या ट्रेन, क्या कार, क्या दुकान और क्या सामान. सब कुछ आग की लपटों में घिर गया. उपद्रवियों और पुलिस के बीच हिंसक झड़पें हुईं. लाठी, डंडे चलते, पत्थर बरसे. खुलेआम सड़कों पर हथियार लहराए गए. पल भर में देश के अलग-अलग राज्य में हिंसा का तांडव मच गया. हिंसा की इस आग ने देशभर में 10 लोगों की जान ले ली.

सबसे ज्यादा मौत मध्य प्रदेश में हुईं. वहां सात लोगों की जिंदगी दलित कानून की आग के चलते काल के गाल में समा गई. यूपी के फिरोजाबाद में भी प्रदर्शन के दौरान एक की मौत हुई. राजस्थान में एक और बिहार के हाजीपुर में भी हिंसक प्रदर्शन एक मासूम की जान ले ली. दलित कानून के लिए सड़कों पर उतरी भीड़ दंगाइयों में तब्दील हो गई. पूरे देश की कानून व्यवस्था ने उनके आगे जैसे दम तोड़ दिया. क्या पुलिस और क्या प्रशासन सब उपद्रवियों के आगे पनाह मांगने लगे.

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हिंसा की सबसे खतरनाक तस्वीर मध्य प्रदेश के ग्वालियर से सामने आई. वहां उपद्रवी किसी फिल्म के खलनायक की तरह खुलेआम रिवॉल्वर लहराते दिखे. रिवॉल्वर के दम पर भारत बंद करने की कोशिश की गई. आखिर इसकी इजाजत इन्हें किसने दी. कुछ ऐसी ही तस्वीर मुरैना से सामने आई. वहां उपद्रवियों ने सरेआम भीड़ के बीच राइफल लहराई. ये शख्स हाथों में राइफल लेकर खुलेआम खड़ा रहा, लेकिन इसे रोकने वाला कोई नहीं था.

पश्चिमी उत्तर प्रदेश के मेरठ में प्रदर्शनकारी हिंसा पर उतर आए. एक पुलिस चौकी फूंक दी. उसके पास जितने भी वाहन खड़े थे, सभी में आग लगा दी. हिंसा का सिलसिला यहीं नहीं थमा. उपद्रवियों ने शहर में जगह-जगह रोडवेज की बसें फूंक डालीं. जमकर आगजनी की. पुलिस को इनसे पार पाने में पसीना छूट गया. मुजफ्फरनगर में भी प्रदर्शनकारियों ने सड़क पर उत्पात मचा दिया. एक थाने में आग लगाई तो मंडी कोतवाली पर हमला बोल दिया.

पुलिस वालों को हवाई फायरिंग करनी पड़ी. पुलिसकर्मियों को थाने में भागकर जान बचानी पड़ी. यूपी के कई शहरों में दिन भर हिंसा का तांडव चला. हिंसा के बाद फिरोजाबाद में देर शाम लोगों ने सड़क पर कैंडिल मार्च निकाला. उत्तर प्रदेश में उपद्रवियों ने सब कुछ उलट पुलट किया, तो राजस्थान में भी जैसे सड़कों पर रण छिड़ गया. जोधपुर में भी पुलिस और उपद्रवियों के बीच हिंसक झड़प हुई. पुलिस को लाठीचार्ज के साथ आंसू गैस का इस्तेमाल करना पड़ा.

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सोमवार का पूरा दिन दलित कानून को लेकर छिड़े संग्राम की भेंट चढ़ गया. हिंसा की आग में जब दस लोगों ने दम तोड़ा तो सरकार की नींद खुली और केंद्रीय गृहमंत्री राजनाथ सिंह ने ट्वीट कर दुख जताया. एक कानून की मांग को लेकर देश में पैदा हुए दंगे जैसे हालात ने सरकार और प्रशासन को कटघरे में खड़ा कर दिया. आखिर सब कुछ पता होते हुए ऐसे हालात पैदा क्यों होने दिए गए? क्यों बंद की जानकारी के बावजूद सुरक्षा के पुख्ता बंदोबस्त नहीं किए गए?

क्यों दंगाइयों को सड़क पर खुलेआम हिंसा की छूट दी गई? क्या सरकार की पुलिस और सुरक्षाबल के आगे कम पड़ गए? सबसे बड़ा सवाल ये कि आखिर 10 बेगुनाह लोगों की मौतों की जिम्मेदारी किसकी है? ये सच है कि इन सवालों का जवाब देने कोई नहीं आएगा, लेकिन आखिर कब तक अपनी-अपनी मांगों को लेकर कोई समूह पूरे देश को इस तरह हिंसा की आग में झोंकता रहेगा. आखिर कब तक? इन सवालों के जवाब जरूर मिलने चाहिए.

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