संदीप गाडोली फेक एनकाउंटर केस में मुंबई सेशन कोर्ट का बड़ा फैसला, दस साल बाद सभी 8 आरोपी बरी

मुंबई सेशन कोर्ट ने 2016 के संदीप गाडोली फर्जी एनकाउंटर केस में सभी 8 आरोपियों को बरी कर दिया है. इस मामले को दिव्या पाहुजा की भूमिका और उसकी हत्या ने भी उलझा दिया था. अब अब कोर्ट ने सारे हालात को मद्देनजर रखते हुए ये फैसला सुनाया है. जानें पूरी कहानी.

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हरियाणा पुलिस इस मामले से सवालों के घेरे में आ गई थी (फोटो-ITG) हरियाणा पुलिस इस मामले से सवालों के घेरे में आ गई थी (फोटो-ITG)

विद्या

  • मुंबई,
  • 27 मार्च 2026,
  • अपडेटेड 6:56 PM IST

मुंबई सेशन कोर्ट ने साल 2016 के चर्चित संदीप गाडोली फर्जी एनकाउंटर केस में बड़ा फैसला सुनाते हुए सभी 8 आरोपियों को बरी कर दिया है. इस मामले में हरियाणा पुलिस के 5 पुलिसकर्मी भी आरोपी थे, जिन पर हत्या और आपराधिक साजिश जैसे गंभीर आरोप लगे थे. करीब एक दशक तक चले इस केस में कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष आरोप साबित करने में नाकाम रहा. इस फैसले के बाद एक बार फिर इस पूरे केस की कहानी और उससे जुड़े सवाल चर्चा में आ गए हैं. गाडोली एनकाउंटर को लेकर शुरू से ही विवाद रहा था. अब कोर्ट के फैसले ने इस केस को नया मोड़ दे दिया है.

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क्या है पूरा मामला?
यह मामला साल 2016 का है, जब हरियाणा के गुरुग्राम का कुख्यात गैंगस्टर संदीप गाडोली मुंबई आया हुआ था. 7 फरवरी 2016 को मुंबई के एक होटल में हरियाणा पुलिस की टीम ने उसे गोली मार दी थी. पुलिस का दावा था कि गाडोली पर कई संगीन आपराधिक मामले दर्ज थे और वह पुलिस मुठभेड़ में मारा गया. अधिकारियों के अनुसार, गाडोली ने पुलिस पर हमला करने की कोशिश की थी, जिसके बाद जवाबी कार्रवाई में उसे मार गिराया गया. शुरुआत में इसे एक सामान्य पुलिस एनकाउंटर के रूप में पेश किया गया. लेकिन जल्द ही इस कहानी पर सवाल उठने लगे.

एनकाउंटर के तुरंत बाद ही इस पूरे घटनाक्रम पर संदेह जताया गया. आरोप लगाया गया कि यह मुठभेड़ असली नहीं थी, बल्कि पहले से रची गई साजिश का हिस्सा थी. कहा गया कि गाडोली को प्लानिंग के तहत मुंबई बुलाया गया और होटल में ठहराया गया. इसके बाद हरियाणा पुलिस की टीम ने सुनियोजित तरीके से उसकी हत्या कर दी. इस एंगल के सामने आने के बाद मामले ने तूल पकड़ लिया. जांच एजेंसियों ने भी इस केस को गंभीरता से लिया और कई पहलुओं की पड़ताल शुरू की गई.

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इस केस में दिव्या पाहुजा का नाम सामने आने के बाद मामला और भी उलझ गया. दिव्या उस वक्त गाडोली के साथ होटल में मौजूद थी. जांच में आरोप लगा कि दिव्या ने ही गाडोली को मुंबई बुलाने में अहम भूमिका निभाई थी. पुलिस के मुताबिक, दोनों के बीच करीबी संबंध थे और इसी भरोसे का इस्तेमाल किया गया. आरोप यह भी था कि दिव्या ने गाडोली को जाल में फंसाने का काम किया. इसी वजह से उसे इस केस में साजिश का हिस्सा मानते हुए आरोपी बनाया गया.

जांच के दौरान यह भी सामने आया कि गाडोली और दिव्या के बीच निजी संबंध थे, जो इस पूरे केस की अहम कड़ी बने. एजेंसियों का मानना था कि इसी रिश्ते के चलते गाडोली बिना किसी शक के मुंबई पहुंचा. इसके बाद जो कुछ हुआ, उसने इस एनकाउंटर को संदिग्ध बना दिया. सवाल उठे कि क्या यह एक सोची-समझी साजिश थी? क्या पुलिस ने कानून का दायरा पार किया? इन सवालों ने इस केस को लंबे समय तक सुर्खियों में बनाए रखा. कई बार जांच की दिशा और निष्कर्षों पर भी बहस होती रही.

इस केस से जुड़ी सबसे सनसनीखेज कड़ी साल 2024 में सामने आई, जब दिव्या पाहुजा की खुद हत्या कर दी गई. गुरुग्राम के एक होटल में उसकी लाश बरामद हुई थी. जांच में सामने आया कि उसे गोली मारकर हत्या की गई और शव को ठिकाने लगाने की कोशिश भी की गई. इस घटना ने एक बार फिर गाडोली एनकाउंटर केस को चर्चा में ला दिया. दिव्या को इस केस की अहम गवाह और कड़ी माना जाता था. उसकी हत्या ने कई नए सवाल खड़े कर दिए.

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करीब 10 साल तक चले इस केस में कोर्ट में कई गवाह पेश किए गए और सबूतों की लंबी पड़ताल हुई. अभियोजन पक्ष ने आरोप लगाया कि यह एक फर्जी एनकाउंटर था और इसमें पुलिसकर्मी भी शामिल थे. वहीं बचाव पक्ष ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा कि पुलिस ने आत्मरक्षा में कार्रवाई की थी. सुनवाई के दौरान कई तकनीकी और कानूनी पहलुओं पर बहस हुई. लेकिन आखिरकार कोर्ट ने सबूतों के आधार पर फैसला सुनाया. इस दौरान कई गवाहों के बयान और साक्ष्यों की विश्वसनीयता पर भी सवाल उठे.

मुंबई सेशन कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि अभियोजन पक्ष आरोपों को संदेह से परे साबित नहीं कर पाया. इसी आधार पर सभी 8 आरोपियों को बरी कर दिया गया. कोर्ट ने माना कि उपलब्ध सबूत पर्याप्त नहीं थे, जिससे हत्या या साजिश का आरोप साबित किया जा सके. इस फैसले के साथ ही करीब एक दशक पुराना यह मामला कानूनी रूप से खत्म हो गया. हालांकि, इस केस से जुड़े कई सवाल अब भी लोगों के मन में बने हुए हैं. यह फैसला एक बार फिर फर्जी एनकाउंटर जैसे मामलों में जांच और सबूतों की अहमियत को बताता है.

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