'Sir, मैं सब सच बताऊंगी', 9 पुलिसकर्मियों को फांसी दिलाने वाली हेड कांस्टेबल रेवती की कहानी

तमिलनाडु के सथानकुलम कस्टोडियल मौत मामले में पांच साल बाद 9 पुलिसकर्मियों को फांसी की सजा सुनाई गई. इस केस में हेड कांस्टेबल रेवती की साहसिक गवाही सबसे अहम साबित हुई. धमकियों और दबाव के बावजूद उन्होंने सच सामने रखा. उनकी गवाही ने दोषियों की पहचान और अपराध साबित करने में निर्णायक भूमिका निभाई.

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हेड कांस्टेबल रेवती की गवाही से खुला पिता-पुत्र की हत्या का राज. (Photo: ITG) हेड कांस्टेबल रेवती की गवाही से खुला पिता-पुत्र की हत्या का राज. (Photo: ITG)

अनघा

  • तमिलनाडु,
  • 08 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 4:39 PM IST

तमिलनाडु के सथानकुलम कस्टोडियल मौत मामले में छह साल बाद अदालत ने बड़ा फैसला सुनाते हुए 9 पुलिसकर्मियों को दोषी ठहराया और उन्हें फांसी की सजा सुनाई. यह फैसला न्याय व्यवस्था के लिए एक महत्वपूर्ण पड़ाव माना जा रहा है. लेकिन इस पूरे मामले में एक नाम सबसे ज्यादा चर्चा में रहा. वह नाम है हेड कांस्टेबल रेवती. हेड कांस्टेबल रेवती की बहादुरी और सच्चाई के प्रति उनकी प्रतिबद्धता ने इस केस को मुकाम तक पहुंचाने में निर्णायक भूमिका निभाई. अगर उन्होंने साहस नहीं दिखाया होता. तो संभव है यह मामला कभी भी इस अंजाम तक नहीं पहुंच पाता.

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यह घटना साल 2020 की है, जब कोविड नियमों के उल्लंघन के आरोप में पी जयाराज और उनके बेटे जे बेन्निक्स को तूतीकोरिन जिले के सथानकुलम पुलिस स्टेशन में हिरासत में लिया गया था. आरोप था कि उन्होंने अपनी मोबाइल की दुकान तय समय से ज्यादा देर तक खुली रखी थी. लेकिन पुलिस स्टेशन के अंदर जो हुआ. उसने पूरे देश को झकझोर कर रख दिया. आरोप है कि पिता और बेटे को थाने में बुरी तरह पीटा गया. उन्हें घंटों तक यातनाएं दी गईं. उनके शरीर पर गंभीर चोटें आईं और कुछ ही दिनों के भीतर दोनों की मौत हो गई.

इस घटना के बाद पूरे देश में गुस्सा फैल गया. लोगों ने न्याय की मांग की और मामला धीरे धीरे अदालत तक पहुंचा. लेकिन इस केस को मजबूत बनाने में सबसे बड़ी भूमिका निभाई हेड कांस्टेबल रेवती ने. वो उस समय सथानकुलम पुलिस स्टेशन में ड्यूटी पर तैनात थीं. उन्होंने अपनी आंखों से उस रात की पूरी घटना देखी थी कि किस तरह पिता-पुत्र को बेरहमी से पीटा जा रहा था. 

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हेड कांस्टेबल रेवती बनीं केस की सबसे अहम गवाह

जब न्यायिक मजिस्ट्रेट एमएस भारथिदासन मामले की जांच के लिए पहुंचे. तब रेवती ने उनके सामने सच बताने का फैसला किया. लेकिन यह फैसला आसान नहीं था. उन्होंने मजिस्ट्रेट से कहा कि सर मैं आपको सब कुछ बताऊंगी. हर वह सच जो छिपाया जा रहा है. लेकिन मैं दो छोटी बच्चियों की मां हूं,  क्या आप मेरे बच्चों और मेरी नौकरी की सुरक्षा की गारंटी दे सकते हैं.

हेड कांस्टेबल रेवती

रेवती जानती थीं कि जिन पुलिसकर्मियों के खिलाफ वह गवाही देने जा रही हैं.  वो उनसे वरिष्ठ और प्रभावशाली हैं, बावजूद उन्होंने सच बोलने का फैसला किया. उन्होंने मजिस्ट्रेट को मिनट दर मिनट उस रात की पूरी घटना बताई. रेवती ने बताया कि किस तरह दोनों लोगों को लगातार पीटा गया. उन्हें गंभीर चोटें आईं और बाद में उन्हें न्यायिक हिरासत में भेज दिया गया.

रेवती ने अपनी गवाही में बताया कि पुलिसकर्मियों को उस समय जो भी हाथ लगा वो उससे मारते रहे. यहां तक कि उनके प्राइवेट पार्ट पर भी जूते से मारा गया. बीच बीच में पुलिसकर्मी शराब पीने के लिए रुकते थे. उन्होंने बताया कि जब वह रात करीब 8.50 बजे स्टेशन पहुंचीं . तब अंदर से चीखने और रोने की आवाजें आ रही थीं, कोई चिल्ला रहा था. अम्मा, दर्द हो रहा है, मुझे छोड़ दो मैंने गलती की है.

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मिनट दर मिनट बताई गई कस्टोडियल यातना की पूरी कहानी

उन्होंने यह भी बताया कि सब इंस्पेक्टर बालकृष्णन की आवाज सुनाई दे रही थी. जो चिल्ला रहे थे. तुम पुलिस स्टेशन में हंगामा करोगे. क्या तुम बहुत बड़े आदमी हो. रेवती ने कहा कि जब वह अंदर पहुंचीं. तब पीड़ित को बुरी तरह पीटा जा रहा था. उसके शरीर से खून बह रहा था और कुछ समय बाद जब मारपीट खत्म हुई. तो उसी घायल शख्स से फर्श पर गिरे खून को साफ करवाया गया.

उन्होंने यह भी बताया कि जब दोनों पीड़ित अर्ध बेहोशी की हालत में थे. तब उन्होंने जयाराज से पूछा कि क्या उन्हें कुछ चाहिए. उन्होंने उन्हें कॉफी देने की कोशिश की. लेकिन वहां मौजूद पुलिसकर्मियों ने उसे भी गिरा दिया. एक समय ऐसा भी आया जब दोनों को नग्न कर दिया गया और उनके हाथ बांध दिए गए. उस दृश्य को देखकर रेवती खुद को रोक नहीं पाईं और कमरे से बाहर चली गईं.

जे. बेन्निक्स (बाएं) और उनके पिता पी. जयराज (दाएं)

रेवती की गवाही सिर्फ बयान तक सीमित नहीं रही. उन्होंने सीसीटीवी फुटेज में दिखाई दे रहे पुलिसकर्मियों की पहचान भी की. इससे यह साबित करने में मदद मिली कि घटना के समय कौन कौन मौजूद था. यह केस में एक अहम कड़ी साबित हुई.  जिसने दोषियों की भूमिका तय करने में मदद की. रेवती को इस दौरान कई तरह की धमकियों और दबाव का सामना करना पड़ा. उनके ही साथी पुलिसकर्मियों ने उन्हें चुप रहने की सलाह दी. लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी. स्थिति इतनी तनावपूर्ण हो गई थी कि मजिस्ट्रेट को उनकी सुरक्षा के लिए जांच कक्ष के बाहर गार्ड तैनात करना पड़ा.

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सीसीटीवी फुटेज से आरोपियों की पहचान

इसके बावजूद पुलिसकर्मी स्टेशन के बाहर जमा होकर माहौल बिगाड़ने की कोशिश कर रहे थे. वो टिप्पणी कर रहे थे और कार्यवाही में बाधा डालने की कोशिश कर रहे थे. रेवती शुरू में अपने बयान पर हस्ताक्षर करने से भी हिचकिचा रही थीं. लेकिन बार बार सुरक्षा का आश्वासन मिलने के बाद उन्होंने दसखत कर दिए.

मजिस्ट्रेट ने अपनी रिपोर्ट में भी इस बात का जिक्र किया कि स्टेशन का माहौल बेहद तनावपूर्ण था और पुलिसकर्मी कोर्ट स्टाफ को भी धमका रहे थे. रेवती की गवाही को शुरुआती दौर में काफी समर्थन मिला. लेकिन इसके बावजूद वह खुद को सुरक्षित महसूस नहीं कर रही थीं. उन्होंने एक इंटरव्यू में कहा था कि मैं नहीं चाहती कि मेरे बयान की जानकारी सार्वजनिक हो. मुझे डर है कि वरिष्ठ अधिकारी मुझे परेशान कर सकते हैं.

बाद में मद्रास हाईकोर्ट के निर्देश पर जिला प्रशासन ने उन्हें सुरक्षा प्रदान की. उनकी और उनके पति की सुरक्षा के लिए दो पुलिसकर्मियों को तैनात किया गया. साल 2020 में सुनवाई के दौरान हाई कोर्ट की एक बेंच ने उन्हें फोन पर बात कर आश्वस्त भी किया कि उनकी सुरक्षा का पूरा ध्यान रखा जाएगा.

हाईकोर्ट के आदेश पर मिली सुरक्षा, फिर दर्ज हुआ पूरा बयान

रेवती का यह कदम पुलिस व्यवस्था के भीतर एक दुर्लभ उदाहरण माना जा रहा है. जहां एक जूनियर अधिकारी ने अपने ही साथियों के खिलाफ जाकर सच बोलने का साहस दिखाया. उनकी गवाही ने न सिर्फ इस केस को मजबूत बनाया. बल्कि यह भी दिखाया कि सच्चाई और साहस के बल पर न्याय हासिल किया जा सकता है. छह साल बाद आया यह फैसला न सिर्फ पीड़ित परिवार के लिए न्याय लेकर आया. बल्कि यह भी संदेश देता है कि कानून से ऊपर कोई नहीं है. इस पूरे मामले में हेड कांस्टेबल रेवती की भूमिका को हमेशा याद रखा जाएगा. जिन्होंने डर और दबाव के बावजूद सच का साथ दिया  और न्याय की राह को संभव बनाया.
 

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