ढाई फुट का बैग, 5 फुट की लाश और मुर्दा कातिल, हैरान कर देगी ये दास्तान

उस कातिल ने ढाई फुट के बैग में पांच फुट की लाश रखी थी. उसने बैग नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर छोड़ा था. दिल्ली पुलिस की टीम आठ साल तक उस अंजान कातिल ढूंढती रही. और वो आठ साल तक नाम बदल कर गुरूग्राम में नौकरी करता रहा.

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8 साल बाद उस लड़की का कातिल पुलिस के हाथ लगा, मगर जिंदा नहीं मुर्दा 8 साल बाद उस लड़की का कातिल पुलिस के हाथ लगा, मगर जिंदा नहीं मुर्दा

परवेज़ सागर

  • नई दिल्ली,
  • 29 जून 2019,
  • अपडेटेड 7:40 PM IST

आठ साल पहले 2011 में नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के बाहर ढाई फुट के एक बैग के अंदर से पांच फुट की एक लड़की की लाश मिली थी. लंबी तफ्तीश के बाद पुलिस को कातिल के बारे में जानकारी मिलती है. पर सिर्फ जानकारी ही मिलती है. कातिल नहीं. कातिल की तलाश में पुलिस कई छोटे-बड़े शहरों में छापे मारती है. यहां तक कि कातिल का पता देने वाले को दो लाख का इनाम देने का भी एलान किया जाता है. पर कोई फायदा नहीं. पर तभी आठ लंबे साल बाद अचानक एक रोज़ खुद कातिल पहली बार फोन करता है.

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उस कातिल ने ढाई फुट के बैग में पांच फुट की लाश रखी थी. उसने बैग नई दिल्ली रेलवे स्टेशन पर छोड़ा था. दिल्ली पुलिस की टीम आठ साल तक उस अंजान कातिल ढूंढती रही. और वो आठ साल तक नाम बदल कर गुरूग्राम में नौकरी करता रहा. आठ साल बाद जब वो मर रहा था, तब पुलिस को उसकी ख़बर मिली. लेकिन पुलिस उसे गिरफ्तार कर पाती इससे पहले ही वो मर गया. टैटू गर्ल के क़त्ल और क़त्ल के अंजाम की ये एक अजीब दास्तान है.

क्या वो बैग याद है आपको? जी हां. काले रंग का वही बैग, जो 11 फरवरी 2011 को दिल्ली की सबसे भीड़भाड़ वाली जगह यानी नई दिल्ली रेलवे स्टेशन के बाहर से मिला था.

बाकायदा मीडिया के सामने पुलिसवालों ने इस बैग को खोला था. महज ढाई फुट के इस बैग के अंदर पांच फुट की एक लड़की की लाश मिली थी. जिसकी उम्र करीब करीब 20 साल थी. काली जींस और काली टी-शर्ट पहनी लड़की के दोनों हाथ उसके दोनों पैरों के बीच डालकर नायलोन की रस्सी से इस तरह बांधा गया था ताकि उसे आसानी से इस बैग में डाला जा सके. नाभी पर उसने नेवल रिंग पहन रखी थी. जबकि कमर पर दाहिनी तरफ मोर का टैटू भी बना हुआ था.

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तस्वीर सामने थी चेहरा साफ. अखबारों और टीवी में बार-बार तस्वीर दिखाई गई. पर हैरान कर देने वाली बात ये थी कि कोई भी लड़की की शिनाख्त करने आगे नहीं आ रहा था.

आखिरकार 13 दिन बाद यानी 24 फरवरी 2011 को एक शख्स पुलिस के पास आता है और बताता है कि लाश जिस लड़की की है उसका नाम नीतू सोलंकी है. आईबीएस में काम करने वाली नीतू दिल्ली यूनिवर्सिटी छात्र संघ का चुनाव भी लड़ चुकी थी. नीतू की लाश की शिनाख्त कोई और नहीं उसके पिता करतार सिंह सोलंकी करते हैं. हालांकि उन्हें हैरत इस बात पर थी कि नीतू को कायदे से सिंगापुर मं होना चाहिए था, पर उसकी लाश दिल्ली में कैसे मिली?

खैर लाश की शिनाख्त के बाद पुलिस को पहली मंजिल मिलती है. अब लाश के बैग में जाने और लाश को बैग तक पहुंचाने वाले की तलाश थी. तफ्तीश आगे बढ़ती है तो एक नाम सामने आता है राजू गहलौत. दिल्ली का ही रहने वाला राजू गहलौत.

जो तब एयर इंडिया में नौकरी करता था. जिसकी दोस्ती नीतू के साथ थी. यहां तक कि दोनों बाद में लिव इन में रहने लगे थे। मगर नीतू के घर वालों को ये बात नहीं पता थी. क्योंकि नीतू ने घर में ये बताई थी कि उसकी नौकरी सिंगापुर में लग गई है और वो सिंगापुर में है.

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नीतू की लाश मिलने के बाद से ही राजू गहलौत गायब था. किसी तरह उसका एक दोस्त पुलिस के हाथ लगा. उसी ने पुलिस को बताया कि नीतू का कत्ल राजू ने किया था. अब पुलिस राजू की तलाश में भटकना शुरू करती है. केस क्राइम ब्रांच को सौंप दिया जाता है. वक्त बीतने के साथ जब राजू का सुराग नहीं मिलता तो उस पर दो लाख रुपये के इनाम का एलान तक कर दिया जाता है. इस बीच क्राइम ब्रांच की टीम राजू की खोज में आधा हिंदुस्तान घूम आती है. पर राजू नहीं मिलता. आठ साल बीत जाते हैं.

आठ साल बाद एक दिन.. गहलोत परिवार के पास एक फोन आता है. फोन करने वाला अपना नाम राजू गहलौत बताता है. गहलौत परिवार आठ साल बाद राजू की आवाज सुन रहा था. क्योंकि आठ साल से राजू गहलौत कभी अपने घर नहीं गया था. आठ साल तक कभी उसने अपने घरवालों से फोन तक पर बात नहीं की थी. आठ साल बाद आए इस फोन को सुनते ही पूरा गहलौत परिवार भागता हुआ गुरूग्राम के पारस हास्टिपट पहुंचता है. क्योंकि राजू गहलौत ने फोन इसी अस्पताल से किया था.

दरअसल, राजू मौत की दहलीज पर खड़ा था. किसी भी पल सांसों की डोर टूटने जा रही थी. पर वो मरने से पहले अपनी मां को देखना चाहता था. इसीलिए आठ साल बाद उसने अपनी मां को फोन किया था.

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इधर, राजू गहलौत को देखने घर वाले अस्पताल पहुंचते हैं. उधर, उसी बीच गहलौत परिवार में से ही एक शख्स दिल्ली पुलिस की क्राइम ब्रांच को फोन करता है और फोन पर राजू के पारस अस्पताल में होने की जानकारी देता है. आठ साल से जिस राजू को दिल्ली पुलिस तलाश रही थी आठ साल बाद उसी राजू की खबर पाते ही पुलिस उछल पड़ती है. फौरन एक टीम पारस अस्पताल के लिए रवाना होती है. टीम अस्पताल पहुंचती है. दो लाख का इनामी और नीतू का कातिल तब भी अस्पताल में ही था. मगर पुलिस के आते-आते उसकी सांसों की डोर कट चुकी थी.

अब पुलिस के सामने एक मुर्दा पड़ा था. वो मुर्दा जिसे वो आठ साल से ढूंढ रही थी. पर राजू गहलौत को हुआ क्या था. आठ साल तक वो अपने घर तक से दूर कैसे रहा. और सबसे बड़ा सवाल ये कि आठ तक वो दिल्ली पुलिस की सीमा से महज दस किलोमीटर दूर गुरुग्राम में खुलेआम कैसे जीता रहा. वो भी एक बड़ी कंपनी में बड़े ओहदे पर नौकरी करते हुए?

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