भारत के प्राइवेट स्पेस सेक्टर में इतिहास रचने वाले पवन कुमार चंदना की खूब चर्चा हो रही है. इस बीच देश के बड़े उद्योगपति और वेदांता ग्रुप के चेयरमैन अनिल अग्रवाल ने हैदराबाद स्थित स्पेस-टेक स्टार्टअप 'स्काईरूट एयरोस्पेस' के सह-संस्थापक और सीईओ पवन कुमार चंदना से मुलाकात की.
इस मुलाकात के बाद अनिल अग्रवाल ने युवाओं के जज्बे और भारत के निजी स्पेस सेक्टर की ऐतिहासिक उपलब्धि की दिल खोलकर सराहना की. उन्होंने कहा कि कुछ मुलाकातें सिर्फ व्यक्तियों से नहीं, बल्कि भारत के उज्ज्वल भविष्य से होती हैं और पवन चंदना से मिलना ऐसा ही एक अनुभव था.
28 साल की युवा टीम ने लिखा नया इतिहास
वेदांता चेयरमैन ने स्काईरूट एयरोस्पेस के विक्रम-1 (Vikram-1) रॉकेट की सफल कक्षा प्रक्षेपण पर खुशी जाहिर की. उन्होंने कहा, 'जब मैं कहता हूं कि भारत की सबसे बड़ी ताकत उसके युवा हैं, तो उसके पीछे ऐसे ही उदाहरण होते हैं.'
अनिल अग्रवाल ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि स्काईरूट की इस प्रतिभाशाली टीम की औसत आयु केवल 28 साल है. इतने कम उम्र के इंजीनियरों और वैज्ञानिकों द्वारा भारत का पहला निजी ऑर्बिटल रॉकेट तैयार कर अंतरिक्ष में भेजना यह साबित करता है कि बड़े सपने देखने की कोई उम्र नहीं होती. उन्होंने इस सफलता के लिए पवन चंदना, उनकी पूरी टीम के साथ-साथ इसरो (ISRO) और इन-स्पेस (IN-SPACe) को भी बधाई दी.
उन्होंने कहा कि अगर देश अपने युवाओं पर भरोसा करे और उन्हें अवसर दे, तो वे भारत को नई ऊंचाइयों तक ले जाएंगे, यही नए भारत की असली उड़ान है.
IIT और ISRO से लेकर 'स्काईरूट' तक का सफर
गौरतलब है कि भारत का पहला निजी तौर पर निर्मित रॉकेट 'विक्रम-1' सफलतापूर्वक पृथ्वी की कक्षा में स्थापित हो गया है. इस ऐतिहासिक मिशन के पीछे पवन कुमार चंदना की दूरदर्शिता और कड़ा परिश्रम है. हैदराबाद के एक मध्यमवर्गीय परिवार से आने वाले पवन चंदना ने कड़ी मेहनत के बल पर 2007 में IIT खड़गपुर में दाखिला लिया और मैकेनिकल इंजीनियरिंग की डिग्री हासिल की.
साल 2012 में उनका चयन ISRO में बतौर वैज्ञानिक हुआ. वहां 6 साल काम करने के दौरान उन्होंने देखा कि दुनिया भर में निजी कंपनियां स्पेस सेक्टर में क्रांति ला रही हैं. फिर उन्होंने साल 2018 में एक सुरक्षित और प्रतिष्ठित सरकारी नौकरी को छोड़कर अपने साथी नागा भरत डाका के साथ मिलकर हैदराबाद में 'स्काईरूट एयरोस्पेस' की नींव रखी.
विक्रम-एस से यूनिकॉर्न तक की छलांग
स्काईरूट का सफर भारतीय स्टार्टअप्स के लिए एक मिसाल बन चुका है. कंपनी ने 2022 में अपने सब-ऑर्बिटल रॉकेट 'विक्रम-एस' (Vikram-S) का सफल परीक्षण करके अपनी तकनीकी क्षमता का लोहा मनवाया था और निवेशकों का विश्वास जीता था. अब श्रीहरिकोटा से 'विक्रम-1' का सफल प्रक्षेपण भारत के निजी स्पेस-टेक पारिस्थितिकी तंत्र के लिए एक नया मोड़ साबित हुआ है.
आज स्काईरूट एयरोस्पेस में 1,000 से अधिक कर्मचारी काम कर रहे हैं और यह भारत की प्रमुख 'यूनिकॉर्न' कंपनियों में शुमार हो चुकी है. विक्रम-1 के सफल ऑर्बिटल लॉन्च के साथ स्काईरूट एयरोस्पेस (Skyroot Aerospace) ने अब अपनी अगली बड़ी योजना पर काम शुरू कर दिया है. कंपनी एलन मस्क की कंपनी स्पेस एजेंसी SpaceX की राह पर चलते हुए अब रीयूजेबल रॉकेट विकसित करने की दिशा में कदम बढ़ा रही है.
क्यों खास है रीयूजेबल टेक्नोलॉजी?
आमतौर पर सैटेलाइट को अंतरिक्ष में छोड़ने के बाद रॉकेट नष्ट हो जाते हैं, जिससे हर मिशन की लागत बहुत अधिक आती है. एलन मस्क की कंपनी स्पेसएक्स ने रॉकेट को लॉन्च के बाद वापस सुरक्षित धरती पर लैंड कराकर दोबारा इस्तेमाल करने की तकनीक में महारत हासिल की है. स्काईरूट भी अब इसी फॉर्मूले को अपनाकर अंतरिक्ष मिशनों की लागत में भारी कटौती करना चाहती है. पवन चंदना के अनुसार रीयूजेबल रॉकेट तकनीक और AI का सही इस्तेमाल वैश्विक अंतरिक्ष अर्थशास्त्र को पूरी तरह बदल सकता है.
आजतक बिजनेस डेस्क