भारतीय समाज में अक्सर बेटियों को 'पराया धन' कहकर विदा किया जाता है और यह माना जाता है कि शादी के बाद ससुराल ही उनका असली घर है. अक्सर महिलाओं को अपने अधिकारों की सही जानकारी तक नहीं होती आजतक रेडियो के शो 'प्रॉपर्टी से फायदा' में एडवोकेट आस्था चड्ढा ने महिलाओं के अधिकारों पर खुलकर बात की.
आस्था कहती हैं 'शादी के बाद महिलाओं का पति के घर पर अधिकार होता है. इसी सामाजिक सोच के कारण देश में एक बहुत बड़ा मिथक पैदा हो गया है कि शादी होते ही महिला का अपने पति या ससुराल की संपत्ति पर स्वचालित रूप से मालिकाना हक हो जाता है. अक्सर देखा जाता है कि जब वैवाहिक विवाद या तलाक जैसी स्थितियां आती हैं, तो महिलाएं ससुराल की संपत्ति में अपना हिस्सा तलाशती हैं, लेकिन कानूनी सच्चाई इससे बिल्कुल उलट है.'
आस्था बताती हैं कानून के अनुसार, शादी होने मात्र से पत्नी का पति या सास-ससुर की संपत्ति पर कोई मालिकाना हक नहीं बनता, अगर घर सास या ससुर के नाम पर है, तो बहू का उस पर कोई कानूनी दावा नहीं होता. विवाद होने पर कोर्ट भी यह स्पष्ट करता है कि बहू को सास-ससुर की निजी संपत्ति पर जबरन रहने या हिस्सा मांगने का अधिकार नहीं है. एक बड़ा विरोधाभास यह है कि महिलाएं ससुराल में तो हक ढूंढती हैं, लेकिन मायके की संपत्ति को 'भाई का हिस्सा' मानकर आसानी से छोड़ देती हैं. जबकि कानूनन, शादी के बाद भी एक बेटी का अपने माता-पिता की संपत्ति पर अधिकार पूरी तरह सुरक्षित रहता है.
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महिलाओं का सुरक्षा कवच
रहने का अधिकार (Right to Residence) भले ही पत्नी का पति के घर पर मालिकाना हक न हो, लेकिन कानून उसे सड़क पर आने से बचाता है. घरेलू हिंसा अधिनियम (Domestic Violence Act) के तहत महिलाओं को 'राइट टू रेजिडेंस' मिला हुआ है. शादी के बाद महिला जिस घर में अपने पति के साथ रहती है उसे 'शेयर्ड हाउसहोल्ड' या मैट्रिमोनियल होम कहा जाता है.
आस्था बताती हैं- 'वैवाहिक विवाद या अलगाव की स्थिति में पति या ससुराल वाले महिला को अचानक घर से बाहर नहीं निकाल सकते. जब तक कोर्ट में तलाक का मुकदमा लंबित है और कोई अंतिम फैसला या वित्तीय सेटलमेंट नहीं हो जाता, तब तक महिला को उस घर में गरिमा के साथ रहने का पूरा अधिकार है. यह अधिकार कामकाजी और गैर-कामकाजी दोनों महिलाओं पर समान रूप से लागू होता है. हालांकि, जो महिलाएं आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर नहीं हैं, उनके लिए यह सुरक्षा कवच और भी महत्वपूर्ण हो जाता है. अगर किसी स्थिति में कोर्ट महिला को उस घर से हटने को कहता भी है, तो पति को उसी स्तर का वैकल्पिक आवास या उसका किराया देना पड़ता है.'
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सीनियर सिटिजन एक्ट बनाम राइट टू रेजिडेंस
कई बार इस कानून का दुरुपयोग भी देखने को मिलता है, जहां बुजुर्ग सास-ससुर को परेशान करने की कोशिश की जाती है. ऐसे मामलों में जहां संपत्ति वरिष्ठ नागरिकों की है, कोर्ट संतुलन बनाने के लिए पति को आदेश देता है कि वह अपनी पत्नी के लिए अलग रहने की व्यवस्था करे, ताकि बुजुर्गों के अधिकारों का भी हनन न हो. वित्तीय सुरक्षा के लिहाज से कई कपल्स मिलकर प्रॉपर्टी खरीदते हैं. कानूनी नजरिए से संयुक्त संपत्ति लेते समय महिलाओं को कुछ बेहद जरूरी बातों का ध्यान रखना चाहिए.
अगर आपके पास आर्थिक क्षमता है, तो हमेशा अपने नाम पर स्वतंत्र प्रॉपर्टी खरीदने की कोशिश करें. जॉइंट प्रॉपर्टी में भविष्य में विवाद की गुंजाइश हमेशा बनी रहती है. अक्सर महिलाएं घर खरीदने के लिए अपनी ज्वेलरी बेच देती हैं, कैश दे देती हैं या घर के अन्य खर्च संभालकर पति को ईएमआई (EMI) भरने देती हैं. ऑन-पेपर कोई रिकॉर्ड न होने के कारण विवाद के समय कोर्ट में यह साबित करना मुश्किल हो जाता है कि पत्नी ने भी योगदान दिया था.
चेक या बैंक ट्रांसफर से करें भुगतान
आस्था कहती हैं- 'यदि आप प्रॉपर्टी में वित्तीय योगदान दे रही हैं, तो हमेशा बैंक ट्रांसफर या चेक के जरिए सीधे भुगतान करें. कैश या गहने देने से बचें ताकि एक स्पष्ट 'मनी ट्रेल' बनी रहे. अगर किसी प्रॉपर्टी के सेल डीड में पति और पत्नी दोनों का नाम दर्ज है. यदि डीड में दोनों का नाम है और हिस्सेदारी का अनुपात नहीं लिखा है, तो कानूनन दोनों का आधा-आधा हिस्सा माना जाता है.
यदि डीड में स्पष्ट लिखा है कि पत्नी का हिस्सा 30 फीसदी और पति का 70 फीसदी है, तो उसी अनुपात को माना जाएगा. हालांकि, यदि महिला के पास पुख्ता सबूत हों कि उसने अन्य तरीकों से भी प्रॉपर्टी में निवेश किया था, तो कोर्ट में अन्य कारकों के आधार पर दावा किया जा सकता है.
'अच्छी बहू' या 'अच्छी पत्नी' बनने के सामाजिक भ्रम से बाहर निकलकर, हर महिला को संपत्ति से जुड़े फैसलों में अपनी कागजी और वित्तीय हिस्सेदारी को स्पष्ट रखना चाहिए, क्योंकि यही उनके सुरक्षित भविष्य की असली चाबी है.
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