भारत में पिछले कुछ सालों में प्रॉपर्टी के दाम आसमान छू रहे हैं, जिन लोगों ने समय रहते घर खरीद लिया, वे आज अपनी किस्मत पर खुश हो रहे हैं, लेकिन जो लोग अब भी घर की तलाश में हैं, उनके मन में डर और असमंजस का माहौल है. जिस तेजी से रियल्टी मार्केट का यह गुब्बारा फूल रहा है, उसे देखकर हर किसी के जहन में एक ही बड़ा सवाल है कि क्या भारतीय रियल एस्टेट मार्केट अब क्रैश होने की कगार पर है, या फिर यह रफ्तार अभी और बढ़ेगी? आजतक रेडियो के शो प्रॉपर्टी से फायदा में रियल एस्टेट एक्सपर्ट प्रदीप मिश्रा ने इन सवालों के जवाब दिए.
पिछले कुछ हफ्तों से सोशल मीडिया पर रियल एस्टेट को लेकर आपको डराने वाले थंबनेल्स और पोस्ट की बाढ़ दिख जाएगी. हर तरफ एक ही शोर है "प्रॉपर्टी मार्केट क्रैश होने वाला है", बबल फटने वाला है", "इवेंट्री बढ़ रही है और सेल्स ठप हो चुकी है." ऐसे में एक आम आदमी, जिसने अपनी जिंदगी भर की जमा-पूंजी किसी घर को खरीदने के लिए बचाकर रखी है, वह बुरी तरह भ्रमित और डरा हुआ है.
रियल एस्टेट एक्सपर्ट प्रदीप मिश्रा कहते हैं- 'भारतीय अर्थव्यवस्था पूरी तरह से ग्लोबल इकोनॉमी से जुड़ी हुई है. दुनिया के किसी भी कोने में होने वाली हलचल का असर हमारे देश पर पड़ता है. वर्तमान में जो वैश्विक तनाव और वॉर सिचुएशन बनी हुई है, उसका सीधा असर दो चीजों पर पड़ा है रुपए की गिरती कीमत और क्रूड ऑयल की बढ़ती दरें, जब अंतरराष्ट्रीय स्तर पर कच्चा तेल महंगा होता है, तो उसका असर केवल पेट्रोल-डीजल पर नहीं, बल्कि लॉजिस्टिक और ट्रांसपोर्टेशन महंगा होता है, माल ढुलाई का खर्च बढ़ जाता है. '
यह भी पढ़ें: बुर्ज खलीफा में घर, आलीशान महल...सतीश सनपाल ने कैसे बनाया $3 बिलियन का रियल एस्टेट साम्राज्य?
प्रदीप के मुताबिक कंस्ट्रक्शन इंडस्ट्री में इस्तेमाल होने वाला बहुत सा सामान विदेशों से आता है, जब डॉलर मजबूत और रुपया कमजोर होता है, तो इनपुट्स (लोहा, सीमेंट, फिनिशिंग मटेरियल) की कीमत बढ़ जाती है. जब बिल्डर या डेवलपर की इनपुट कॉस्ट ही इतनी बढ़ जाएगी, तो वह चाहकर भी प्रॉपर्टी के दाम नीचे नहीं कर सकता. यही वजह है कि वैश्विक मंदी के बावजूद भारत में कीमतें एक स्तर से नीचे नहीं गिर रही हैं.
क्रैश और करेक्शन में क्या अंतर है?
सोशल मीडिया पर सबसे ज्यादा इस्तेमाल होने वाला शब्द है 'मार्केट क्रैश', लेकिन प्रदीप मिश्रा इस दावे को पूरी तरह खारिज करते हैं. वे समझाते हैं कि 'क्रैश' और 'करेक्शन' दो बिल्कुल अलग चीजें हैं, क्रैश तब माना जाता है, जब बैंकिंग सिस्टम फेल हो जाए, डेवलपर्स पूरी तरह दिवालिया हो जाएं और बाजार में 'पैनिक सेलिंग' शुरू हो जाए. भारत में आज ऐसी कोई स्थिति नहीं है.
मार्केट करेक्शन क्या है?
जब कुछ संपत्तियों की कीमतें अपनी वास्तविक वैल्यू से बहुत ज्यादा हो जाती हैं, तो मार्केट उन्हें वापस सही स्तर पर लाता है, इस समय भारतीय बाजार इसी 'करेक्शन मोड' या 'कूलिंग पीरियड' से गुजर रहा है. बाजार में इस समय 5% से 10% तक का जो ठहराव या मामूली गिरावट दिख रही है, वह केवल उन प्रोजेक्ट्स में है जो लग्जरी के नाम पर ओवरप्राइस बेचे जा रहे थे. यह बाजार की मजबूती और स्थिरता का संकेत है, क्रैश का नहीं.
तो फिर इंटरनेट पर "Property Crash Coming Soon" जैसे ट्रेंड्स क्यों चल रहे हैं? इसका जवाब बहुत सीधा है डिजिटल दुनिया में डर सबसे ज्यादा बिकता है, पब्लिक को अपनी तरफ खींचने, ज्यादा से ज्यादा व्यूज, शेयर्स और लाइक्स पाने के लिए यह एक आजमाया हुआ सस्ता तरीका है, इन सनसनीखेज थंबनेल्स का बाजार की वास्तविक स्थिति से कोई लेना-देना नहीं है.
यह भी पढ़ें: होम लोन की EMI नहीं चुका पाए, तो क्या सच में बैंक जब्त कर लेगा आपका घर
डिमांड और सप्लाई का सबसे बड़ा गैप: अफोर्डेबल हाउसिंग
भारत के प्रॉपर्टी मार्केट के न डूबने की सबसे बड़ी वजह है यहां की परमानेंट डिमांड हालांकि, इस डिमांड का एक दूसरा पहलू भी है. भारत में दो तरह के खरीदार हैं HNI और ग्लोबल इन्वेस्टर्स जो भारी-भरकम पैसा प्रीमियम और लग्जरी प्रोजेक्ट्स में लगा रहे हैं.
आम मध्यमवर्गीय खरीदार जिन्हें निवेश के लिए नहीं, बल्कि रहने के लिए एक छत चाहिए. आज देश में रहने के लिए घरों की भारी शॉर्टेज है, आम आदमी घर खरीदना चाहता है, लेकिन बाजार में उसके बजट के हिसाब से 'अफोर्डेबल हाउसिंग' की सप्लाई ही नहीं है.
प्रदीप कहते हैं- 'मार्केट क्रैश तब माना जाता, जब मिडिल क्लास के लिए बने सस्ते घर भी न बिक रहे होते, यहां तो स्थिति उलट हैमांग बहुत ज्यादा है, लेकिन वैसी सप्लाई मौजूद नहीं है."
वैश्विक अनिश्चितताओं और इनफ्लेशन के कारण आम आदमी की परचेजिंग पावरपर असर पड़ा है. अब उसे अपनी हेल्थ, बच्चों की एजुकेशन और घर के बजट के बीच संतुलन बनाना पड़ रहा है, इसलिए खरीदार थोड़ा सोच-समझकर कदम उठा रहा है.
aajtak.in