क्या लखनऊ, पुणे और राजकोट जैसे कुछ ऐसे भी शहर हैं जिनके बारे में हमें पता ही नहीं है. हो सकता है कि भारत में जितने शहर सरकारी कागजों में दिखते हैं, असलियत में उससे कहीं ज्यादा हों. प्रधानमंत्री की आर्थिक सलाहकार परिषद (EAC-PM) की एक नई रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत में शहरीकरण सरकारी आंकड़ों से कहीं ज्यादा तेजी से हो रहा है.
रिपोर्ट के मुताबिक, इसका सीधा नुकसान वहां रहने वाले आम लोगों को झेलना पड़ रहा है, क्योंकि जो इलाके अब शहर बन चुके हैं, उन्हें आज भी ग्राम पंचायतें ही संभाल रही हैं. अब बेचारी पंचायतों के पास न तो इतना बजट होता है और ना ही वो संसाधन, जिससे वे ट्रैफिक जाम या कचरा प्रबंधन जैसी शहरों की बड़ी और जटिल समस्याओं से निपट सकें.
"भारत का छिपा हुआ शहरीकरण और नीतियां" नाम की एक रिपोर्ट में एक्सपर्ट्स (शमिका रवि, मनुज जोशी और अपूर्व कुमार मिश्रा) का कहना है कि भारत के करोड़ों लोग ऐसे इलाकों में रहते हैं, जो दिखने और काम में तो शहरों जैसे हैं, लेकिन कागजों पर उन्हें आज भी गांव ही माना जाता है. 2011 की गिनती के हिसाब से भारत के सिर्फ 31% लोग शहरों में रहते थे, लेकिन इस रिपोर्ट में सैटेलाइट के आंकड़ों के हवाले से बताया गया है कि भारत 2015 में ही 63% तक शहरी हो चुका था.
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इस रिपोर्ट के लेखक चेतावनी देते हैं कि कागजी रिकॉर्ड और जमीनी हकीकत के बीच का यह अंतर सरकारी कामकाज, सरकारी खर्च और बुनियादी ढांचे की प्लानिंग को बिगाड़ रहा है. यह बहस अब और भी महत्वपूर्ण हो गई है क्योंकि 'रजिस्ट्रार जनरल ऑफ इंडिया' ने दशकों के आंकड़ों की तुलना आसान बनाए रखने के लिए, आगामी 2027 की जनगणना में भी शहरों की वही परिभाषा रखने का सुझाव दिया है जो 2011 में थी.
हालांकि, इसके लेखकों का तर्क है कि भारत में शहरों का विकास आधी सदी पहले बनाई गई 'शहरी-ग्रामीण' की परिभाषाओं से कहीं आगे निकल चुका है. भारत में इस छिपे हुए शहरीकरण को लेकर चिंता पूरी तरह से नई नहीं है. अर्थशास्त्री उचिदा हिरोत्सुगु और एंड्रयू नेल्सन द्वारा विकसित विश्व बैंक के 'एग्लोमरेशन इंडेक्स' ने अनुमान लगाया था कि 2010 के दशक में ही भारत की 55.3% आबादी शहरों जैसे इलाकों में रह रही थी, इसमें इस बात पर जोर दिया गया था कि छिपे हुए शहरीकरण का एक बड़ा हिस्सा कानूनी रूप से तय शहर की सीमाओं के बाहर था.
भारत के शहर सामने होकर भी क्यों छिपे हैं?
EAC-PM के इस रिपोर्ट का मुख्य तर्क यह है कि भारत में प्रशासनिक व्यवस्था की तुलना में शहर और कस्बे कहीं ज़्यादा तेज़ी से बढ़ रहे हैं. रिपोर्ट में कहा गया है कि किसी इलाके को 'शहरी' या 'ग्रामीण' मानने से ही यह तय होता है कि वहां का सरकारी ढांचा कैसा होगा, वह किन योजनाओं के योग्य होगा और वहां सरकारी पैसा कितना खर्च किया जाएगा, इसके बावजूद, कई ऐसी जगहें जहां शहरों जैसी खूबियां हैं, वे सरकारी कागजों में आज भी ग्रामीण ही बनी हुई हैं.
रिपोर्ट कहती है, शहरी' और ग्रामीण के इस गलत वर्गीकरण के गंभीर नतीजे होते हैं. यह सही नीतियां बनाने में रुकावट डालता है, सरकारी संसाधनों का गलत इस्तेमाल करता है, और भारत के शहरीकरण की असली तस्वीर को छुपाता है. आगे कहा गया है, "नीति निर्माता अक्सर इस गलत धारणा पर काम करते हैं कि 'ग्रामीण' का मतलब 'गरीब' होता है और इसी वजह से वे 'ग्रामीण' घोषित इलाकों में सुविधाएं देने पर ज़्यादा संसाधन खर्च करते हैं.
रिपोर्ट यह भी बताती है कि राज्य सरकारें 'वैधानिक कस्बों' को अधिसूचित करती हैं, जबकि जनगणना विभाग अलग से 'जनगणना कस्बों' की पहचान करता है.
किसी बस्ती को 'जनगणना कस्बा' तब माना जाता है जब उसकी आबादी 5,000 से अधिक हो, जनसंख्या घनत्व 400 व्यक्ति प्रति वर्ग किलोमीटर से ज़्यादा हो, और वहां की कम से कम 75% कामकाजी पुरुष आबादी खेती के अलावा दूसरे कामों में लगी हो. इस रिपोर्ट में कहा गया है कि शहरों की तरह काम करने के बावजूद ऐसी कई बस्तियों का कामकाज आज भी गांवों की तरह ही चलाया जा रहा है.
इसका नतीजा यह है कि भारत में ऐसी बड़ी संख्या में जगहें हैं जो दिखने में शहरी हैं, जिनका काम शहरी है और जहाँ की कमाई भी शहरों जैसी है, लेकिन कागजों पर वे आज भी ग्रामीण ही हैं.
भारत असल में कितना शहरी है?
भारत कितना शहरी है, इसका जवाब इस बात पर निर्भर करता है कि आप किस परिभाषा का इस्तेमाल करते हैं. EAC-PM के इस पेपर के अनुसार, 2011 की जनगणना में आधिकारिक तौर पर केवल 31.1% भारतीय ही शहरी थे. हालांकि, लेखकों द्वारा बताए गए शोध एक बिल्कुल अलग ही तस्वीर पेश करते हैं. इस रिपोर्ट में, उन्होंने 'जनाग्रह फाउंडेशन' के एक अध्ययन का हवाला दिया है, जिसके अनुमान के मुताबिक 2024 में 28% भारतीय वैधानिक कस्बों में रह रहे थे.
लेकिन 'ग्लोबल ह्यूमन सेटलमेंट लेयर' (GHSL) के सैटेलाइट-आधारित आंकड़ों से पता चलता है कि भारत 2015 में ही 63% तक शहरी हो चुका था. रिपोर्ट कहती है, "जिस बात में कोई शक नहीं है वो यह है कि मौजूदा वर्गीकरण, जो प्रशासनिक परिभाषा और जनगणना के पैमानों को मिलाकर इस्तेमाल किया जाता है, भारत के शहरीकरण की पूरी तस्वीर दिखाने में नाकाफी है..."
इस शोध पत्र में दिए गए आर्थिक सर्वेक्षण 2025-26 के हवाले से केरल का उदाहरण सामने रखा गया है. राज्य में आधिकारिक (शहरीकरण करीब 54% आंका गया है, लेकिन जब भौगोलिक रूप से पहचाने गए इलाकों को भी इसमें शामिल कर लिया जाता है, तो यह आंकड़ा बढ़कर लगभग 81% हो जाता है.
विश्व बैंक के 'एग्लोमरेशन इंडेक्स' ने क्या पाया?
सैटेलाइट-आधारित शहरीकरण के अनुमान लोकप्रिय होने से बहुत पहले, विश्व बैंक ने भारत में शहरीकरण को एक अलग नज़रिए से मापने की कोशिश की थी, 'एग्लोमरेशन इंडेक्स' तीन चीज़ों के आधार पर इलाकों का वर्गीकरण करता था. जनसंख्या घनत्व, किसी बड़े शहरी केंद्र से नजदीकी, और उस केंद्र तक पहुंचने में लगने वाला सफर का समय. इस तरीके का इस्तेमाल करने पर, 2010 में ही भारत के 55.3% शहरी होने का अनुमान लगाया गया था.
इन नतीजों से पता चला कि शहरीकरण नगर पालिकाओं की सीमाओं और आधिकारिक शहर के दायरों से कहीं आगे तक फैल चुका था, EAC-PM की हालिया रिपोर्ट इस अनुमान का हवाला देकर यह साबित करती है कि भारत के शहरी विस्तार को सालों से कम करके आंका गया है. इसमें यह भी कहा गया है कि 'DEGURBA' जैसे वैश्विक ढांचे शहरी बस्तियों की पहचान के लिए सिर्फ सरकारी कागजों के बजाय तेजी से सैटेलाइट तस्वीरों और पॉपुलेशन ग्रिड पर भरोसा कर रहे हैं.
जनगणना 2027 क्यों महत्वपूर्ण है?
भारत के शहरीकरण को सही तरीके से मापना इसलिए बहुत ज़रूरी है, क्योंकि 2027 की जनगणना जो कि पहली डिजिटल जनगणना होगी उसमें भी वही पुरानी परिभाषा इस्तेमाल किए जाने की उम्मीद है जो 2011 की जनगणना में की गई थी. रिपोर्ट कहती है, "'जनगणना कस्बे' की परिभाषा 1971 के बाद से नहीं बदली है और 2027 की जनगणना में भी इसी परिभाषा को जारी रखने की योजना है."
EAC-PM रिपोर्ट के लेखकों के अनुसार, इस पुराने तरीके पर टिके रहना एक बहुत बड़ी कमी है. यह शर्त कि '75% कामकाजी पुरुष आबादी गैर-कृषि कार्यों में लगी हो', एक ऐसी अर्थव्यवस्था को दर्शाती है जो आज के भारत से बहुत अलग थी. आज के भारत में अनौपचारिक सेवाएं, प्लेटफॉर्म वर्क आने-जाने के तौर-तरीके और मिली-जुली आजीविका ने ग्रामीण और शहरी के बीच के पारंपरिक अंतर को खत्म कर दिया है.
इसलिए, यह रिपोर्ट हर दस साल में होने वाली जनगणना पर पूरी तरह निर्भर रहने के बजाय एक ऐसे आधुनिक ढांचे की मांग करती है जिसमें तकनीक, कामकाज के तौर-तरीके और आबादी के नए आंकड़ों को शामिल किया जाए.
छिपा हुआ शहरीकरण सरकारी कामकाज के लिए एक समस्या क्यों है?
EAC-PM रिपोर्ट के लेखकों का तर्क है कि शहरीकरण को कम आंकने का बुरा असर नीतियों को बनाने, उन्हें लागू करने और उनके क्रियान्वयन पर पड़ता है. भारत में तेज़ी से बढ़ रही कई बस्तियों का कामकाज आज भी पंचायतों द्वारा चलाया जा रहा है, जिन्हें ग्रामीण प्रशासन के लिए बनाया गया था, जबकि ये इलाके ट्रैफिक जाम, सीवेज ट्रीटमेंट, कचरा प्रबंधन और घरों की मांग जैसी शहरी समस्याओं का सामना कर रहे हैं. इसलिए, इन्हें ऐसे शहरी प्रशासनिक निकायों की ज़रूरत है जिनके पास इन समस्याओं से निपटने के लिए अधिकार और संसाधन दोनों हों.
इसमें एक चेतावनी के तौर पर गुरुग्राम का उदाहरण दिया गया है. एक बड़ा आर्थिक केंद्र बनने के बावजूद, 2008 तक इस शहर के पास अपनी नगर निगम नहीं थी, और बाद में इसे जलभराव, ट्रैफिक की समस्याओं और प्लानिंग की कमियों से जूझना पड़ा. हकीकत तो यह है कि मानसून आते ही गुरुग्राम का 'मिलेनियम सिटी' का तमगा छिन जाता है. इस पेपर में नीति आयोग (NITI Aayog) की एक रिपोर्ट का भी हवाला दिया गया है, जिसमें चेतावनी दी गई थी कि "अगर चीजें ऐसे ही चलती रहीं, तो देश अनियोजित शहरीकरण का अड्डा बन सकता है.
भारत के छिपे हुए शहरीकरण का समाधान क्या है?
हर बार जनगणना के चक्र का इंतज़ार करने के बजाय, लेखक दिन के समय की सैटेलाइट तस्वीरों का उपयोग करके "बिल्ट-अप वॉल्यूम को मापने का सुझाव देते हैं, यह एक ऐसा पैमाना है जो इमारतों और बुनियादी ढांचे के फैलाव और उनकी ऊंचाई दोनों को जोड़कर देखता है. रिपोर्ट कहती है, "इसलिए, हम शहरीकरण की स्थिति और शहरी समूहों के औसत आकार को आंकने के लिए एक आधुनिक स्रोत के रूप में, बिल्ट-अप वॉल्यूम को मापने के लिए दिन के समय के सैटेलाइट डेटा के उपयोग की सिफारिश करते हैं.
लेखक बताते हैं, "भारत को 'विकसित भारत' बनाने और अनियोजित विकास से पैदा होने वाली आधुनिक समस्याओं को रोकने के लिए शहरीकरण की तरफ एक व्यवस्थित नजरिया अपनाना सबसे महत्वपूर्ण जरूरतों में से एक है. इस पूरी रिपोर्ट का बड़ा संदेश यह है कि भारत को शहरीकरण को केवल आबादी पर आधारित कागजी सरकारी लेबल से मापना बंद करना चाहिए. इसके बजाय उसे यह देखना चाहिए कि सैटेलाइट तस्वीरें, आर्थिक गतिविधियां और जमीनी हकीकत क्या बयां कर रही हैं.
सुशीम मुकुल