भारत के हाउसिंग मार्केट में बढ़ता हुआ अंतर साफ दिख रहा है, जहां प्रीमियम और लग्जरी रेजिडेंशियल प्रोजेक्ट्स की मांग है और वे ज़्यादा मुनाफे के कारण डेवलपर्स को आकर्षित कर रहे हैं, वहीं कम आय वाले परिवारों के लिए सस्ते घरों को कई चुनौतियों का सामना करना पड़ रहा है. इससे देश के मिडिल क्लास लोगों में चिंताएं पैदा हो रही हैं.
KPMG इन इंडिया और नेशनल रियल एस्टेट डेवलपमेंट काउंसिल (NAREDCO) की एक संयुक्त रिपोर्ट के अनुसार, आने वाले दशकों में तेजी से हो रहे शहरीकरण के कारण घरों की मांग बढ़ेगी, जिससे यह अंतर और भी साफ हो सकता है. रिपोर्ट में अनुमान लगाया गया है कि 2036 तक भारत की लगभग 40% आबादी शहरी इलाकों में रहेगी और 2050 तक आधी आबादी शहरों में रहने लगेगी. अनुमान लगाया गया है कि 2047 तक देश का रियल एस्टेट सेक्टर $5.8 ट्रिलियन तक पहुंच जाएगा.
प्रीमियम हाउसिंग की ज्यादा डिमांड
पिछले कुछ सालों से डेवलपर्स मिडिल-इनकम, लग्जरी और अल्ट्रा-लग्जरी हाउसिंग सेगमेंट पर ज्यादा ध्यान दे रहे हैं. महामारी के बाद मजबूत डिमांड, अमीर खरीदारों की बढ़ती इनकम और बेहतर मुनाफे ने प्रीमियम प्रोजेक्ट्स को ज़्यादा आकर्षक बना दिया है. यह ट्रेंड बड़े शहरों में साफ तौर पर देखा जा सकता है, जहां डेवलपर्स ने अमीर खरीदारों के लिए बड़े घर और हाई-एंड प्रोजेक्ट्स लॉन्च किए हैं. प्रीमियम प्रॉपर्टीज को ग्राहकों की बदलती पसंद का भी फायदा मिला है, क्योंकि कोविड-19 महामारी के बाद घर खरीदने वाले लोग ज़्यादा जगह और बेहतर लाइफस्टाइल सुविधाओं वाले घर चाहते हैं.
किफायती घरों पर दबाव
जिन वजहों से लग्जरी घरों की मांग बढ़ी है, उन्हीं वजहों से किफायती घरों के लिए मुश्किलें भी पैदा हुई हैं.
KPMG-NAREDCO की रिपोर्ट के अनुसार, महामारी के बाद जमीन की बढ़ती कीमतों ने आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों और कम आय वाले लोगों के लिए बनाए जाने वाले प्रोजेक्ट्स पर काफी असर डाला है.
डेवलपर्स के लिए इन कैटेगरीज में मुनाफ़ा बनाए रखना मुश्किल होता जा रहा है, जिससे घरों की सप्लाई की रफ़्तार धीमी हो गई है. रिपोर्ट में कुछ चुनौतियों की ओर भी इशारा किया गया है, जैसे कि फ्लोर एरिया रेश्यो (FAR) और फ्लोर स्पेस इंडेक्स (FSI) के कड़े नियम, मंज़ूरी मिलने की लंबी प्रक्रिया और कम लागत वाले फ़ाइनेंस तक सीमित पहुंच. कानूनी विवादों, खराब कनेक्टिविटी या बुनियादी सुविधाओं की कमी के कारण ज़मीन के कई टुकड़े पूरी तरह इस्तेमाल नहीं हो पा रहे हैं.
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किफायती घरों के लिए फ़ाइनेंस देने वाली कंपनियों को बैंकों की तुलना में ज़्यादा लागत पर लोन लेना पड़ता है, जबकि टियर-II और टियर-III बाज़ारों में, जहां घरों की मांग बढ़ रही है, क्रेडिट की पहुंच अभी भी कम है.
रिपोर्ट में चेतावनी दी गई है कि अगर देश को सबका विकास सुनिश्चित करना है, तो किफ़ायती आवास भारत के शहरी विकास एजेंडे का मुख्य हिस्सा होना चाहिए.
क्या किया जा सकता है?
इस सेक्टर को फिर से मज़बूत करने के लिए, KPMG और NAREDCO ने मास्टर प्लान में EWS और LIG हाउसिंग के लिए 5-5% रिहायशी ज़मीन आरक्षित करने, मंज़ूर FAR बढ़ाने, सेटबैक और पार्किंग के नियमों में ढील देने और सिंगल-विंडो मंज़ूरी सिस्टम शुरू करने की सलाह दी है.
रिपोर्ट में किफायती आवास को ज़्यादा व्यावहारिक बनाने के लिए कम लागत वाली फंडिंग, लंबी अवधि के होम लोन और खास टैक्स छूट देने की भी वकालत की गई है. जैसे-जैसे भारत के शहर बढ़ रहे हैं, नीति-निर्माताओं और डेवलपर्स के लिए चुनौती यह सुनिश्चित करना होगा कि हाउसिंग मार्केट 'दो भारत' की कहानी न बन जाए एक तरफ़ लग्ज़री टावर हों और दूसरी तरफ़ ऐसे लोग हों जो अपनी पहुंच के दायरे में घर पाने के लिए संघर्ष कर रहे हों.
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