सन्नाटा, अंधेरा और डर... दिल्ली का पहला मॉल क्यों बन गया 'भूतिया शहर'!

दिल्ली का अंसल प्लाजा मॉल जो कभी इस शहर की शान हुआ करता था, जिसने दिल्ली के लोगों की मॉल कल्चर से पहचान कराई वो मॉल आज वीरान पड़ा है और लोग अब वहां जाने से भी डरने लगे हैं.

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दिल्ली के इस मॉल से जाने से क्यों डरते हैं लोग? (Photo-ITG) दिल्ली के इस मॉल से जाने से क्यों डरते हैं लोग? (Photo-ITG)

टियासा भोवाल

  • नई दिल्ली,
  • 23 फरवरी 2026,
  • अपडेटेड 3:28 PM IST

कोई भी चीज हमेशा के लिए नहीं रहती, यहां तक कि वे जगहें भी नहीं जो कभी किसी शहर की पहचान हुआ करती थीं. दिल्ली में ये बात और भी गहरी महसूस होती है जब आप अंसल प्लाजा में कदम रखते हैं.

1999 में दक्षिण दिल्ली में शुरू हुआ यह राजधानी का पहला मॉल था, उस शहर के लिए एक बिल्कुल नई चीज, जिसने तब तक 'वीकेंड मॉल कल्चर' का स्वाद नहीं चखा था. किसी दिल्लीवासी 'बूमर' या 'मिलेनियल' से इसके बारे में पूछें, तो वे इसके बारे में उसी चाहत से बात करेंगे जो आमतौर पर पहले प्यार के लिए सुरक्षित रखी जाती है. वहीं, जो लोग DLF प्रोमेनेड या सेलेक्ट सिटीवॉक के इर्द-गिर्द घूमते हुए बड़े हुए हैं, वे कभी नहीं समझ पाएंगे कि अंसल प्लाजा का असल में क्या महत्व था. 

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डेंटिंग का ठिकाना था ये मॉल

अंसल प्लाजा वह जगह थी जहां दिल्ली ने पहली बार मॉल कल्चर को देखा था. यहां शहर का पहला शॉपर्स स्टॉप खुला था, उस दौर में मैकडॉनल्ड्स सिर्फ एक फास्ट-फूड जॉइंट नहीं था. वह डेटिंग के लिए एक खास ठिकाना हुआ करता था. यहां के एम्फीथिएटर में अक्सर कॉन्सर्ट और फिल्मों के प्रमोशन होते थे. म्यूजिक वर्ल्ड उस पीढ़ी को कैसेट और सीडी बेचता था, जिसका अभी स्ट्रीमिंग की दुनिया से परिचय नहीं हुआ था.

पत्रकार देबाश्री मोहंती को इसे ईंट-दर-ईंट बनते देखना आज भी याद है. उनके पिता, जो उस समय एक वरिष्ठ नौकरशाह थे, पास के हुडको प्लेस कॉम्प्लेक्स के सरकारी आवास में रहते थे. वे याद करते हुए कहती हैं, "जब अंसल ने घोषणा की कि इसी गेटेड कॉम्प्लेक्स के भीतर एक मॉल आने वाला है, तो ऐसा लगा मानो दुनिया का केंद्र हमारे दरवाजे पर ही आ गया हो."

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वहां मैकडॉनल्ड्स था, शॉपर्स स्टॉप था, जूतों की दुकानें थीं और एक एथनिक वियर ब्रांड जिसे हर कोई पहचानता था. एक पब भी था जो उभरते हुए 'पार्टी कल्चर' की ज़रूरतें पूरी करता था, लेकिन असली आकर्षण था इसका सेंट्रल एट्रियम जो एक परफॉरमेंस स्पेस के रूप में भी काम करता था. देबाश्री कहती हैं, "मुझे वहां के कॉन्सर्ट याद हैं, और खास तौर पर वह बड़ा इवेंट जब पलाश और यूनफोरिया ने परफॉर्म किया था."

अंसल प्लाजा सिर्फ एक शॉपिंग कॉम्प्लेक्स से कहीं बढ़कर था. उस दौर में बड़े हो रहे युवाओं के लिए, यह एक विचार था, एक हैंगआउट स्पॉट था और एक नए तरह के शहरी जीवन का प्रतीक था. सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि यह पहली ऐसी जगह थी, जहां लोग महज़ मौज-मस्ती करने जा सकते थे.

इंडिया टुडे ने हाल ही में रिपोर्ट दी थी कि कैसे नोएडा का कभी बेहद मशहूर रहा 'द ग्रेट इंडिया प्लेस' जिसे लोग GIP के नाम से बेहतर जानते हैं, अब लगभग वीरान पड़ा है और उसकी पुरानी रौनक छिन चुकी है. एनसीआर के परिवारों के लिए कभी वीकेंड का मुख्य ठिकाना रहने वाला यह मॉल अब अपने पुराने स्वरूप का एक ढांचा मात्र रह गया है. इसने मुझे सोचने पर मजबूर कर दिया. दिल्ली के पहले मॉल का क्या हुआ होगा? इसलिए, मैं इसका पता लगाने निकल पड़ी.

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'घोस्ट टाउन' जैसा दिखता है ये मॉल

अंसल प्लाजा तक जाने वाले रास्ते पर रोशनी बहुत कम है. कहीं कोई साइनबोर्ड नहीं है. पार्किंग लॉट, जहां कभी भारी भीड़ और अफरा-तफरी होती थी, अब लगभग खाली है. अंदर भी, एक सन्नाटा पसरा हुआ है जिसे साफ महसूस किया जा सकता है. मैकडॉनल्ड्स और केएफसी उन कुछ आउटलेट्स में से हैं जो अभी भी ठीक-ठाक चल रहे हैं. परिसर में 'गेम पलासियो' (Game Palacio) नाम का एक गेमिंग आर्केड भी है, लेकिन वहां आने वाले लोगों की संख्या बहुत कम है.

इसके अलावा, मॉल में अब ज़्यादातर दुकानों का स्टाफ, सुरक्षा गार्ड और ऑर्डर लेने आने वाले डिलीवरी एग्जीक्यूटिव ही नज़र आते हैं. मॉल की एस्केलेटर काम नहीं कर रही हैं. शौचालय गंदे हैं और लिफ्ट का कोई भरोसा नहीं है. कुछ हिस्से आधे-अधूरे रेनोवेट किए हुए लगते हैं, तो कुछ बिल्कुल उपेक्षित. हर तरफ पान के दाग हैं, और मॉल इतना खाली है कि सीढ़ियों का इस्तेमाल करना वाकई डरावना महसूस होता है.  

लोगों की भीड़ हुई कम

ऊपरी मंजिलों पर एक सरकारी बैंक का दफ्तर और कुछ निजी कंपनियां हैं, जो व्यावसायिक से ज्यादा कामकाजी. मॉल के एक पब के 'केयरटेकर' ने अपना नाम न छापने की शर्त पर बताया कि बिजनेस बमुश्किल ही चल पा रहा है. वे कहते हैं, "हम लगभग 3.5 लाख रुपये किराया देते हैं. यहां आने वाले लोगों की संख्या इतनी कम है कि हम इसकी भरपाई भी नहीं कर पाते. लिफ्ट ठीक से काम नहीं करतीं, एस्केलेटर बंद पड़े हैं. जब हम मैनेजमेंट के पास जाते हैं, तो कुछ नहीं बदलता. हम बस किसी तरह गुजारा कर रहे हैं."

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उन्होंने एक और चिंता की ओर इशारा करते हुए बताया कि परिसर के भीतर स्थित एक शराब की दुकान की वजह से भी सुरक्षा एक बड़ी चिंता है. "हमने इसके लिए अलग एंट्री और एग्जिट की मांग की है. यहां आने वाला हर व्यक्ति नेक इरादे से नहीं आता. इससे माहौल असुरक्षित महसूस होता है."

यह असुरक्षा सिर्फ एक खयाल नहीं है. मेरी यात्रा के दौरान, कुछ लोग फब्तियां कस रहे थे और घूर रहे थे, जो वाकई असहज करने वाला था खाली गलियारे, धुंधली सीढ़ियां और लगभग सुनसान मंजिलें इस जगह को एक अजीब सा डरावना और बेचैन करने वाला माहौल देती हैं. रिटेलर्स भी मानते हैं कि व्यापार बहुत कम है. कई लोगों ने दोटूक शब्दों में कहा, "यहां ग्राहक ही नहीं हैं." एक ज्वेलरी स्टोर के कर्मचारी ने अपने टिके रहने की वजह अलग बताई- "हमारा अपना एक पुराना ग्राहक आधार है. हम अचानक अंदर आने वाले ग्राहकों पर निर्भर नहीं हैं."

और फिर यहां के स्पा हैं, जो चल तो रहे हैं, लेकिन जिनके बारे में कोई भी रिकॉर्ड पर बोलने को तैयार नहीं है. हालांकि अंसल प्लाजा अपनी चमक बहुत पहले ही खो चुका था, लेकिन पहली बार लगभग गुमनामी में चले जाने के बाद, 2016 में इसे एक 'दूसरा जीवन' मिला था. मॉल को 16 नए ब्रांडों के साथ फिर से लॉन्च किया गया, जिसमें डेकाथलॉन (Decathlon) मुख्य ब्रांड था. क्या यह काम कर पाया? बिल्कुल नहीं! एक साल के भीतर ही चीजें बिगड़ने लगीं. जिस डेकाथलॉन के भरोसे इसे दोबारा खड़ा किया गया था, वह भी 2023 के आसपास बंद हो गया, और बाकी जो हुआ, वह अब इतिहास है.

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यह विफल क्यों हुआ?

कुछ लोग इसका कारण प्रतिस्पर्धा को मानते हैं. साकेत और वसंत कुंज के नए मॉलों में मल्टीप्लेक्स, विशाल फूड कोर्ट और बेहतर इंफ्रास्ट्रक्चर मिलने लगा, जिससे अंसल प्लाजा दोबारा लॉन्च होने के बाद भी मुकाबला नहीं कर सका. कुछ अन्य लोग इसके लिए मैनेजमेंट की लापरवाही को जिम्मेदार ठहराते हैं.

वक्त ने भी साथ नहीं दिया. 2016 में इसके पुनरुद्धार का समय नोटबंदी के साथ टकरा गया, जिसने खुदरा बाजार के खर्चों पर ऐसा प्रहार किया जिसे झेलने के लिए यह तैयार नहीं था. या शायद, जैसा कि कुछ अंधविश्वासी लोग आज भी फुसफुसाते हैं- "क्या यह उपहार का शाप है?

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