पिछले कुछ महीनों में सरकार ने एक के बाद एक कई कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी OFS के जरिए बेची है और हजारों करोड़ रुपये हासिल किया है. साथ ही कुछ अन्य बड़ी कंपनियों में भी हिस्सेदारी बेचने की चर्चा चल रही है. सरकार ने इस साल तीन कंपनियों में 12,000 करोड़ से ज्यादा की हिस्सेदारी बेची है और 4000 करोड़ रुपये से ज्यादा के रकम प्रॉसेस में भी हैं.
सरकार, PSU कंपनियों में हिस्सेदारी ऐसे समय में बेच रही है, जब ग्लोबल स्तर पर उथल-पुथल मची हुई है. भारतीय करेंसी में गिरावट देखी गई है. शेयर बाजार में भी लगातार गिरावट आई और बाजार 1 साल के निचले स्तर के करीब पहुंच गया है.
ऐसे में सवाल साफ है कि क्या सरकार अचानक से एक के बाद एक कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी क्यों बेचने लगी है? क्या सरकार के पास पैसे की कमी है? या सच में कुछ बड़ी दिक्कत पैदा होने वाली है? इस रिपोर्ट में इन्हीं सभी सवालों के जवाब ढूंढ़ने की कोशिश की गई है.
सरकार ने FY27 में कितनी कंपनियों में बेची हिस्सेदारी
केंद्र सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 में OFS के जरिए तीन बड़ी कंपनियों में हिस्सेदारी बेची है. मई 2026 में सरकार ने सेंट्रल बैंक ऑफ इंडिया में 8.08% की हिस्सेदारी बेची, जिसके जरिए 2,266 करोड़ रुपये जुटाए. इसके अलावा, मई में ही सरकार ने एक और सरकारी कंपनी कोल इंडिया में 2 फीसदी की हिस्सेदारी बेची, जिसके तहत 5,000 करोड़ रुपये जुटाए.
3 जून 2026 को सरकार ने NHPC Limited में 6 फीसदी हिस्सा बेचने के लिए OFS लॉन्च किया है और 4,300 करोड़ रुपये जुटाने का टारगेट रखा है. इससे पहले, सरकार ने फरवरी 2026 में BHEL में 5 फीसदी हिस्सेदारी बेची थी, जिसके तहत 4,422 करोड़ रुपये जुटाए थे.
क्यों कंपनियों में हिस्सेदारी बेच रही सरकार?
दरअसल, सरकार द्वारा PSU कंपनियों में हिस्सेदारी बेचने का मतलब सिर्फ पैसा जुटाना ही नहीं है, बल्कि इसके पीछे कई आर्थिक, वित्तीय और मार्केट से जुड़े उद्देश्य होते हैं. इसका मतलब ये नहीं होता है कि देश में पैसे की कमी है या कुछ बड़ी दिक्कत आने वाली है. सरकार अलग-अलग वजहों से हिस्सेदारी बेचती है. आइए जानते हैं कौन-कौन से वजहें हैं...
इस बार के बजट में सरकार ने वित्त वर्ष 2026-27 के लिए विनिवेश के जरिए हिस्सेदारी बेचकर 80,000 करोड़ रुपये जुटाने का प्लान रखा है, क्योंकि सरकार को हर साल सड़क, रेलवे, डिफेंस, स्वास्थ्य, शिक्षा और कल्याणकारी योजनाओं पर भारी खर्च करना पड़ता है. ऐसे में सरकारी कंपनियों में कुछ हिस्सेदारी बेचकर सरकार बिना नया टैक्स लगाए धन जुटा लेती है. अभी सरकार को Coal India, NHPC, BHEL और Central Bank of India में हिस्सेदारी बिक्री से 12 हजार करोड़ रुपये जुटा चुकी है या जुटाने के प्रॉसेस में है.
राजकोषीय घाटा को कंट्रोल करना
जब सरकार की आय उसके खर्च से कम होती है, तो राजकोषीय घाटा बढ़ता है. हिस्सेदारी बेचकर या विनिवेश से मिलने वाली राशि इस घाटे को कम करने में मदद करती है.
SEBI के नियमों का पालन
भारतीय बाजार नियामक सिक्योरिटी एंड एक्सचेंज बोर्ड ऑफ इंडिया (SEBI) के अनुसार लिस्टेड कंपनियों में कम से कम 25% पब्लिक शेयरहोल्डिंग होनी चाहिए. कई सरकारी कंपनियों में सरकार की हिस्सेदारी 75% से अधिक है. इसलिए सरकार को समय-समय पर हिस्सेदारी घटानी पड़ती है.
शेयरों में लिक्विडिटी बढ़ाना
जब शेयर बाजार में शेयरों की संख्या बढ़ती है तो ट्रेडिंग वॉल्यूम बढ़ता है, जिससे शेयरों की खरीद-बिक्री आसान हो जाती है. इससे कंपनी के शेयरों में बेहतर प्राइस डिसकवर होती है और कई बड़े निवेशक भी आकर्षित होते हैं, जिससे बाजार में लिक्विडिटी बढ़ती है और कंपनी के शेयरों और बाजार को मजबूती मिलती है.
क्या सरकार हिस्सेदारी बेचकर इन कंपनियों में कंट्रोल खो देगी?
कोल इंडिया में हिस्सेदारी बेचने के बाद भी सरकार का कंट्रोल 60 फीसदी है. इसी तरह, NHPC Limited में सरकार की हिस्सेदारी 65% के आसपास रहेगी. LIC जैसी कंपनियों में सरकार अभी भी 96.5% हिस्सेदारी रखती है. सरकार जिन कंपनियों में 75 फीसदी या उससे ज्यादा का हिस्सा कंट्रोल करती है, उसी कंपनी का OFS या IPO आने की संभावना रहती है.
अभी किन-किन कंपनियों में हिस्सा बेचने की चर्चा?
वित्त वर्ष 2026-27 में सरकार ने कई कंपनियों में हिस्सेदारी बेचकर हजारों करोड़ जुटाने वाली है. इसमें दो कंपनियों के आईपीओ और कुछ कंपनियों के OFS जारी होने वाले हैं. इसके साथ ही FPO के जरिए भी सरकार हिस्सेदारी बेच सकती है.
जितना लक्ष्य, उतना पैसे नहीं जुटा पाती सरकार
भले ही सरकार एक बाद बाद एक सरकारी कंपनियों में अपनी हिस्सेदारी घटा रही है, लेकिन फिर भी वह हर साल धन जुटाने का टारगेट हासिल नहीं कर पाती है. सरकार वित्त वर्ष के बजट के लिए प्लान करती है कि वह IPO, OFS या अन्य तरीके से पैसे जुटाकर हेल्थ, सड़क, रेलवे, डिफेंस और सरकारी योजनाओं पर खर्च करेगी, लेकिन वह उतने पैसे नहीं जुटा पाती है. पिछले पांच साल के आंकड़े को देखें तो करीब 2.25 लाख करोड़ रुपये जुटाने का टारगेट था, लेकिन 92,384 करोड़ रुपये ही जुटा पाए.
सरकार के लिए ये एक चिंता की बात
ऊपर दिए गए आंकड़े भले ही कोई दिक्कत नहीं होने की गवाही देते हों, लेकिन एक चिंता की बात अभी भी है. अक्सर देखा जाता है कि सरकार तभी OFS या सरकारी कंपनियों का IPO लेकर आती है, जब शेयर बाजार रिकॉर्ड हाई के करीब होता है या फिर मार्केट में सबकुछ ठीक चल रहा होता है. लेकिन इस बार सरकार तब OFS जारी कर रही है, जब भारतीय बाजार दबाव में है और जनवरी से लेकर अभी तक बाजार में बड़ी गिरावट आ चुकी है. NIFTY इस साल करीब 11 फीसदी नीचे है, और सेंसेक्स 13 फीसदी गिर चुका है. ऐसे में सरकार को कम प्राइस पर कंपनियों में हिस्सेदारी बेचनी पड़ रही है. हालांकि, ये सरकार की जरूरत पर भी निर्भर कर सकता है.
हिमांशु द्विवेदी