ईरान-इजरायल और अमेरिका की जंग से बढ़ी ग्लोबल टेंशन कम होने का नाम नहीं ले रही है. US-Iran में शांति समझौता हो पाता, उससे पहले ही इजरायल और ईरान में फिर से शुरू हुए युद्ध ने चिंता बढ़ा दी है. 28 फरवरी को शुरू हुए मिडिल ईस्ट संघर्ष को अब 100 दिन हो चुके हैं और इसका असर सिर्फ युद्ध क्षेत्र तक सीमित नहीं रह गया है, बल्कि विश्व बैंक के नए आंकड़ों के मुताबिक, दुनिया की इकोनॉमी (Global Economy) के लिए बड़ा संकट खड़ा कर रहा है.
इस युद्ध को लेकर दुनिया की सबसे बड़ी शिपिंग कंपनियों में से एक मेर्स्क (Maersk) की चेतावनी और OECD के ताजा अनुमान एक ही ओर इशारा कर रहे हैं कि अगर संघर्ष लंबा खिंचता है, तो इसका असर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर और गहरा हो सकता है.
दिखने लगे बुरे संकेत
मिडिल ईस्ट युद्ध के बुरे संकेत वैश्विक व्यापार में साफ दिखाई देने लगे हैं. विश्व बैंक का ग्लोबल सप्लाई चेन स्ट्रेस इंडेक्स पिछले कुछ महीनों में तेजी से बढ़ा है. यह इंडेक्स दुनिया भर में कंटेनर शिपिंग में होने वाली देरी को मापता है और ग्लोबल ट्रेड नेटवर्क पर पड़ रहे दबाव का एक महत्वपूर्ण संकेतक माना जाता है.
आंकड़े देखें तो मई 2026 तक देरी से फंसी शिपिंग क्षमता 2.06 मिलियन TEU तक पहुंच गई है. TEU कंटेनर शिपिंग क्षमता मापने की मानक इकाई है. यह आंकड़ा मार्च 2022 के 2.16 मिलियन TEU के स्तर के काफी करीब है. यानी सप्लाई चेन पर दबाव फिर उन स्तरों के आसपास पहुंच रहा है, जो कोविड-19 (Covid-19) के बाद वैश्विक व्यापार में आई बड़ी बाधाओं के दौरान देखा गया था.
शिपिंग कंपनियों पर बढ़ रहा दबाव
युद्ध का असर शिपिंग कंपनियों पर भी साफ दिख रहा है. दुनिया की सबसे बड़ी कंटेनर शिपिंग कंपनियों में शामिल मेर्स्क का कहना है कि इस संघर्ष की वजह से उसकी लागत हर महीने करीब 500 मिलियन डॉलर बढ़ गई है. इसके पीछे ईंधन की बढ़ती कीमतें और महंगा होता इंश्योरेंस कवर प्रमुख कारण हैं.
कंपनी ने बड़ी चेतावनी देते हुए कहा है कि अगर ट्रेड रूट्स में रुकावट जारी रही, तो फिर इसका सीधा असर सिर्फ शिपिंग सेक्टर तक सीमित नहीं रहेगा, जो कंपनियां वैश्विक व्यापार पर निर्भर हैं, उन्हें माल ढुलाई के लिए ज्यादा खर्च करना पड़ेगा और इस अतिरिक्त खर्च का कुछ हिस्सा ग्राहकों पर बोझ बढ़ाएगा.
महंगाई का बड़ा खतरा सामने!
जब माल ढुलाई महंगी होती है, तो कारोबारियों की लागत बढ़ती है. कच्चे माल से लेकर तैयार प्रोडक्ट्स तक, सभी पर खर्च बढ़ सकता है और कंपनियां इनके दाम बढ़ाने पर मजबूर हो सकती हैं.
OECD के जून 2026 के इकोनॉमिक आउटलुक में चेतावनी दी गई है कि एनर्जी सप्लाई आपूर्ति और व्यापार में लंबे समय तक व्यवधान बने रहने पर ग्लोबल इकोनॉमिक ग्रोथ धीमी पड़ सकती है. इसमें कहा गया है कि दुनिया की अर्थव्यवस्था 2026 में 2.8 फीसदी और 2027 में 3.1 फीसदी की दर से बढ़ेगी.
2027 तक जारी रहा युद्ध को मुसीबत
OECD की चिंता सिर्फ तेल की कीमतों को लेकर नहीं है, बल्कि उसका मानना है कि हाई एनर्जी कॉस्ट, ट्रेड रूट्स में रुकावट, बढ़ता शिपिंग खर्च और फाइनेंशियल मार्केट्स में अनिश्चितता मिलकर वैश्विक अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा सकते हैं.
अगर संघर्ष 2027 तक जारी रहता है, तो मुसीबत बढ़ सकती हैं. ऊर्जा और फर्टिलाइजर्स की कीमतें लंबे समय तक ऊंची रह सकती हैं, जो महंगाई का बोझ बढ़ाए रख सकती है.
पीयूष अग्रवाल