बिहार सरकार द्वारा राज्य के मदरसों और संस्कृत विद्यालयों की व्यापक जांच शुरू किए जाने के बाद इस मुद्दे पर राजनीतिक बहस तेज हो गई है. विपक्षी दलों और मुस्लिम समुदाय के कुछ संगठनों ने आशंका जताई है कि कहीं यह कदम भविष्य में असम की तर्ज पर मदरसा शिक्षा व्यवस्था में बड़े बदलाव की तैयारी तो नहीं है.
विवाद की शुरुआत तब हुई जब शिक्षा विभाग ने सरकारी अनुदान प्राप्त सभी मदरसों और संस्कृत विद्यालयों को ई-शिक्षा कोष पोर्टल पर छात्रों, शिक्षकों और गैर-शिक्षण कर्मचारियों का पूरी डिटेल अपलोड करने का निर्देश दिया. इसके साथ ही जिला प्रशासन को संस्थानों का भौतिक सत्यापन कर रिपोर्ट सरकार को सौंपने के आदेश दिए गए हैं.
सरकारी अधिकारियों के अनुसार, इस अभियान का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि सरकारी सहायता प्राप्त करने वाले संस्थान वास्तव में संचालित हो रहे हैं या नहीं. जांच के दौरान छात्र नामांकन, शिक्षकों और कर्मचारियों की संख्या, आधारभूत सुविधाओं तथा सरकारी अनुदान के उपयोग की समीक्षा की जा रही है. अधिकारियों का कहना है कि फर्जी नामांकन, अनियमित उपस्थिति और कागजों पर चल रहे कर्मचारियों की शिकायतों के बाद यह कदम उठाया गया है.
1900 से अधिक सरकारी सहायता प्राप्त मदरसे
बिहार में बिहार राज्य मदरसा शिक्षा बोर्ड से संबद्ध 1900 से अधिक सरकारी सहायता प्राप्त मदरसे हैं, जिन्हें वेतन और अन्य खर्चों के लिए राज्य सरकार से वित्तीय सहायता मिलती है.
मामले ने तब राजनीतिक रंग ले लिया जब शिक्षा मंत्री मिथलेश तिवारी ने चेतावनी दी कि जांच में नियमों का उल्लंघन या फर्जीवाड़ा पाए जाने पर संबंधित संस्थानों की मान्यता रद्द की जा सकती है और सरकारी अनुदान भी रोका जा सकता है.
हिमंत बिस्वा सरमा ने दिया था ये तर्क
इसके बाद विपक्ष ने इस कार्रवाई की तुलना असम से करनी शुरू कर दी. असम में हिमंत बिस्वा सरमा के नेतृत्व वाली सरकार ने सरकारी मदरसों को बंद कर उन्हें सामान्य विद्यालयों में परिवर्तित करने का फैसला लिया था. उस समय सरकार ने तर्क दिया था कि धार्मिक शिक्षा का वित्तपोषण राज्य को नहीं करना चाहिए, जबकि विपक्ष ने इसे अल्पसंख्यक संस्थानों को निशाना बनाने वाला कदम बताया था.
बिहार में भी अब यही सवाल उठने लगे हैं कि क्या वर्तमान जांच किसी बड़े नीतिगत बदलाव की भूमिका तैयार कर रही है. हालांकि भाजपा ने इन आशंकाओं को खारिज किया है. भाजपा प्रवक्ता कुंतल कृष्ण ने कहा कि सरकार केवल यह जानना चाहती है कि मदरसों की वास्तविक स्थिति क्या है, वहां कौन-सी सुविधाएं उपलब्ध हैं और किन सुधारों की आवश्यकता है. उन्होंने कहा कि एनडीए सरकार सभी वर्गों के बच्चों के बेहतर भविष्य के लिए प्रतिबद्ध है.
वहीं, RJD समेत विपक्षी दलों ने आरोप लगाया है कि सरकार मदरसा शिक्षा को संदेह के घेरे में खड़ा करने का प्रयास कर रही है. विपक्ष का कहना है कि यदि सरकार वास्तव में शिक्षा सुधार चाहती है तो उसे राज्य के सभी स्कूलों में शिक्षकों की कमी, आधारभूत ढांचे और शिक्षा की गुणवत्ता जैसे मुद्दों पर ध्यान देना चाहिए.
कुछ मुस्लिम संगठनों ने भी जांच के दायरे और समय को लेकर चिंता जताई है. उनका कहना है कि भविष्य में इस प्रक्रिया का उपयोग मदरसों के खिलाफ कठोर कदम उठाने के लिए किया जा सकता है.
बिहार सरकार ने आरोपों को किया खारिज
हालांकि बिहार सरकार ने इन आरोपों को खारिज करते हुए कहा है कि यह पूरी प्रक्रिया केवल पारदर्शिता और जवाबदेही सुनिश्चित करने के लिए चलाई जा रही है. सरकार का उद्देश्य सभी सहायता प्राप्त संस्थानों का डिजिटल डाटाबेस तैयार करना और व्यवस्था में मौजूद अनियमितताओं को समाप्त करना है.
फिलहाल सरकार इसे नियमित प्रशासनिक प्रक्रिया बता रही है, लेकिन मदरसों की जांच अब शिक्षा से आगे बढ़कर बिहार की राजनीति का अहम मुद्दा बन गई है. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यही है कि क्या यह केवल रिकॉर्ड की जांच है या फिर भविष्य में किसी बड़े नीतिगत बदलाव की शुरुआत.
रोहित कुमार सिंह