500 लो अंतिम संस्कार कर देना... मृत मानकर पिता ने छोड़ा, दूसरे दिन पुल के नीचे जिंदा मिला मासूम

बिहार के लखीसराय में एक ऐसी कहानी सामने आई, जिसने लोगों को सन्न कर दिया. एक पिता ने अपने बच्चे को मृत समझकर किसी व्यक्ति को 500 रुपये देकर अंतिम संस्कार के लिए सौंप दिया. लेकिन शख्स बच्चे को पुल के नीचे छोड़ गया, जहां अगली सुबह मॉर्निंग वॉक करने वालों ने बच्चे के रोने की आवाज सुनी. इसके बाद तुरंत बच्चे को अस्पताल पहुंचाया.

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मॉर्निंग वॉक करने निकले लोगों ने सुनी रोने की आवाज. (Photo: Screengrab) मॉर्निंग वॉक करने निकले लोगों ने सुनी रोने की आवाज. (Photo: Screengrab)

aajtak.in

  • लखीसराय,
  • 22 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 1:48 PM IST

लखीसराय से सामने आई यह कहानी इंसानियत, किस्मत और चमत्कार की ऐसी दास्तान है, जिसे सुनकर किसी की भी आंखें नम हो जाएं. यह कहानी उस मासूम की है, जिसे उसके अपने ही पिता ने मृत समझ लिया... लेकिन शायद ऊपर वाले को कुछ और ही मंजूर था.

18 अप्रैल की सुबह... किऊल नदी के पुराने रेलवे पुल के पास रोज की तरह कुछ लोग मॉर्निंग वॉक पर निकले थे. सब कुछ सामान्य था- हल्की ठंडी हवा, शांत माहौल. तभी अचानक किसी को एक रोने की आवाज सुनाई दी. पहले तो लोगों ने इसे नजरअंदाज किया, लेकिन जब आवाज लगातार आने लगी, तो वे उस दिशा में बढ़े.

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जो उन्होंने देखा, वह किसी के भी दिल को झकझोर देने वाला था. पुल के नीचे, नदी किनारे एक मासूम बच्चा था, बेहद कमजोर हालत में. वह रो रहा था. यह देखकर वहां मौजूद लोग सन्न रह गए. किसी ने तुरंत पुलिस को फोन किया, लेकिन जब समय पर मदद नहीं पहुंची, तो उन्होंने खुद ही इंसानियत का फर्ज निभाया.

मॉर्निंग वॉक करने वाले लोगों ने उस मासूम को उठाया और तुरंत सदर अस्पताल लखीसराय पहुंचाया. वहां डॉक्टरों ने उसका इलाज शुरू किया. बच्चे की हालत गंभीर थी, इसलिए बेहतर इलाज के लिए उसे आईजीएमएस पटना रेफर कर दिया गया.

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लेकिन असली कहानी तो अब शुरू होती है. जब इस बच्चे की तस्वीरें और खबर सोशल मीडिया पर वायरल हुईं, तब जानकारी उस पिता को भी हो गई. यह बच्चा कोई और नहीं, बल्कि जमुई जिले के अंबा गांव के रहने वाले व्यक्ति का दो साल 21 दिन का बेटा था.

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पिता ने जब खबर देखी, तो उनके पैरों तले जमीन खिसक गई. उन्होंने बताया कि उनका बेटा जन्म से ही गंभीर बीमारी से जूझ रहा था. जन्म के समय उसका मलद्वार ठीक से विकसित नहीं हुआ था, जिसके इलाज के लिए उन्होंने पटना के एक निजी अस्पताल में करीब 1 लाख 20 हजार रुपये खर्च कर सर्जरी करवाई थी. लेकिन कुछ समय बाद सर्जरी के टांके खुल गए और बच्चे की हालत फिर बिगड़ने लगी.

पिता 18 अप्रैल को बच्चे का इलाज कराने पत्नी के साथ पटना जा रहे थे. इसी दौरान लखीसराय रेलवे स्टेशन पहुंचने पर बच्चे के पिता को लगा कि बच्चे की सांसें थम गईं हैं. पिता ने मान लिया कि उसका बेटा अब इस दुनिया में नहीं रहा.

इसके बाद पिता ने एक स्थानीय व्यक्ति को 500 रुपया देकर अंतिम संस्कार के लिए सौंप दिया. क्योंकि परंपरा है कि पुत्र के अंतिम संस्कार में पिता शामिल नहीं होता है, महिला श्मशान घाट नहीं जाती है. पिता के साथ कोई अन्य पुरुष परिजन नहीं थे. बच्चे को सौंपने के बाद वे पत्नी के साथ घर लौट गए और गांव में भी अंतिम संस्कार के साथ होने वाली क्रियाएं पूरी कीं.

पिता ने जिस स्थानीय व्यक्ति को 500 देकर कहा था कि अंतिम संस्कार कर देना. वह शख्स बच्चे को लेकर चला गया... उसने अंतिम संस्कार नहीं किया, बल्कि उसे किऊल नदी के पुराने रेलवे पुल के नीचे छोड़कर चला गया.

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लेकिन शायद उस दिन किस्मत को कुछ और ही मंजूर था. अगले दिन जब मॉर्निंग वॉक करने वालों ने उस मासूम की रोने की आवाज सुनी, तो एक जिंदगी वापस लौट आई. अगर कुछ देर और हो जाती, तो शायद यह कहानी कुछ और होती.

इधर, बच्चे को मृत मानकर परिवार ने अपने गांव में हिंदू रीति-रिवाज से उसका श्राद्ध और मुंडन संस्कार भी कर दिया था. घर में मातम था, लोग शोक में थे. लेकिन तीन दिन बाद जब सच्चाई सामने आई, तो परिजन खुशी और हैरानी में थे.

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पिता तुरंत लखीसराय पहुंचे और अपने जिंदा बेटे को देखा. वह पल किसी चमत्कार से कम नहीं था- जिसे खो दिया समझा, वह फिर से सामने था... सांस लेता हुआ.

बाल कल्याण समिति के अध्यक्ष मोहन सिंह ने कहा कि 'जाको राखे साइयां, मार सके ना कोय' की कहावत सच साबित हुई है. उन्होंने बताया कि फिलहाल बच्चे का इलाज पटना के आईजीएमएस अस्पताल में चल रहा है. बच्चे के पूरी तरह स्वस्थ होने के बाद जमुई जिला प्रशासन से समन्वय कर उसे परिजन को सौंपने की प्रक्रिया पूरी की जाएगी.

डॉक्टरों के मुताबिक, बच्चे की स्थिति नाजुक जरूर थी, लेकिन समय पर इलाज मिलने से उसकी जान बच गई. अब उसे बेहतर मेडिकल केयर दी जा रही है और उम्मीद है कि वह पूरी तरह ठीक हो जाएगा.

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(रिपोर्ट: विनोद कुमार गुप्ता)

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