EV को फुल सपोर्ट, एथेनॉल को इग्नोर! CAFE-III नॉर्म्स पर भड़की इंडस्ट्री, जानें मामला

EV vs Ethanol: ऑल इंडिया डिस्टलरी एसोसिएशन (AIDA) ने पेट्रोलियम सचिव डॉ. नीरज मित्तल को पत्र लिखकर चिंता जाहिर की है कि, CAFE-III नियमों के ड्राफ्ट में इलेक्ट्रिक व्हीकल्स और हाइब्रिड गाड़ियों को ज्यादा तरजीह दी गई है, जबकि एथेनॉल बेस्ड विकल्पों को कम महत्व दिया गया है.

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AIDA का कहना है कैफे नॉर्म्स 3 के ड्राफ्ट में EV और हाइब्रिड को ज्यादा तरजीह दी गई है. Photo: ITG AIDA का कहना है कैफे नॉर्म्स 3 के ड्राफ्ट में EV और हाइब्रिड को ज्यादा तरजीह दी गई है. Photo: ITG

आजतक ऑटोमोबाइल डेस्क

  • नई दिल्ली,
  • 23 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 4:50 PM IST

देश में ग्रीन मोबिलिटी को लेकर सरकार तेजी से कदम उठा रही है, लेकिन अब एथेनॉल इंडस्ट्री ने नए प्रस्तावित नियमों पर सवाल खड़े कर दिए हैं. अब मामला सिर्फ गाड़ियों के माइलेज का नहीं है, खेल उससे कहीं बड़ा है. एक तरफ सरकार इलेक्ट्रिक गाड़ियों को तेजी से आगे बढ़ाना चाहती है, दूसरी तरफ एथेनॉल इंडस्ट्री कह रही है कि भाई, हमें साइडलाइन क्यों कर रहे हो. अब CAFE-III नियमों को लेकर चिट्ठी लिखी गई है, सवाल उठाए गए हैं और बहस छिड़ गई है कि देश का फ्यूल फ्यूचर आखिर किस रास्ते से गुजरेगा.

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इंडस्ट्री का कहना है कि अगर यही नीति लागू होती है, तो एथेनॉल जैसे देसी और सस्ते विकल्प पीछे छूट सकते हैं. भारत की एथेनॉल इंडस्ट्री ने सरकार के प्रस्तावित कॉर्पोरेट एवरेज फ्यूल एफिशिएंसी यानी CAFE-III नियमों पर चिंता जताई है. इंडस्ट्री का कहना है कि इसके ड्राफ्ट में इलेक्ट्रिक व्हीकल्स और हाइब्रिड गाड़ियों को ज्यादा तरजीह दी गई है, जबकि एथेनॉल बेस्ड विकल्पों को कम महत्व दिया गया है.

ऑल इंडिया डिस्टलरी एसोसिएशन (AIDA) ने पेट्रोलियम सचिव डॉ. नीरज मित्तल को पत्र लिखकर अपनी चिंता जाहिर की है. एसोसिएशन के मुताबिक FY28 से FY32 के लिए तैयार किया गया यह ड्राफ्ट अलग-अलग तकनीकों के साथ पूरी तरह बैलेंस नज़र नहीं आ रहा है. इसे 'स्ट्रैटेजिकली अनबैलेंस' बताया गया है.

दरअसल, AIDA का मानना है कि सरकार भविष्य को ध्यान में रखकर नियम बना रही है, लेकिन उनका कहना है कि बैटरी इलेक्ट्रिक व्हीकल्स और प्लग-इन हाइब्रिड को ज्यादा इंसेंटिव मिल रहा है. वहीं फ्लेक्स-फ्यूल व्हीकल्स को उतना सपोर्ट नहीं दिया गया है, जिससे असमानता पैदा हो रही है.

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VDF फैक्टर बना विवाद की वजह

इस पूरे मामले का मुख्य मुद्दा वॉल्यूम डेरोगेशन फैक्टर यानी VDF है. यह एक तरह का कंप्लायंस मल्टीप्लायर होता है. ड्राफ्ट में फ्लेक्स-फ्यूल व्हीकल्स के लिए VDF करीब 1.1 रखा गया है. इंडस्ट्री का कहना है कि यह उनकी असली क्षमता और पर्यावरण में योगदान को सही तरीके से नहीं दिखाता है. AIDA का कहना है कि यह फैसला देश की एथेनॉल पॉलिसी और एथेनॉल ब्लेंडेड पेट्रोल प्रोग्राम के साथ मेल नहीं खाता है. सरकार जहां एथेनॉल को बढ़ावा दे रही है, वहीं नए नियम उसे कमजोर कर सकते हैं.

पॉलिसी में बदलाव की मांग

एसोसिएशन ने सरकार से अपील की है कि पॉलिसी को टेक्नोलॉजी-न्यूट्रल बनाया जाए. यानी इलेक्ट्रिक, हाइब्रिड और एथेनॉल सभी को बराबर मौका मिले. AIDA ने फ्लेक्स-फ्यूल व्हीकल्स के लिए VDF को 2.0 से 2.5 तक बढ़ाने की सिफारिश की है. इंडस्ट्री ने यह भी कहा है कि एथेनॉल फ्यूल के “वेल-टू-व्हील” यानी पूरे लाइफसाइकिल के उत्सर्जन को ध्यान में रखा जाए. उनका मानना है कि घरेलू और रिन्यूएबल सोर्सेज से बने एथेनॉल का पर्यावरण पर असर कम होता है, लेकिन मौजूदा ड्राफ्ट में इसे पूरी तरह शामिल नहीं किया गया है.

यह विवाद एक बड़े सवाल को भी सामने लाता है कि भारत को सिर्फ इलेक्ट्रिक व्हीकल्स पर ध्यान देना चाहिए या फिर मल्टी-फ्यूल स्ट्रेटजी अपनानी चाहिए. सरकार जहां EV को बढ़ावा दे रही है, वहीं एथेनॉल ब्लेंडिंग भी तेजी से बढ़ाई जा रही है ताकि कच्चे तेल के आयात को कम किया जा सके और रूरल इकोनॉमी को बेहतर किया जा सके.
 

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