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अब पराली से नहीं होगा प्रदूषण! वैज्ञानिकों ने तैयार किया बायो–थर्मोकोल, बढ़ेगी किसानों की कमाई

आईसीआर के प्रमुख वैज्ञानिक डॉक्टर रमेश चंद कसाना ने आज तक से खास बातचीत में पराली से बायो थर्मोकोल बनाने और उसके इस्तेमाल की जानकारी दी. डॉ कसाना ने बताया कि धान और गेहूं की पराली से आसानी से बायो थर्मोकोल तैयार किया जा सकता है. इसे तैयार करने में 15 से 20 दिन का समय लगता है.

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stubble (Photo-PTI)
stubble (Photo-PTI)

पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और उत्तर प्रदेश के किसानों द्वारा जलाई गई पराली से उठते धुएं ने दिल्ली और एनसीआर क्षेत्र के लोगों का जीना दूभर कर दिया है. वैज्ञानिक अब पराली के सही उपयोग के लिए लगातार प्रयास कर रहे हैं. भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद के लुधियाना स्थित केंद्रीय कटाई उपरांत अभियांत्रिकी एवं प्रौद्योगिकी संस्थान के वैज्ञानिकों ने पराली से बायो थर्मोकॉल बनाने में सफलता हासिल की है. इस तकनीक से प्रोडक्ट बनाने के लिए अब बाकायदा एक औद्योगिक इकाई से एमओयू भी हो चुका है.

पराली से ऐसे बनता है बायो थर्मोकोल

आईसीआर के प्रमुख वैज्ञानिक डॉक्टर रमेश चंद कसाना ने आज तक से बातचीत में पराली से बायो थर्मोकोल बनाने और उसके इस्तेमाल की जानकारी दी. डॉ कसाना ने बताया कि धान और गेहूं की पराली से आसानी से बायो थर्मोकोल तैयार किया जा सकता है. इसे तैयार करने में 15 से 20 दिन का समय लगता है. सबसे पहले पराली को एक सेंटीमीटर के आकार में काटकर उसका भूसा तैयार किया जाता है. उसके बाद उसे जीवाणु रहित करके स्पॉन नामक पदार्थ मिलाया जाता है, जो अनाज से बनता है. स्पॉन के पनपने से एक तरफ जहां पराली का रंग सफेद हो जाता है. वहीं, इसमें मौजूद तत्वों की वजह से ये अच्छी तरह से चिपक जाती है. उसके बाद उसे सांचे में डालकर कोई भी आकार दिया जा सकता है.

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पराली से तैयार किया गया बायो थर्माकोल रसायन से बनाए गए थर्मोकोल की तरह ही हल्का होता है लेकिन यह पूरी तरह से बायोडिग्रेडेबल यानी कुदरती तौर पर नष्ट हो सकता है. इसके इस्तेमाल से पर्यावरण को किसी भी तरह का कोई नुकसान नहीं होगा. केमिकल से बनाए गए थर्मोकोल के इस्तेमाल से पर्यावरण को काफी नुकसान पहुंचता है क्योंकि यह कुदरती तौर पर नष्ट नहीं होता. वैज्ञानिक अब इसे छत की सीलिंग के रूप में इस्तेमाल करने के लिए भी प्रयोग कर रहे हैं. इसके अलावा भवन निर्माण में भी पराली को इंसुलेशन के तौर पर इस्तेमाल करने के प्रयास किए जा रहे हैं.

पराली बन सकती है किसान की कमाई का साधन

किसान पराली को ना जलाएं, इसके लिए वैज्ञानिक और राज्य सरकारें पराली के इन–सीटू और एक्स –सीटू प्रबंधन यानी पराली को खेत में ही या फिर खेत के बाहर इस्तेमाल करने के तरीकों पर काम कर रही हैं. अकेले पंजाब में 7.5 मिलियन एकड़ क्षेत्रफल पर धान की फसल उगाई जाती है, जिससे हर साल 22 मिलियन टन पराली पैदा होती है. सरकार का दावा है कि 60 फ़ीसदी पराली यानी 12 मिलियन टन पराली को खेतों में ही नष्ट करने के प्रयास किया जा रहे है. एक अनुमान के मुताबिक, पंजाब में हर साल 10 मिलियन टन पराली जला दी जाती है, जिससे पर्यावरण को काफी नुकसान होता है.

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हरियाणा सरकार के अधिकारियों के मुताबिक, पराली का 34 फ़ीसदी हिस्सा जानवरों के चारे के रूप में और 43 फ़ीसदी हिस्सा खेतों में ही नष्ट किया जा रहा है. राज्य सरकार का दावा है कि राज्य में 23 फ़ीसदी पराली का प्रबंधन एक्स सीटू तरीके से हो रहा है. राज्य के दो दर्जन के करीब उद्योग पराली को अब ईंधन के रूप में इस्तेमाल कर रहे हैं.

आंकड़ों के मुताबिक, अबकी बार पंजाब और हरियाणा में पराली जलाने के मामलों में 50 फ़ीसदी से ज्यादा गिरावट आई है. राज्य सरकारों का दावा है कि पराली जलाने के मामलों में आई गिरावट कुशल पराली प्रबंधन का नतीजा है. भारत के पर्यावरण एवं वन मंत्रालय के आंकड़ों के मुताबिक ने भी पराली जलाने के मामलों में 53 फ़ीसदी तक गिरावट की पुष्टि की गई है.

हालांकि, नासा द्वारा जारी किए गए आंकड़ों के मुताबिक इन राज्यों में अभी भी आधी से ज्यादा पराली आग के हवाले की जा रही है लेकिन इस बीच आईसीआर के वैज्ञानिकों ने पराली का इस्तेमाल बायो थर्मोकोल के रूप में करके एक तरफ जहां पर्यावरण को बचाने का प्रयास किया है, वहीं किसानों को अपनी आय बढ़ाने का भी मौका दिया है.
 

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