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साइंस न्यूज़

अब तक इंसानों का क्लोन क्यों नहीं बनाया गया? जानिए इसका जवाब

Human cloning
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आपको याद होगा, 1996 में डॉली (Dolly) नाम की एक भेड़ ने बहुत सुर्खियां बटोरी थीं. क्योंकि वह दुनिया की पहली स्तनधारी जीव थी जिसे एक वयस्क कोशिका (Adult cell) से क्लोन किया गया था. इसके बाद लोगों ने यह अनुमान लगाना शुरू कर दिया था कि पहला मानव क्लोन (Human clones) जल्दी ही हमारे सामने होगा. लेकिन ऐसा हुआ नहीं. (Photo: Pixabay)

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मानव क्लोनिंग (Human cloning) के बहुत से फायदे बताए गए थे. कुछ लोगों ने कहा कि इससे आनुवंशिक रोग जड़ से खत्म हो सकते हैं. जबकि, कुछ का कहना था कि क्लोनिंग से जन्मजात दोष (birth defects) खत्म हो सकते हैं. हालांकि, 1999 में फ्रांस के वैज्ञानिकों ने शोध में पाया कि क्लोनिंग असल में जन्म से होने वाले दोषों को बढ़ा सकती है. (Photo: Pixabay)

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यहां यह बताना भी ज़रूरी है कि डॉली की सफलता के बाद, सफल मानव क्लोनिंग प्रोग्राम्स के कई दावे भी किए गए थे, लेकिन सभी निराधार साबित हुए. 2002 में, फ्रांस की एक कैमिस्ट और रैलिज़्म (Raëlism) समर्थक ब्रिगिट बोइसेलियर (Brigitte Boisselier) ने दावा किया था कि उसने और वैज्ञानिकों की एक टीम ने मिलकर पहला मानव क्लोन बनाया है, जिसे उन्होंने ईव (Eve) नाम दिया. रैलिज़्म यूएफओ धर्म (UFO religion) है, जो इस विचार पर आधारित है कि एलियंस ने मानवता का निर्माण किया है. ब्रिगिट बोइसेलियर इस दावे को कोई सबूत नहीं दे सकीं. और इसलिए इस दावे को फर्जी माना गया. (Photo: Pixabay)

Human cloning
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तो सवाल ये उठता है कि डॉली के बनने के करीब 30 साल बाद, अभी तक इंसानों का क्लोन क्यों नहीं बनाया गया है? क्या इसके पीछे नैतिक कारण हैं, तकनीकी समस्याएं हैं या फिर ऐसा करना बेकार है? राष्ट्रीय मानव जीनोम अनुसंधान संस्थान (National Human Genome Research Institute- NHGRI) के मुताबिक, क्लोनिंग का उद्देश्य हमेशा जैविक इकाई की आनुवंशिक रूप से एक जैसी कॉपी बनाना है. (Photo: Pixabay)

Human cloning
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NHGRI का कहना है कि जब भी मानव क्लोनिंग होगी, उसमें प्रजनन क्लोनिंग (Reproductive Cloning) तकनीकों का इस्तेमाल किया जाएगा. इसमें त्वचा की परिपक्व सोमैटिक कोशिकाओं (Mature Somatic Cell) का इस्तेमाल होगा. इस सेल से निकाले गए DNA को किसी डोनर के अंडे की सेल में रखा जाएगा, जिसका खुद का DNA युक्त न्यूक्लस (Nucleus) हटा दिया जाता है. NHGRI के मुताबिक, एक वयस्क महिला के गर्भ में इम्प्लांट करने से पहले, अंडा एक टेस्ट ट्यूब में डेवलप होना शुरू हो जाता है. हालांकि, वैज्ञानिकों ने अब तक बकरी, खरगोश और बिल्लियों जैसे स्तनधारियों के क्लोन बनाए हैं, इंसान के नहीं. (Photo: Pixabay)

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स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी (Stanford University) में कानून और आनुवंशिकी के प्रोफेसर हैंक ग्रीली (Hank Greely), जैव विज्ञान में हो रही प्रगति से पैदा होने वाले नैतिक, कानूनी और सामाजिक मामलों के जानकार हैं. उनका कहना है कि 'मुझे लगता है कि हमारे पास मानव क्लोन बनाने का कोई कारण नहीं है. मानव क्लोनिंग एक ड्रामैटिक एक्शन है और यह उन विषयों में से एक था जिसने अमेरिकी बायोएथिक्स बनाने में मदद की. (Photo: Pixabay)
 

Human cloning
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मानव क्लोनिंग से जुड़े कई नैतिक कारण भी हैं. ब्रिटानिका के मुताबिक, इसमें मनोवैज्ञानिक, सामाजिक और शारीरिक जोखिम शामिल हैं. माना जाता है कि क्लोनिंग से जान जाने की संभावना बहुत ज्यादा हो सकती है. साथ ही, क्लोनिंग को 'मानव गरिमा, स्वतंत्रता और समानता के सिद्धांतों' का उल्लंघन माना जा सकता है. (Photo: Pexels)

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इसके अलावा, स्तनधारियों की क्लोनिंग ने क्लोन में मृत्यु और विकास संबंधी कई समस्याएं सामने आईं. मानव क्लोनिंग के साथ एक और मुख्य समस्या यह है कि असल व्यक्ति की कार्बन कॉपी बनाने के बजाय, इससे एक अलग विचारों वाला दूसरा व्यक्ति बनेगा. ग्रीली की मानें तो एक मानव क्लोन सिर्फ आनुवंशिक तौर पर किसी और जैसा होगा, व्यक्तित्व, नैतिकता या हास्य जैसी भावनाएं एक जैसी नहीं होंगी. दोनों ही लोगों में ये सभी चीजें अलग-अलग होंगी. ग्रीली कहते हैं कि ऐसा कोई फायदा नहीं है, जिसे लेकर हम इंसानों की क्लोनिंग करें. साथ ही, इसमें नैतिक चिंताओं को नजरअंदाज करना भी काफी मुश्किल होगा. (Photo: Pixabay)

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ग्रीली का कहना है कि मानव क्लोनिंग अब वैज्ञानिक अध्ययन के लिए बहुत बढ़िया विषय नहीं हो सकता. पिछले सालों में इसपर कुछ नहीं किया गया , ये इस बात का सबूत है. इसके बजाए, लोगों की दिलचस्पी अब मानव जर्मलाइन जीनोम एडिटिंग (Germline genome editing) में है. जर्मलाइन एडिटिंग, या जर्मलाइन इंजीनियरिंग (Germline engineering), वह प्रोसेस है जिसमें एक व्यक्ति के जीनोम में स्थायी बदलाव किए जा सकते हैं. ये बदलाव अनुवांशिक हो जाते हैं, जिसका मतलब है कि माता-पिता से ये बच्चे में जाएंगे. (Photo: Pixabay)

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हार्वर्ड यूनिवर्सिटी (Harvard University) में आनुवंशिकीविद् (Geneticist) और मॉलीक्यूलर इंजीनियर जॉर्ज चर्च (George Church), भी ग्रीली की इस बात का समर्थन करते हैं कि आने वाले समय में वैज्ञानिकों की दिलचस्पी, क्लोनिंग की तुलना में जर्मलाइन एडिटिंग में हो सकती है. उनका कहना है कि क्लोनिंग-आधारित जर्मलाइन एडिटिंग आम तौर पर ज्यादा सटीक होती है. इसमें ज्यादा जीन शामिल हो सकते हैं. हालांकि, उन्होंने उन्होंने इसमें सावधानी बरतने की सलाह दी है. उसने स्वीकार उनका कहना है कि इस तरह की एडटिंग पर अभी महारत हासिल नहीं हुई है. (Photo: Getty)