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'मेरी कोई नहीं सुनता', 100 KM सड़क पर लेट-लेट कर फरियाद करने पहुंचे 75 साल के बुजुर्ग

मध्य प्रदेश में 75 साल के एक किसान अपनी पीड़ा लेकर सड़क पर लेट-लेट कर 100 किलोमीटर की यात्रा कर रहे हैं. बुजुर्ग किसान का आरोप है कि तहसीलदार से लेकर सीएम हेल्प लाइन नंबर तक पर कॉल किया लेकिन कोई सुनवाई नहीं हुई जिसके बाद अब वो महाकाल के दरबार में इंसाफ मांगने जा रहे हैं.

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बुजुर्ग कर रहे हैं 100 किमी की पैदल यात्रा
बुजुर्ग कर रहे हैं 100 किमी की पैदल यात्रा

मध्य प्रदेश के राजगढ़ में एक किसान अपनी परेशानियों को लेकर सड़कों पर 100 किलोमीटर लेट-लेट कर अपनी फरियाद लेकर महाकाल मंदिर के लिए निकल पड़े. 75 साल के बुजुर्ग किसान ने कहा, 'मेरी कोई नहीं सुनता, बहुत दिनों से परेशान हो रहा हूं, मेरे घर के सामने ही गोबर फेंकने की जगह बना दी गई और आधा रास्ता रोक दिया, घर में बदबू आ रही है.

बुजुर्ग ने कहा जब गोबर हटाने की बात की तो दंबग लोग मेरी नहीं सुनते और बेटे के साथ मारपीट करते हैं. बुजुर्ग ने बताया कि तहसीलदार से लेकर सीएम हेल्प लाइन नंबर तक पर कॉल किया लेकिन किसी ने मदद नहीं की. यह मामला राजगढ़ जिले के जीरापुर जनपद के ग्राम जेथली की है. 

जब बुजुर्ग को न्याय नहीं मिला तो वो इंसाफ मांगने के लिए सीधे भगवान महाकाल के दरबार में फरियाद लेकर निकल पड़े. इसके बाद बुजुर्ग भेरूलाल गुर्जर 25 फरवरी को पीठ के बल लेटते हुए फरियाद लेकर महाकाल मंदिर के लिए निकल गये. 

लगातार चलते हुए एक महीने में करीब 100  किलोमीटर तक लेट-लेट कर वो अपने गांव जेथली से उज्जैन की यात्रा कर रह हैं. बुजुर्ग बेहद गरीब हैं और इनका गांव में कच्चा मकान है जिसमें पूरा परिवार रहता है.

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उन्हें सरकारी योजनाओं का लाभ भी नहीं मिला जिसके बाद इस बुजुर्ग किसान ने फूट फूटकर रोते हुए बताया कि घर के सामने ही लोग कचरा डालते है.  घर में कचड़े से बदबू फैल गया है जिससे वो लोग परेशान हो गए हैं.

उन्होंने कहा,  'मुझे गांव में परेशान किया गया जिस पर प्रशासन के द्वारा कोई सुनवाई नहीं होने पर थक हारकर अपनी बात रखने के लिए उज्जैन के महाकाल दरबार जा रहे हैं जिसके लिए वो पैदल ही निकले हैं.'

पैदल यात्रा के दौरान बुजुर्ग एक नारियल को उठाते हैं, लेटने के बाद नारियल को सिर के पास रखते हुए जमीन पर पीठ के बल लेटते हैं फिर खड़े होकर उसी नारियल को उठाकर नीचे रखते हुए चलते हैं. 

बुजुर्ग जमीन पर पीठ के बल लेटते हुए एक माह में केवल अभी तक 80 किलोमीटर ही चल पाए हैं. बीच रास्ते में कोई खाने को दे देता है तो खा लेते हैं और जहां छांव मिलती है वहीं पर सो जाते हैं.


 

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