सदियों से कविता अपने लिखित और वाचिक रूपों में उपस्थित रही है. वह पाठ्य और पाठबल दोनों के कारण रसिकों के बीच समादृत रही है. आज भी लाखों लोग होंगे जिनकी स्मृति में अपने समय की कुछ अच्छी कविताएं होंगी. पुराने लोगों में ऐसे अनेक लोग मिल आज भी हैं जिन्हें हजारों श्लोक, कवितांश आज भी याद हैं. एक बार पटना में एक सुधी कवयित्री के निवास पर नेतरहाट के विद्यालय से पढ़े तथा मेडिकल प्रोफेशन से जुड़े एक डॉक्टर से भेंट हुई. साहित्य चर्चा के दौरान मैं यह देख कर दंग था कि उन्हें प्रसाद, दिनकर, पंत की अनेक कविताएं याद हैं. 'आंसू' पूरा सुना सकते हैं. इससे पहले लखनऊ में मैंने शिवमंगल सिंह 'सुमन' जी को सुना है. उनके कंठ से कविताएं निर्झरिणी की तरह बहती थीं. कवि सम्मेलनों में भाग लेने वाले अधिकांश कवियों को यह काव्याभ्यास सहज ही होता है. कविता पाठ्य होने के अलावा यह पाठ की विधा भी है. विदेशों में अनेक कवि इसे स्टेज पर परफार्म करते हुए सुनाते हैं. एकाधिक तो पूरे गाजे बाजे के साथ. यह कविता को संप्रेषणीय बनाने का तरीका है. आज भी जहां कविता पाठ्यवस्तु है वहां इसे स्टेज पर परफार्म करने वाले कवियों की भी अपार संख्या है. हालांकि उनमें से 90 फीसदी कवियों का कोई स्तर नहीं है तथापि कविता के वाचिक के महत्व से इंकार नहीं किया जा सकता. जिस गुनगुनाहट को बच्चा मां की लोरियों से सीखता और संवर्धित करता है, उसे आगे चल कर जीवन की आपाधापी में भूलता जाता है. जीवन से गीत संगीत धीरे-धीरे खत्म हो जाता है. रह जाता है कानफोड़ू संगीत जो केवल ध्वनिप्रदूषण फैलाने का काम करता है. कवि सम्मेलनों पर फूहड़ हास्य व सतही वीर रस के कवियों के जमावड़े ने इसे केवल भौंडे मनोरंजन में बदल दिया है.
***
वाचिक के नायक
हम पुराने वक्त के कवि सम्मेलनों के चित्र देखें तो हमें अचरज होता है कि ऐसे मंचों पर कभी महादेवी वर्मा तक जाया करती थीं जिन्होंने बाद में किन्हीं कारणों से जाना बंद कर दिया. पंत, केदारनाथ अग्रवाल, दिनकर, नेपाली, बच्चन, नीरज, कैलाश वाजपेयी, रामेश्वर शुक्ल अंचल, मुकुट बिहारी सरोज, रामकुमार चतुर्वेदी चंचल, भारतभूषण, शंभूनाथ सिंह, धूमिल, ठाकुरप्रसाद सिह, रूप नारायण त्रिपाठी, श्रीपाल सिंह क्षेम, भवानीप्रसाद मिश्र, श्रीकृष्ण सरल, रमानाथ अवस्थी, बालकवि बैरागी, रामावतार त्यागी इत्यादि अनेक अच्छे कवि ऐसे सम्मेलनों में शिरकत किया करते थे. वाचिक कविता का अपना स्वर्णिम इतिहास है. पहले इन मंचों पर गंभीर कवियों को ध्यान से सुना जाता था. अच्छे गीतों का मंचों पर बोलबाला था. मधुशाला मंच से ही ख्यात हुई. 1990 के बाद उदारीकरण एवं बाजार के बढ़ते प्रभावों ने कविता के मंचों को प्रदूषित करना शुरू किया. धीरे-धीरे इलेक्ट्रानिक चैनलों पर कविताओं के शो होने लगे और गीतों कविताओं की बजाय हास्य व्यंग्य के हस्ताक्षरों और चुटकुला सम्राटों को महत्त्व मिलने लगा और गीतों के राजकुमारों का बाजार भाव गिरने लगा. वाचिक कविता के गंभीर हस्ताक्षर भी ऐसे सम्मेलनों से विरत होते गए. नई कविता के कवियों ने तो यह नियति ही मान ली कि कविता अब केवल पढ़े जाने के लिए है. यह परफार्मेंस की चीज नहीं है. पर आजादी के संघर्ष के दिनों में मंचों पर देश प्रेम की कविताएं दिल से सुनी और सराही जाती थीं. एक दौर वह भी रहा है जब कोई भी कवि सम्मेलन नीरज, बच्चन या रमानाथ अवस्थी के धारावाही काव्यपाठ के साथ सुबह तक चलता था. श्रोता काव्यरस से आप्लावित हो उठता था.
***
कविता की वाचिक सरसता
वाचिक कविता का स्तर भले ही मुक्तिबोध, निराला, कैलाश वाजपेयी, भवानीप्रसाद मिश्र, धूमिल या केदारनाथ सिंह जैसा न हो पर हम यह क्यों भूल जाते हैं कि नई कविता के अधिकांश कवियों को भी कविता के वाचिक से ही पहचान मिली. केदारनाथ सिंह ने भले ही जीवन में बहुत कुछ लिख लिया हो पर वे जाने इसी अपने गीत से जाते हैं: 'गिरने लगे नीम के पत्ते/ झरने लगी उदासी मन की'. बच्चन अपनी मधुशाला के लिए पहचाने जाते रहे या लोक को लुभाने वाले अपने तमाम गीतों- 'महुआ के नीचे मोती झरे महुआ के...', 'जाओ लाओ पिया नदिया से सोन मछरी'..., 'जो बीत गयी सो बात गयी...' आदि. 'जानी अनजानी तुम जानो या मैं जानूं', 'मन का आकाश उड़ा जा रहा...', 'पुरवैया धीरे बहो...' जैसे गीतों से शंभुनाथ सिंह ने एक माहौल पैदा किया तथा कविता को नवगीत के महाविस्तार तक ले गए. उस दौर में उमाकांत मालवीय के अनेक गीत वातावरण में एक सांस्कृतिक सुगंध-सी भर देते थे. धीमी गति और लंबे आलाप के कवि किशन सरोज के गीत आज भी उदास मन की व्यथा के निरुपण को अचूक शब्द देते हैं. 'धुएं का रंग एक है, बंद न करना द्वार देर हो जाए तो, सो न सका कल याद तुम्हारी आई सारी रात...' जैसे गीतों से रमानाथ अवस्थी पहचाने गए. गिरिजा कुमार माथुर का गीत 'छाया मत छूना मन' उदासियों को छूता हुआ लगता था तो 'मेरे युवा आम में नया बौर आया है -खुशबू बहुत है क्योंकि तुमने लगाया है'- जैसा गीत युवा मन की उमंगों को उच्छल जलधि तरंग में बदल देता था. नीरज का सूफियाना रंग सुनने वाले को भी गैरिकमन बना देता था. 'सौ सौ जनम प्रतीक्षा कर लूं प्रिय मिलने का वचन भरो तो' लिखने वाले भारतभूषण ने अपने गीतों से आधी सदी तक एक रोमांच पैदा किया.
आज की कविता की मुख्य धारा के लोकप्रिय कवि नरेश सक्सेना को प्रारंभ में उनके गीतों से ही पहचान मिली. 'सूनी सँझा, झाँके चाँद/ मुँडेर पकड़ कर आँगना/ हमें, कसम से, नहीं सुहाता-/ रात-रात भर जागना' -जैसा उनका गीत अचानक एक बार चित्रा मुदगल ने सुनाकर मुझे अपनी रसिकता से हतप्रभ कर दिया था. कितने साहस की बात है कि एक सवाल के उत्तर में नरेश सक्सेना ने कहा था कि मैंने तो फिल्मी गीतों तक से प्रेरणा ली है. आज भी वे मंच पर दूसरे कवियों की कविताओं पर ताल देते हुए देखे जा सकते हैं तथा अपनी कविताओं को गीत की भावमुद्रा में ही सुनाते हैं बल्कि कहा जाए कि वे कविताएं अपनी धुन में पढ़ते हैं और मंच पर परफार्म करते हैं तो अत्युक्ति न होगी. लोग तो अपने गीत या छंद प्रेम को छुपाते फिरते हैं जैसे ऐसा पता चलते ही वे साहित्यिक पिछड़ेपन का शिकार मान लिए जाएंगे. हम तो वाचिक कविता के धनी कवियों में माहेश्वर तिवारी, विजय किशोर मानव, यश मालवीय, विनोद श्रीवास्तव और चित्रांश बाघमारे तक का नाम लेना चाहेंगे जिनके गीतों को सुनते-गुनते हुए यह अहसास होता है कि इधर के कुछ दशकों में हमने कितना कुछ शहद-सा खो दिया है. क्या हमें गुलजार, जावेद अख्तर, इरशाद कामिल, कुमार विश्वास, मनोज मुंतशिर, संदीप नाथ, चिराग जैन या विष्णु सक्सेना आदि का इसलिए विरोध करना चाहिए कि वे मंच के लिए या सिने माध्यमों के लिए लिखते-गाते हैं.
***
कविता: कहां गए वे दिन गीतों के?
आज उस वाचिक का क्या हुआ जिसे हमारी परंपरा के बड़े कवियों ने दशकों के काव्याभ्यास से अर्जित किया था? वह चैनलों के उत्सवी शोर का हिस्सा तो बना किन्तु गंभीर ललित और मानीखेज कविता या गीतों की पैदावार कम होती गयी. 90 के दशक के बाद के सम्मेलनी कवियों ने कविता के वाचिक वैभव को मटियामेट कर दिया. आज भी कहीं कोई दबी ठिठकी गीत की स्वर लहरी सुन पड़ती है तो लगता है जेठ की तपन में कुछ अमृत बूँदें बरसी हों. अब कहां रहे ठाकुर प्रसाद सिंह जैसे कवि जो मंद मंद थपकी देने वाले लहजे में अपना गीत पढ़ रहे हों - 'पांच जोड़ बांसुरी. पर्वत के पार से बजाते तुम बांसुरी...' आज भी रामदरश मिश्र से मिलिए तो वे जरूर आपको हाल में लिखी कोई कविता, गीत, मुक्तक या ग़ज़ल सुनाएंगे. लखनऊ में एक सुकंठ गीतकार हुआ करते थे, विष्णु कुमार त्रिपाठी राकेश. उनका नुकीला सुर, उनके गीतों की इमेजरी बांध लेती थी जब वे ऐसे गीत पढ़ा करते थे-
चंद्रमा में तुम
कि तुममें चंद्रमा है.
या कि निशि के छवि वलय में हिम जमा है.
हममें से अधिकतर ने राकेश जी का नाम न सुना होगा पर लखनऊ में रह कर लिख रहे इस कवि को ओशो तक ने पढ़ा और उनकी पुस्तक पतझर के हाशिए के अनेक गीतों को अपने दैनिक प्रवचनों का हिस्सा बनाया. एक बार मुझे उनके गीतों की जरूरत हुई तो बहुत खोजा, लखनऊ में खरीदी उनकी पुस्तक कहीं एक बड़े कालखंड में खो चुकी थी. किसके पास होगी यह पुस्तक इस भुवन में. फेसबुक पर अनुनय किया पर इस अपार संसार में कोई ऐसा गीतप्रेमी न मिला जो यह बताए कि 'पतझर के हाशिए मेंरे' किस गीत संग्रह में है. यश मालवीय तक यह न बता सके कि यह गीत किस पुस्तक मिलेगा जबकि यह उमाकांत मालवीय की पुस्तक 'सुबह रक्त पलाश की' के साथ स्मृति प्रकाशन शहरारा बाग इलाहाबाद से छपी थी. पर अचानक नेट पर खोजते हुए ओशो की पुस्तक 'झरहु दसहु दिस मोती' में उनके गीतों के उल्लेख मिले. कई पूरे गीत भी ओशो ने वहां प्रवचनों के बीच-बीच उद्धृत कर रखे थे. अब ऐसे गीतों के दिन कहां गए कि दैनिक जागरण, धर्मयुग या साप्ताहिक हिंदुस्तान में छपते ही गीत गली-गली में छा जाते थे. लोग अपने अपने ठीहों व शहरों के हीरो हो उठते थे.
***
नए कवि भी वाचिक-विमुख
जब मैं कविता के वाचिक की बात कर रहा हूँ तो केवल गीतों की ही नहीं, उस हर पद संरचना की बात कर रहा जिसे अपने वाचिक प्रभावों और अदायगी से एक श्रोता समूह के सम्मुख सलीके से प्रस्तुत किया जा सके. नई कविता के अनेक कवियों के पास यह इल्म रहा है क्योंकि उनके भीतर का छंदबोध बहुत सुदृढ़ है. उनकी कविताओं में छंद का एक अदृश्य धागा पिरोया हुआ रहता, जैसे करेंसी नोटों में पिरोया हुआ धागा जो साधारणयता अलक्षित सा रहता है. आज भी लीलाधर जगूड़ी, राजेश जोशी, आलोक धन्वा, देवीप्रसाद मिश्र, नंदकिशोर आचार्य, लीलाधर मंडलोई, अरुण कमल, गीत चतुर्वेदी तथा अनेक कवियों की धात्विक आवाज में वह बल है कि गंभीर से गंभीर कविता के श्रोता पैदा किए जा सकते हैं. लेकिन ऐसे कवि भी कविता के वाचिक को महत्त्व नहीं देते. हालांकि ऐसी कविता को भी पापुलर बनाने के लिए अब सोशल माध्यमों पर अनेक प्रयास हुए हैं. इरशाद कामिल के इंक बैंड के बाद मुंबई के मनीष गुप्ता ने कविता को एक लोकप्रिय वाचिक मंच देकर उसे लोकप्रिय बनाने की चेष्टा की है, तो अनेक आभासी कविता मंचों पर वाचिक कविता के दिन लौटते दिखते हैं. जिन दिनों मैं बनारस में था, वह गीतों का गढ़ ही माना जाता रहा है. तथापि ज्ञानेन्द्रपति के साथ जुड़ने वाली कवि मंडली के बीच ज्ञानेन्द्रपति कविता का वाचन बड़े उत्साह से करते थे. बल देकर, स्टेस और तनाव पैदा करते हुए वे जब कविता पढ़ा करते थे तो आप कतई ध्यान विरत नहीं हो सकते थे जबकि पटना रहते हुए मैं बहुत सराहे जाने वाले आलोक धन्वा का काव्यपाठ सुनने से वंचित रहा.
कविता से वाचिक का गुण खत्म न हो जाए या यह केवल एकांत में पढ़ने की चीज न होकर रह जाए इसलिए कविता के इस दुर्लभ होते वाचिक गुण को बचाने की जरूरत है. यह वाचिक अदायगी मनोरंजक कविता से गंभीर कविता के पाठकों के बीच एक पुल बनाती है तथा उसे लोकप्रियता देती है. पर हम दिमाग से यह फितूर निकाल दें कि लोकप्रियता सतही होने का पर्याय है. हर लोकप्रिय चीज खराब नहीं होती. उर्दू शायरी आज जितना पापुलर है वह उतनी ही संजीदा भी है. उसके कवि, शायर मंच पर पूरी शिदद्त से परफार्म करते हैं तथा उतनी ही गंभीरता से सुने व पढ़े जाते हैं. अपने समय का कौन सा गंभीर उर्दू शायर ऐसा होगा जो मंचों पर न गया हो. कविता के लिए ऐसे मौके तलाशते रहने चाहिए, ऐसे अवसर सृजित किए जाने चाहिए कि वह एक बड़े समुदाय को उसी रूप में संबोधित हो जैसे लोकप्रिय कविता या शायरी.
कहने की जरूरत नहीं कि मंच या वाचिक कविता के पतन की सीढ़ी नहीं है बल्कि उसके लिए एक पौष्टिक बिटामिन है.
***
# डॉ ओम निश्चल हिंदी के सुधी आलोचक कवि एवं भाषाविद हैं. आपकी शब्दों से गपशप, भाषा की खादी, शब्द सक्रिय हैं, खुली हथेली और तुलसीगंध, कविता के वरिष्ठ नागरिक, कुंवर नारायण: कविता की सगुण इकाई, समकालीन हिंदी कविता: ऐतिहासिक परिप्रेक्ष्य व कुंवर नारायण पर संपादित कृतियों 'अन्वय' एवं 'अन्विति' सहित अनेक आलोचनात्मक कृतियां प्रकाशित हो चुकी हैं. आप हिंदी अकादेमी के युवा कविता पुरस्कार एवं आलोचना के लिए उप्र हिंदी संस्थान के आचार्य रामचंद शुक्ल आलोचना पुरस्कार, जश्ने अदब द्वारा शाने हिंदी खिताब व कोलकाता के विचार मंच द्वारा प्रोफेसर कल्याणमल लोढ़ा साहित्य सम्मान से सम्मानित हो चुके हैं. संपर्कः जी-1/506 ए, उत्तम नगर, नई दिल्ली- 110059, मेल dromnishchal@gmail.com