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ई-साह‍ित्यः मनोज तिवारी बोले- कटाक्ष से घबराता नहीं, रिंकिया के पापा... सोशल चेंज सॉन्ग है

दिल्ली बीजेपी चीफ मनोज तिवारी ने e-साहित्य आजतक के मंच पर प्रवासी मजदूरों को निवासी मजदूर कहा और पलायन को बहुत हृदय विदारक घटना बताया.

e-Sahitya Aaj Tak 2020 e-Sahitya Aaj Tak 2020

  • ई-साह‍ित्य कार्यक्रम में मनोज तिवारी ने की शिरकत
  • बोले- राजनीति में भी कुछ लोग मृदुल बनना चाहते हैं
ई-साह‍ित्य आजतक कार्यक्रम के आख‍िरी द‍िन रविवार को दिल्ली बीजेपी अध्यक्ष और सांसद मनोज तिवारी ने शिरकत की. उन्होंने लॉकडाउन और प्रवासी मजदूरों के मुद्दे पर खुलकर बातचीत की. साथ ही मनोज तिवारी मृदुल नाम पर चर्चा की और अपने संघर्ष के दिनों के किस्से सुनाए. मनोज तिवारी ने e-साहित्य आजतक के मंच पर प्रवासी मजदूरों को निवासी मजदूर कहा और पलायन को बहुत हृदय विदारक घटना बताया.

उन्होंने तंज भरे लहजे में कहा कि राजनीति में भी लोग मृदुल बनना चाहते हैं. मनोज तिवारी मृदुल नाम को लेकर उन्होंने कहा कि 1996 में मैंने संगीत में करियर शुरू किया. तभी मृदुल नाम पड़ा. एक तरह से कह सकते हैं कि ये मेरा निक नेम हैं. वहीं, रिंकिया के पापा गीत पर कहा कि मैं कटाक्ष से घबराता नहीं हूं. ये सोशल चेंज सॉन्ग है.

उन्होंने क्रिकेट से लेकर कंपीटिशन तक में अपने सफल न होने की कहानी सुनाई और कहा कि असफल होने का दंश उसे ही पता होता है, जो असफल होता है. असफलता से सबक भी मिलता है. पहले की असफलता से राजनीति में बहुत कुछ सीखने को मिला है.

भागते-भागते कटे लॉकडाउन के दिन

मनोज तिवारी ने कहा कि लॉकडाउन का वक्त भागने-भागने में कटा. रोज 4 से 5 घंटे भागना होता है. पार्टी ने साफ कहा है कि जरूरतमंदों की मदद के लिए हर कार्यकर्ता को आगे रहना है. लॉकडाउन में लोगों की मदद का काम जारी है. उन्होंने कहा कि इस लॉकडाउन में मैं बैडमिंटन और क्रिकेट भी खूब खेला. क्रिकेट मानसिक रूप से एकदम फ्रेश कर देता है. साथ ही मेरी फिटनेस के लिए भी क्रिकेट जरूरी है.

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मनोज तिवारी ने कहा कि बोली और भाषाओं की अपनी सीमा है. भोजपुरी शब्दों का हिंदी विकल्प नहीं मिलता. जो भोजपुरी गायक फिल्म में आ गया, उसका ग्राफ नीचे ही गिरा गया है. पवन सिंह, दिनेश लाल यादव, खेसारी लाल यादव ये सभी बतौर गायक ही करियर शुरू किए थे, लेकिन बाद में फिल्में करने लगे. केवल रवि किशन शुक्ला ही हैं जो बतौर भोजपुरी एक्टर हैं.

मनोज तिवारी ने कहा कि अवधी, संथाली, मैथिली और भोजपुरी सिनेमा को क्षेत्रीय स्तर पर आना चाहिए और इस दिशा में उनकी राज्य सरकारों से अपील है. उनका दावा है कि इस दिशा में काम चल रहा है. इससे हजारों लोगों को रोजगार भी मिलेगा.

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