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Sedition law: 850 साल पुरानी हैं राजद्रोह कानून की जड़ें, जानिए गांधी और नेहरू के इस कानून पर क्या थे विचार

History of Sedition Law in India: राजद्रोह कानून के इस्तेमाल पर सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगा दी है. राजद्रोह का इतिहास 850 साल पुराना है. भारत में 1870 में राजद्रोह का कानून आईपीसी में जोड़ा गया था.

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राजद्रोह कानून को खत्म करने की मांग अक्सर उठती रही है. (फाइल फोटो-PTI) राजद्रोह कानून को खत्म करने की मांग अक्सर उठती रही है. (फाइल फोटो-PTI)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • सन् 1275 में मिलता है राजद्रोह का जिक्र
  • IPC में 1870 में इसे जोड़ा गया था
  • गांधी-नेहरू ने इस कानून की आलोचना की थी

History of Sedition Law in India: अंग्रेजों के जमाने का राजद्रोह कानून कुछ दिनों से चर्चा में है. राजद्रोह को अपराध बनाने वाली आईपीसी की धारा 124A की संवैधानिक वैधता को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है. इन याचिकाओं पर सरकार के जवाब से असंतुष्ट सुप्रीम कोर्ट ने राजद्रोह कानून के इस्तेमाल पर रोक लगा दी है. सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब तक कानून की समीक्षा नहीं हो जाती, तब तक इसका इस्तेमाल नहीं हो सकेगा.

राजद्रोह कानून के गलत इस्तेमाल को लेकर सुप्रीम कोर्ट अक्सर चिंता जाहिर करता रहा है. पिछले साल जुलाई में सुप्रीम कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा था कि आजादी के 75 साल बाद भी देश में इस कानून की जरूरत क्यों है? 

भारत में राजद्रोह का कानून अंग्रेजों से आया है. 1870 में आईपीसी में धारा 124A जोड़ी गई थी, जो राजद्रोह को अपराध बनाती है. भारत में राजद्रोह का कानून भले ही 150 साल पुराना हो, लेकिन इसकी जड़ें 850 साल से भी ज्यादा पुरानी हैं. 

कैसे आया राजद्रोह का कानून?

- अंग्रेजी कानून में राजद्रोह करीब 850 साल पुराना है. 1275 में हुई वेस्टमिंस्टर की संविधि से इसका पता लगाया जा सकता है. ये वो समय था जब राजा ही सर्वेसर्वा हुआ करता था. तब राजद्रोह का पता लगाने के लिए न सिर्फ भाषण की सच्चाई बल्कि इरादे पर भी गौर किया जाता था. उस समय राजद्रोह का कानून सत्ता के सम्मान के खिलाफ बोलने वालों को रोकने के लिए बनाया गया था.

- 1606 में राजा के फैसले में 'राजद्रोह' को 'अपराध' माना गया था. इसमें तर्क दिया था कि 'सरकार की सच्ची आलोचना में सरकार को बदनाम करने और अस्थिर करने की ज्यादा क्षमता होती है. इसलिए इस पर रोक जरूरी है.' 1868 में यूके की एक अदालत ने राजद्रोह को अपराध के तौर पर परिभाषित किया था.

- 1860 में भारत में जब इंडियन पीनल कोड (आईपीसी) आई, तब उसमें राजद्रोह का कानून नहीं था. मैकॉले के 1837 के पीनल कोड के ड्राफ्ट में धारा 113 का जिक्र था. यही बाद में धारा 124A बने. भारत में 1870 में संशोधन कर आईपीसी में धारा 124A को जोड़ा गया था. 

- 2018 में लॉ कमिशन के एक दस्तावेज में बताया गया था कि 1870 में राजद्रोह कानून को आईपीसी में इसलिए जोड़ा गया था, ताकि सरकार के खिलाफ उठ रही असंतोष की आवाजों को दबाया जा सके. हालांकि, लोग सरकार के खिलाफ अपनी भावनाओं को व्यक्त करने के लिए स्वतंत्र थे, लेकिन तब तक ही जब तक वो कानून का पालन कर रहे हैं.

- इसके अलावा 1911 में सीडिशियस मीटिंग्स एक्ट भी लाया गया था जो ऐसी पब्लिक मीटिंग को करने से रोकता था, जिससे राजद्रोह या असंतोष को भड़काने या अशांति पैदा करने की संभावना हो. इस कानून को 2018 में सरकार ने निरस्त कर दिया था.

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आजादी की लड़ाई और राजद्रोह

- अक्सर ऐसा दावा किया जाता रहा है कि ब्रिटिश शासन ने अपने खिलाफ उठ रही आवाजों को दबाने के लिए 124A का इस्तेमाल किया था. 

- 1892 में जोगेंद्र चंद्र बोस मामले में अदालत ने राजद्रो और आलोचना का अंतर बताया था. बोस एक समाचार पत्र निकालते थे और उन पर ब्रिटिश सरकार की आलोचना करने के लिए राजद्रोह का आरोप लगाया गया था.

- इस मामले में कहा गया था कि आईपीसी की धारा 124A इंग्लैंड के राजद्रोह के कानून से अलग है. इंग्लैंड में सरकार के खिलाफ कुछ भी भावना व्यक्त करने पर देशद्रोह लगता है, जबकि भारत में सिर्फ उसी मामले में ये धारा लग सकती है, जब किसी इरादे से सरकार के खिलाफ काम किया गया हो. उस समय कोर्ट ने कहा था कि धारा 124A असंतोष को सजा देती है न कि अस्वीकृति को.

- 1898 में बाल गंगाधर तिलक के खिलाफ इस कानून का इस्तेमाल किया गया था. इस मामले में तब कोर्ट ने कहा था कि सरकार के खिलाफ विद्रोह और जबरन प्रतिरोध करने वालों पर धारा 124A का इस्तेमाल होना चाहिए. कोर्ट ने इस मामले को खारिज कर दिया था. उसी साल एक और मामले में एक अदालत ने कहा था कि सरकार की अस्वीकृति का हर मामला 124A के तहत नहीं आता है.

- अदालतों की इस टिप्पणी के बाद 1898 में संशोधन किया गया और 'असंतोष' शब्द को और ज्यादा परिभाषित किया गया. इस संशोधन में असंतोष में 'विश्वासघात' और 'शत्रुता की भावना' को भी शामिल किया गया.

- 1922 में महात्मा गांधी को देशद्रोह के मामले में दोषी पाया गया था. इस कानून पर महात्मा गांधी ने कहा था कि नागरिकों की स्वतंत्रता को दबाने के लिए इंडियन पीनल कोड में जोड़ा गया है. सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई के दौरान कांग्रेस नेता कपिल सिब्बल ने ये बात बताई.

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आजादी के बाद राजद्रोह

- आजादी के बाद राजद्रोह कानून पर जमकर बहस हुई. सरदार वल्लभ भाई पटेल की कमेटी ने राजद्रोह को खत्म करने की बात कही थी. हालांकि, जब संविधान का प्रारूप तैयार हुआ, तो उसमें ये कानून रहा.

- 1950 में रोमेश थापर केस में पहली बार राजद्रोह पर किसी अदालत ने बड़ा फैसला दिया. उस मामले में सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जब तक कोई भाषण या अभिव्यक्ति सुरक्षा के लिए खतरा या सरकार को उखाड़ फेंकने के मकसद से व्यक्त न की गई हो, तब तक अनुच्छेद 19(2) के तहत कोई भी कानून अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता पर प्रतिबंध नहीं लगा सकता. 

- 1951 में संसद में भारत के पहले प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने भाषण देते हुए कहा था कि 'जितनी जल्दी हम इससे (धारा 124A) छुटकारा पा लें, उतना ही बेहतर है.' उन्होंने ये भी कहा था कि 'ये बेहद आपत्तिजनक है और इसकी कोई जगह नहीं होनी चाहिए.' हालांकि, इसके बावजूद ये संविधान में बना रहा. ये बात कपिल सिब्बल ने सुप्रीम कोर्ट में तब बताई, जब सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि नेहरू सरकार ने 124A में बदलाव करने के लिए कुछ नहीं किया, लेकिन मौजूदा सरकार ऐसा करने की कोशिश कर रही है.

- 1962 में केदार नाथ सिंह बनाम बिहार सरकार के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने फैसला देते हुआ कहा था कि हर नागरिक को सरकार की आलोचना करने का अधिकार है, बशर्ते वो अपनी बात से सरकार को अस्थिर करने या लोगों को हिंसा करने के लिए न उकसा रहा हो.

- 1995 में बलवंत सिंह बनाम पंजाब सरकार के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अहम फैसला दिया था. बलवंत सिंह पर एंटी इंडिया और खालिस्तान के समर्थन में नारे लगाने के आरोप में देशद्रोह का केस दर्ज किया गया था. कोर्ट ने इस केस को रद्द कर दिया था. कोर्ट ने कहा था कि चूंकि इन नारों से न हिंसा भड़की थी और न ही सार्वजनिक व्यवस्था पर कोई प्रभाव पड़ा था, इसलिए ऐसे नारे लगाना देशद्रोह नहीं है. कोर्ट ने कहा था कि आरोपी का इरादा लोगों को उकसाना या सार्वजनिक व्यवस्था को नुकसान पहुंचाने का नहीं था.

कानून बदलने के लिए क्या-क्या हुआ?

- 2018 में लॉ कमीशन ने राजद्रोह कानून पर कंसल्टेशन पेपर जारी किया था. इसमें कहा गया था कि राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए ये कानून जरूरी है, लेकिन अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के खिलाफ टूल की तरह इसका दुरुपयोग नहीं किया जाना चाहिए. इस रिपोर्ट में ये भी कहा था कि लोकतंत्र के लिए आलोचना और असहमति जरूरी है. हालांकि, इस रिपोर्ट के बाद लॉ कमीशन का कार्यकाल खत्म हो गया.

- इससे पहले 1968 में लॉ कमीशन ने अपनी 39वीं रिपोर्ट में कहा था कि राजद्रोह जैसे अपराधों में सजा का प्रावधान होना चाहिए. ऐसे अपराधों में आजीवन कारावास की सजा हो सकती है या फिर कठोर कारावास की सजा दी जा सकती है, जो 3 साल से ज्यादा नहीं होनी चाहिए.

- 2017 में हेट स्पीच पर आई लॉ कमीशन की 267वीं रिपोर्ट में कहा गया था कि जब तक कोई अभिव्यक्ति राष्ट्र की अखंडता, संप्रभुता या सुरक्षा के लिए खतरा नहीं है, तब तक उसे राजद्रोह नहीं माना जाना चाहिए. 

- हालांकि, इन सिफारिशों को केंद्र सरकार ने कभी लागू नहीं किया. लेकिन अब सरकार कह रही है कि वो 124A पर पुनर्विचार करने के लिए तैयार है. धारा 124A में संशोधन और हटाने के लिए 2011 और 2015 में संसद में प्राइवेट बिल भी पेश हुए थे, जो बाद में संसद से निरस्त हो गए.

 

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