लोकसभा चुनाव में करारी हार के बाद समाजवादी पार्टी (सपा) और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) अलग होकर विधानसभा चुनाव की तैयारी में जुट गए हैं. सपा अध्यक्ष अखिलेश यादव ने अपने पार्टी कार्यकर्ताओं की बैठक बुलाकर हार के कारणों की समीक्षा के साथ अगली रणनीति पर काम शुरू कर दिया है. वहीं बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपने जोनल कोऑर्डिनेटर की बैठक में साफ संदेश दे दिया है कि आगामी विधानसभा चुनावों और उपचुनावों में पार्टी के कार्यकर्ताओं को क्या करना है.
सपा सूत्रों के मुताबिक अखिलेश यादव पार्टी के बूथ स्तरीय कार्यकर्ताओं और जिला प्रभारियों से खासे नाराज हैं. बैठकों में उनकी क्लास लिए जाने की बात सामने आ रही है. जानकारी के मुताबिक अखिलेश यादव अभी पार्टी संगठन में कोई बड़ा बदलाव करना चाहते हैं लेकिन उससे पहले कार्यकर्ताओं से राय लेकर ही लोगों की जिम्मेदारियां तय होंगी.
कयास लगाए जा रहे हैं कि अखिलेश यादव देर-सबेर चाचा शिवपाल यादव से समझौता कर सकते हैं क्योंकि उनसे दूरी और कांग्रेस, बसपा से गठबंधन कर वे दो बार चुनावों में भारी नुकसान उठा चुके हैं. इस बारे में अखिलेश यादव को मुलायम सिंह ने भी नसीहत दी है. जब अखिलेश यादव मुलायम सिंह की बीमारी का हालचाल लेने उनके घर गए थे, तब इस मुद्दे पर बात हुई थी. साथ ही ये भी तय है कि अखिलेश यादव आनेवाले दिनों में चुनाव अकेले लड़ने का फैसला ले सकते हैं क्योंकि पिछले गठबंधन के प्रयोग में ज्यादा नुकसान उनकी समाजवादी पार्टी को ही उठाना पड़ा है.
उधर लोकसभा में मिली 10 सीटों से असंतुष्ट बसपा सुप्रीमो मायावती ने अपने कार्यकर्ताओं के साथ बैठक करना शुरू कर दिया है. सूत्रों के मुताबिक, मायावती ने बुधवार को पार्टी के जोनल कोऑर्डिनेटर्स को बुलाकर उन्हें समझाया है कि आने वाले दिनों में बूथ स्तर तक कार्यकर्ताओं को समझाएं और आने वाले 11 सीटों के उपचुनावों के लिए कमर कस लें. इसके लिए मायावती ने हर जिले के कोऑर्डिनेटर को निचले स्तर पर कार्यकर्ताओं के साथ जुड़ने, बूथ पर कार्यकर्ताओं को चिन्हित करके उन्हें पार्टी की विचारधारा का प्रचार-प्रसार करने के लिए निर्देशित किया है.
इस बार मायावती का ज्यादा जोर दलितों और पिछड़ों को ये संदेश देने पर है कि बीजेपी सरकार में किस तरह दलितों और पिछड़ों को उपेक्षित किया जा रहा है. मायावती ने शहरी इलाकों में मोहल्ला स्तर पर बसपा के लोगों का चुनाव करने का काम भी शुरू कर दिया है. इसके लिए पार्टी के कार्यकर्ताओं और पदाधिकारियों से नामों के सुझाव भी मांगे गए हैं.