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उन्नाव के डौंडियाखेड़ा की पूरी कहानी

उन्नाव का डौंडियाखेड़ा गांव कल तक अपने आसपास बसे अन्य गांव की तरह ही एक साधारण सा गांव था. लेकिन जब से पुरातत्व विभाग ने डौंडियाखेड़ा किले में गड़े खजाने का पता लगाने के लिये खुदाई शुरु की,

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उन्नाव का डौंडियाखेड़ा गांव कल तक अपने आसपास बसे अन्य गांव की तरह ही एक साधारण सा गांव था. लेकिन जब से पुरातत्व विभाग ने डौंडियाखेड़ा किले में गड़े खजाने का पता लगाने के लिये खुदाई शुरु की, तब से पूरे देश के नजरें इस गांव और किलें पर आकर टिक गयी हैं. हर कोई डौंडियाखेड़ा गांव और वहां स्थित किले का इतिहास जानने के लिये बेताब हैं. तो हम बताते हैं, डौंडियाखेड़ा और इसके किले का इतिहास.

डौंडियाखेड़ा जिसे पूर्व में द्रोणिक्षेत्र या द्रोणिखेर भी कहा जाता था. चंद्रगुप्त मौर्य काल में यह इलाका पांचाल प्रान्त का एक हिस्सा था. उस समय 400 से 500 गांवों के भू भाग को द्रोणिमुख कहा जाता था. डौंडियाखेड़ा को उन गांवों के केन्द्र होने के कारण द्रोणिक्षेत्र के नाम से जाना जाता था. इसीलिये क्षेत्र का काफी महत्व था, साथ ही यहां पर राजा का एक सैन्य अधिकारी अपनी सैन्य टुकड़ी के साथ रहता था.

इस गांव में बने किले के बारे में कहा जाता है कि यह किला चंद्रगुप्त मौर्य के काल से भी पहले बना था. प्रसिद्ध पुरातत्व वेत्ता अलेक्जेन्डर के मुताबिक गौतमबुद्ध कालीन अयोमुख (हयमुख) नामक प्रसिद्ध नगर यही था. जहां पर हर्षवर्धन काल मेंचीनी यात्री हवे्नसांग आया था.

डौंडियाखेड़ा में बने किले के बारे में कहा जाता है कि इस किले पर शुरुआत में भरों का कब्जा था. भरों से इस किले को जीतने के लिए बैंसो ने कई बार कोशिश की लेकिन असफल रहे. बाद में सन् 1266 के आसपास बैंसो के राजा करनराय के बेटे सेढूराय ने आखिरकार ये किला भरों से जीत लिया. जिसके बाद इस किले पर बैसों का अधिकार हो गया और ये राज्य बैसवारा के नाम से प्रसिद्ध हुआ. डौंडियाखेड़ा इसकी राजधानी थी.

बैस राजवंश में तिलोकचंद नाम के प्रतापी राजा हुये. जिन्होंने इस किले को सुदृढ़ कराया. किले के अंदर ही दो नये महल बनवाये और किलें के अदंर 500 और बाहर 10000 सैनिकों की तैनाती की. तिलोकचंद के बारे में कहा जाता है कि वो दिल्ली सल्तनत के बादशाह बहलोल लोदी के काफी नजदीकी सहयोगी के रुप में जाने जाते थे. तिलोकचंद के काल में ही उनके राज्य की सीमा का काफी विस्तार हुआ और उनका राज्य काल्पी, मैनपुरी से लेकर मानिकपुर (प्रतापगढ़) और पूर्व में बहराइच तक फैल गया.

अंग्रेजों द्धारा अंतिम राजा राव रामबक्श सिंह को फांसी देने के बाद इस किले पर हमला करके इसे तहस नहस कर दिया गया और बाद में इस टूटे फूटे किले को एक दूसरे बैस राजा दिग्विजय सिंह (मुरारमऊ ) को सौंप दिया. बैसों के प्रमुख राज्य की राजधानी होने के कारण किलें और नगर नष्ट होने के बाद भी इसका महत्व बराबर बना रहा.

अगर बात किले के भूगोल की जाए तो ये किला उन्नाव जिले से 33 मील दूर दक्षिण पूर्व में है जो कि 50 फीट उंचे एक विशाल टीलें पर बना था. पश्चिम की ओर गंगा नदी की धारा टीले को छूती हुई बहती है और किले का मुख्य द्धार पूर्व की ओर था. किले की सामने से लंबाई लगभग 385 फीट थी और पीछे का हिस्सा इससे कुछ और अधिक चौड़ा था.

किले का क्षेत्रफल भी लगभग 1,92,500 वर्ग फीट था. किला मिट्टी की 30-32 फीट मोटी दिवारों से घिरा था और किले के चारों ओर लगभग 50 फीट चौडी खाई थी, जिसमे हमेशा पानी भरा रहता था और ये किला उस समय के भारत के अभेद्यतम किलों में से एक माना जाता था. लेकिन ब्रिटिश सेनापति सर होप ग्रान्ट नें 1858 ई0 में इस किलें को जीतकर इसे तहस नहस कर दिया था.

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