सुप्रीम कोर्ट ने सोशल वेबसाइट्स पर कमेंट के चलते हुई गिरफ्तारी को गंभीर करार दिया है. कोर्ट केंद्र सरकार के इस तर्क से सहमत नहीं है कि सोशल साइट्स पर आपत्तिजनक टिप्पणियां लिखने के चलते कुछ लोगों की गिरफ्तारी ‘इक्का दुक्का घटनाएं’ हैं. अदालत ने कहा कि अगर ये अपवाद थे तो भी बहुत गंभीर था.
जस्टिस जे चेलामेश्वर की अगुवाई वाली बेंच से केंद्र सरकार के वकील ने मंगलवार को कहा कि वह आईटी एक्ट की धारा 66-ए के तहत की गई गिरफ्तारियों को जायज नहीं ठहरा रहे हैं लेकिन ये अफसरों के अपने अधिकारों के दुरूपयोग की ‘इक्का दुक्का घटना’ थीं.
कोर्ट ने कहा कि भले ही ये अपवाद और इक्का दुक्का घटनाएं हों, लेकिन अधिकारों का उल्लंघन बहुत ही गंभीर है. कोर्ट इस कानून के कुछ प्रावधानों को खत्म करने सहित विभिन्न राहत के लिए दायर याचिकाओं पर सुनवाई कर रहा था.
आपको बता दें कि आईटी एक्ट की धारा 66-ए में गिरफ्तारी करने और इस संचार माध्यम के जरिये आपत्तिजनक संदेश भेजने के आरोपी को तीन साल की कैद के प्रावधान विवादों में हैं. धारा 66-ए निरस्त करने के लिये कानून की छात्रा श्रेया सिंघल ने भी जनहित याचिका दायर कर रखी है.
एक याचिकाकर्ता की ओर से बहस शुरू करते हुये सीनियर वकील सोली सोराबजी ने कहा कि संविधान के अनुच्छेद 19 (1)(ए) में दिए गए बोलने और अभिव्यक्ति के अधिकार की रक्षा की जानी चाहिए और शासन इस अधिकार को कम नहीं कर सकता है. उन्होंने कहा कि अनुच्छेद 19 (2) के तहत इस पर उचित नियंत्रण लगाया जा सकता है.
सोराबजी ने कानून की धारा 66-ए को निरस्त करने का अनुरोध करते हुए कहा कि इसमें ‘अस्पष्टता’ है और यह बहुत ही आपत्तिजनक है. उन्होंने कहा कि पहले भी ऐसे प्रावधान को निरस्त किया गया है जो अस्पष्ट हों. कोई भी सार्वजनिक बयान किसी न किसी को परेशान कर सकता है.
गैर सरकारी संगठन 'कॉमन कॉज' के वकील प्रशांत भूषण ने भी धारा 66-ए सहित इस कानून के तीन प्रावधानों को निरस्त करने का अनुरोध किया. उनका कहना था कि ये अनुचित प्रावधान लोकतंत्र की हत्या कर देंगे.
इससे पहले, शीर्ष अदालत ने कहा था कि सोशल साइट्स पर आपत्तिजनक टिप्पणियां लिखने वाले व्यक्ति को पुलिस अपने सीनियर अफसरों की इजाजत के बगैर गिरफ्तार नहीं कर सकती है.
(भाषा से इनपुट)