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शिव के ‘नमो जाप’ के मायने तो कुछ और हैं!

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को प्रतीकों में बात कहने की कला बखूबी आती है. ईद के मौके पर चौहान की मौजूदगी में फिल्म अभिनेता रजा मुराद ने इशारों-इशारों में ही चौहान की तरह ही नरेंद्र मोदी को टोपी पहनने की नसीहत दी, तो चौहान से खार खाए बैठीं उमा भारती ने फौरन मोर्चा खोल दिया.

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शिवराज, मोदी और रजा
शिवराज, मोदी और रजा

मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री शिवराज सिंह चौहान को प्रतीकों में बात कहने की कला बखूबी आती है. ईद के मौके पर चौहान की मौजूदगी में फिल्म अभिनेता रजा मुराद ने इशारों-इशारों में ही चौहान की तरह ही नरेंद्र मोदी को टोपी पहनने की नसीहत दी, तो चौहान से खार खाए बैठीं उमा भारती ने फौरन मोर्चा खोल दिया.

उनका मोर्चा रजा मुराद के प्रति कम, शिवराज के लिए ज्यादा था क्योंकि चौहान की मौजूदगी में मोदी पर हुई टिप्पणी का उन्होंने प्रतिकार नहीं किया. उमा इस मामले को पार्टी फोरम पर उठाने का एलान कर चुकी हैं. शायद यही वजह है कि चौहान ने एक ट्वीट कर मोदी जाप किया, लेकिन उन्होंने जिस तरह मोदी के लिए प्रतीक का इस्तेमाल किया, वो अब तक सिर्फ बीजेपी के लौह पुरुष लालकृष्ण आडवाणी के लिए कहा जाता था. चौहान का यह कहना कि मोदी की तुलना सिर्फ सरदार पटेल से की जा सकती है. उनके मुताबिक, मोदी का काम और कद दोनों सरदार पटेल जैसा है. लेकिन चौहान की इस प्रतीकात्मक टिप्पणी के मायने बीजेपी में मोदी विरोधियों को खूब जम रही है.

सरदार पटेल भी हार्डलाईनर माने जाते थे. आजादी के बाद जब हुकूमत भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के हाथ आई तो कांग्रेस वर्किंग कमेटी के करीब 95 फीसदी सदस्य और ज्यादातर लोग सरदार पटेल को प्रधानमंत्री बनाने के पक्ष में थे. ठीक उसी तरह जैसे अभी बीजेपी में मोदी की लहर है और पार्टी के कार्यकर्ता और अधिकांश नेता ‘नमो जाप’ कर रहे हैं. लेकिन तब महात्मा गांधी ने अपने गृह राज्य गुजरात के सरदार पटेल की जगह पंडित जवाहर लाल नेहरू को तरजीह दी. गांधी से तुलना किसी नेता की नहीं की जा सकती, लेकिन परिस्थितिजन्य तुलना करें तो बीजेपी में फिलहाल गांधी की भूमिका में आडवाणी दिखते हैं, जिन्हें नरेंद्र मोदी के नाम पर एतराज है. यहां एक और बात दिलचस्प है कि सरदार पटेल हों या लालकृष्ण आडवाणी दोनों देश के गृह मंत्री बनकर ही रह गए. ऐसे में चौहान की ओर से मोदी की तुलना सिर्फ और सिर्फ सरदार पटेल से करने के मायने तो बिल्कुल साफ दिखते हैं. पार्टी में आडवाणी खेमे के माने जाने वाले बिहारी बाबू और सांसद शत्रुघ्न सिन्हा भी आडवाणी को प्रधानमंत्री और मोदी को पहले गृह मंत्री बनाए जाने की पैरवी कर चुके हैं. वैसे बीजेपी में एक और बात बेहद चर्चा में है कि कभी भी देश में कोई योजनाबद्ध तरीके से प्रधानमंत्री की कुर्सी तक नहीं पहुंच पाया है.

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आजादी के बाद दौड़ में सबसे आगे सरदार पटेल थे, लेकिन पं. नेहरू को मौका मिला. उनके निधन के बाद किसी ने नहीं सोचा था कि लाल बहादुर शास्त्री पीएम होंगे, लेकिन वे पीएम बनें. उनके बाद गुजरात के ही मोरारजी देसाईं प्रधानमंत्री बनने के सपने संजोए बैठे थे, लेकिन इंदिरा गांधी पीएम बन गईं. मोरारजी भाई को पीएम बनने का मौका तब मिला जब कांग्रेस छोडक़र उन्होंने दर्जन भर से ज्यादा पार्टियों को अपने साथ लिया. जनता पार्टी के समय 1977 में उनका पीएम बनने का सपना पूरा हुआ. उसी तरह इंदिरा गांधी के बाद राजीव गांधी अकस्मात पीएम बनें. वी.पी. सिंह, चंद्रशेखर, एच.डी. देवगौड़ा, इंद्र कुमार गुजराल और यहां तक कि अटल बिहारी वाजपेयी भी अचानक पीएम बने. बीजेपी में कार्यकर्ताओं की पसंद लालकृष्ण आडवाणी थे, जिन्होंने पांच साल की अथक मेहनत कर राम मंदिर आंदोलन खड़ा किया और पार्टी को सत्ता के शिखर तक ले जाने में निर्णायक भूमिका निभाई. लेकिन गठबंधन और नरम चेहरे की मजबूरी के तहत आडवाणी ने वाजपेयी का नाम आगे बढ़ाया.

इतिहास के उदाहरणों से शिवराज सिंह चौहान की टिप्पणी का मंतव्य सहजता से समझा जा सकता है.

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