गुजरात के बिलकिस बानो गैंगरेप के दोषियों की रिहाई का मामला लगातार सुर्खियों में बना हुआ है. दोषियों की रिहाई पर देशभर में सवाल खड़े किए जा रहे हैं. दोषियों को रिहा करने के फैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी गई है. लेकिन अब खबर है कि इन सभी 11 दोषियों ने डर की वजह से गांव छोड़ दिया है. आज तक की टीम ने इन दोषियों के परिवार वालों से एक्सक्लूसिव बातचीत की. इस बातचीत में दोषियों के परिवार वालों ने बताया कि इन लोगों ने दूसरे मामलों में फंसाए जाने के डर से अपना गांव छोड़ दिया है.
आज तक की टीम सबसे पहले बिलकिस बानो रेप मामले के आरोपी शैलेश भट्ट और मितेश भट्ट् के घर पहुंची. लेकिन घर के दरवाजे पर ताला लगा था. पूछने पर पड़ोसियों ने बताया कि वे मुश्किल से ही घर आते हैं. जेल से रिहा होने के बाद से ही शैलेश और मितेश गांव से बाहर हैं.
शैलेश और मितेश के घर से सिर्फ 50 मीटर की दूरी पर ही बाकाभाई का घर है. बाकाभाई के घर पहुंचने पर उनकी पत्नी मंगलीबेन और बच्चों से मुलाकात हुई. घर की हालत बहुत ही जर्जर है. परिवार का कहना है कि उनके पास रोजमर्रा के तौर पर पेट भरने के लिए खाना तक नहीं है. वे दिहाड़ी मजदूर के तौर पर दूसरों के खेतों में काम करते हैं.
मंगलीबेन कहती हैं, जेल से रिहा किए जाने के बाद भी बहुत डर बना हुआ है. हम बहुत गरीब लोग हैं. हम मुश्किल से रोजाना 100 रुपये तक कमा पाते हैं. कई बार तो 100 रुपये कमाना भी मुश्किल होता है. कभी-कभी हम खाना खाने किसी रिश्तेदार के घर चले जाते हैं, रोजाना जाने लगेंगे तो कोई नहीं खिलाएगा. हमारी किसी ने मदद नहीं की.
उन्होंने कहा, जब से मेरे पति जेल से बाहर आए हैं. वे लोग (मुस्लिम समुदाय) उनके और बाकियों के पीछे पड़ गए हैं. अगर बाजार जाते हैं, किसी अन्य जगह जाते हैं या घर के बाहर भी बैठते हैं तो उनकी तस्वीरें और वीडियो ले ली जाती है. उन्हें डराया और धमकाया जाता है कि वे रेप, छेड़छाड़ और रोड रेज जैसे झूठे मामलों में फंसा देंगे. यहां हमारी सुनने वाला कोई भी नहीं है. उत्पीड़न और डर की वजह से मेरे पति और बाकी के अन्य 10 लोगों ने गांव छोड़ दिया है. वे यहां से वहां भटकते रहते हैं. मुझे तो यह भी नहीं पता कि क्या उन्हें भरपेट खाना मिलता भी है या नहीं.
मंगलीबेन गांव के अलग-अलग खेतों में मजदूरी करती हैं. इनमें से कुछ खेत तो मुस्लिमों के हैं. इस वजह से मंगलीबेन को काम मिलना बंद हो गया है.
वह बताती हैं, मेडिकल इलाज के लिए हमारे पास पैसे तक नहीं है. हम लगातार लोगों से पैसे उधार ले रहे हैं. हम डर में जी रहे हैं. वे कहते हैं कि हमारे लोगों को दोबारा जेल भेजेंगे, वरना वे उन्हें झूठे मामलों में फंसा देंगे. हमारे पास किसी का समर्थन नहीं है. अगर उन्हें दोबारा किसी मामले में फंसा दिया तो हम क्या करेंगे? मेरा पूरा परिवार मुझ पर ही निर्भर है. मैं ही घर में एकमात्र कमाने वाली शख्स हूं.
मंगलीबेन ने कहा, गांव में सांप्रदायिक माहौल नहीं है. गांव में हर कोई शांति से अपना काम करता है. मामले में जेल से छूटने पर कोई जुलूस नहीं निकाला गया, कोई डीजे नहीं बजा या कोई पटाखे नहीं जलाए गए. हम बहुत गरीब लोग हैं, अगर उनके पास सबूत के तौर पर तस्वीरें या वीडियो हैं तो दिखाएं.
मंगलीबेन ने कहा, वे हमें डराते हैं और हमें उनसे डरने की जरूरत नहीं है. बाकी अन्य लोगों ने भी डर की वजह से गांव छोड़ दिया है.
आज तक की टीम ने स्थानीय डॉक्टर नीलेश बामनिया से भी बात की. उन्होंने कहा, रंधिकपुर गांव में शांति है. हमें सिर्फ अंतर्राष्ट्रीय और राष्ट्रीय समाचारों में ही नेगेटिव खबरें सुनने को मिलती हैं. हमें मीडिया रिपोर्ट्स से ही पता चला कि ये लोग जेल से छूटकर घर आ गए हैं. मैं मेन रोड पर ही रहता हूं, अगर कोई जुलूस या डीजे बजाया जाता तो मुझे पता चला लेकिन ऐसा कुछ नहीं हुआ. सभी 11 लोग बहुत ही गरीब पृष्ठभूमि से हैं. वे जर्जर घरों में रहते हैं. उन्हें डर है कि अन्य समुदाय के लोग उन्हें झूठे मामलों में फंसा देंगे. अगर वे बाजार या किसी सार्वजनिक जगह गए तो उनसे मारपीट होगी. इस डर की वजह से उन्होंने अपने घर छोड़ दिए हैं. बिलकिस बानो के समर्थकों ने ऐसा माहौल बना दिया है. यहां तक कि मैंने मीडिया से ही सुना कि मुस्लिम लोग भी गांव छोड़ रहे हैं. रंधिकपुर में शांति है.
आजतक की टीम शैलेश भट्ट और मितेश भट्ट के घर गया लेकिन उनके घर पर ताला लगा था. राधेश्याम के घर पर भी ताला लगा था.
बता दें कि साल 2002 में पांच महीने की गर्भवती बिलकिस बानो से गैंगरेप किया गया था. उनके परिवार के सात सदस्यों की हत्या भी कर दी गई थी. इस मामले में 21 जनवरी 2008 को मुंबई की विशेष सीबीआई अदालत ने 11 आरोपियों को दोषी ठहराते हुए उम्रकैद की सजा सुनाई थी. बाद में बॉम्बे हाईकोर्ट ने भी सजा को बरकरार रखा था. लेकिन गुजरात सरकार ने माफी नीति के आधार पर इन 11 दोषियों को समय से पहले ही रिहा कर दिया था.