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तिलक तराजू से जय श्री राम तक...मायावती की सियासी जरूरतों के हिसाब से बदलते रहे BSP के नारे

बसपा सुप्रीमो मायावती जब BSP के प्रबुद्ध सम्मेलन में शामिल हुईं तो जय श्रीराम के नारे भी लगे. जबकि कभी BSP के सम्मेलन में ही ‘मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम’ नारे लगे थे.

यूपी चुनाव की तैयारियों में जुटीं मायावती (फोटो-PTI) यूपी चुनाव की तैयारियों में जुटीं मायावती (फोटो-PTI)
स्टोरी हाइलाइट्स
  • मायावती की पार्टी BSP ने सियासी जरूरत के हिसाब से नारे बदले
  • BSP के 6 नारे हैं जो सबसे ज्यादा चर्चा में रहे

त्रिशूल हाथ में लेकर मायावती के सामने प्रबुद्ध सम्मेलन में जय श्रीराम के नारे लगे. यह उस पार्टी का ही सम्मेलन है जिसमें कभी बीजेपी को रोकने के लिए ‘मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम’ नारे लगे थे और मायावती वहां भी मौजूद थीं.

बसपा सुप्रीमो मायावती ने प्रबुद्ध सम्मेलन के पहले दौर के समापन पर इस बात का संकेत दे दिया कि बहुजन समाज पार्टी अपने 'सर्वजन हिताय-सर्वजन सुखाय' के सूत्र वाक्य पर आगे बढ़ेगी. लेकिन अगर बसपा के नारों को देखें तो यह साफ दिखेगा कि बसपा के नारे मायावती की सियासी जरूरतों के हिसाब से बदलते रहे हैं.

वैसे तो नारे सभी दलों के लिए चुनाव में कई बार संजीवनी का काम करते हैं पर बसपा सुप्रीमो मायावती के नारे उनकी सियासी जरूरत और उनकी रणनीति का भी संकेत देते रहे हैं. बसपा के जिस नारे ने सबसे ज़्यादा सुर्ख़ियां बटोरीं वो नारा था ‘तिलक तराजू और तलवार इनको मारो जूते चार’. सवर्ण जातियों के खिलाफ इस तरह के नारे की बहुत आलोचना हुई थी.

हालांकि, शुरुआती दौर के बाद जब मायावती ने सोशल इंजीनियरिंग का दामन थामा तो कई बार इस बात को कहा कि बसपा की तरफ़ से ये नारा कभी नहीं लगाया गया. हाल ही में पार्टी के ब्राह्मण चेहरे सतीश मिश्रा और खुद मायावती ने ये बात दोहराई है कि ऐसा नारा कभी नहीं लगाया गया.

‘जो बहुजन की बात करेगा, वो देश पर राज करेगा’ था नारा

1984 में BSP के गठन के बाद पार्टी ने दलित वोटों पर अपना वर्चस्व क़ायम करते हुए ‘बहुजन हिताय’ की बात की. इस समय ये नारा भी बहुत प्रचलित था कि ‘जो बहुजन की बात करेगा, वो देश पर राज करेगा.’ लेकिन जल्दी ही कड़वे सियासी अनुभवों से मायावती को ये समझ में आ गया कि सिर्फ़ एक वर्ग के वोट से सत्ता की चाभी मिलना सम्भव नहीं.

इसमें मुलायम सिंह यादव की समाजवादी पार्टी से तालमेल का वो कड़वा अनुभव भी था जिसने मायावती को सत्ता तक तो पहुंचाया पर ठहरने नहीं दिया. लेकिन उस समय वोट के ध्रुवीकरण के लिए मंच से ‘मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम’ जैसे नारे भी लगते रहे.

  • 'जो बहुजन की बात करेगा, वो देश पर राज करेगा'
  • 'मिले मुलायम कांशीराम, हवा में उड़ गए जय श्रीराम'
  • 'बहुजन हिताय बहुजन सुखाय' 
  • 'सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय' 
  • 'ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी बढ़ता जाएगा'
  • 'हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है'

इस कदम के बाद मायावती ने अपनी सियासी ताक़त बढ़ाने के लिए 1997 और 2002 में जब भाजपा के सहयोग से सरकार बनायी तो ‘जय श्रीराम वाले नारे’ पर पर जवाब देने से बचती रहीं. फिर बसपा और मायावती के लिए साल 2007 में टर्निंग पाइंट आया. तब मायावती यह समझ चुकी थीं कि बिना सोशल इंजीनियरिंग के सत्ता के शिखर पर ठहरना सम्भव नहीं. तब नीले रंग से रंगी दीवारों पर हाथी बनाकर लिखे गए नारे ‘बहुजन हिताय बहुजन सुखाय’ की जगह ‘सर्वजन हिताय सर्वजन सुखाय’ नारे ने ली.

यही नहीं चुनाव में भी ‘ब्राह्मण शंख बजाएगा, हाथी बढ़ता जाएगा’ और ‘हाथी नहीं गणेश है, ब्रह्मा विष्णु महेश है’ जैसे नारे खूब लगे. मायावती को इन नारों के बाद सफलता भी मिली .

आज यूपी की राजनीति में हाशिए पर पहुंची बसपा की वापसी के लिए उसी सोशल इंजीनियरिंग को धार देने की जरूरत है. इसके अलावा जिस ब्राह्मण वोट की बात सभी दल कर रहे उनको भी साधने की क़वायद शुरू हो चुकी है इसलिए प्रबुद्ध सम्मेलन में बीएसपी सुप्रीमो की मौजूदगी में ना सिर्फ जय श्रीराम ने नारे लग रहे हैं बल्कि मायावती ‘सर्वजन हिताय सार्वजनिक सुखाय’ की बात कर रही हैं. सूत्रों के अनुसार अब इसी नयी राजनीतिक जरूरत के अनुसार और नारे गढ़े जाएंगे जो चुनाव से पहले सुनाई देंगे.

 

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