धोरों की धरती यानी राजस्थान में इन दिनों मौसम के साथ ही चुनावी पारा भी हाई है. चुनाव में ताल ठोकने वाले नेता जनता के बीच हैं और वोटर्स को रिझाने के लिए पूरे दमखम से प्रयास में जुटे हुए हैं. बात शेखावाटी रीजन की करें तो इस क्षेत्र के मध्य में स्थित एक लोकसभा क्षेत्र है सीकर. ये इन दिनों दिलचस्प राजनीतिक मुकाबले से गुजर रहा है. इस सीट से एक ओर हैं सीपीआई (एम) के कैंडिडेट कामरेड अमरा राम और दूसरी ओर बीजेपी के प्रत्याशी हैं स्वामी सुमेधानंद सरस्वती. दिलचस्प बात ये है कि दो बार से इसी सीट पर जीत हासिल कर चुके सुमेधानंद सरस्वती के लिए इस बार मुकाबला बेहद कठिन है. यहां 19 अप्रैल को वोटिंग होनी है.
बता दें कि राजस्थान में मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस ने सुमेधानंद के खिलाफ अपना कोई उम्मीदवार नहीं उतारा है. बल्कि कांग्रेस ने ये सीट इंडिया ब्लॉक में अपनी सहयोगी भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के लिए छोड़ दी है. जानकारों की मानें तो इस सीट पर सीपीआई (एम) का अच्छा खासा प्रभाव बताया जाता है. इस रणनीतिक पैंतरेबाज़ी ने कांग्रेस और कम्युनिस्टों के बीच एक रोचक साझेदारी को जन्म दिया है. साथ ही गठबंधन के दोनों सहयोगी सुमेधानंद को बड़ी चुनौती दे रहे हैं, इसके चलते ये इस जाट बहुल क्षेत्र में हाल के वर्षों में हुई ये सबसे कठिन लड़ाई बन गई है.
BJP कैंडिडेट को लेकर कैसा है माहौल?
दरअसल, सांसद सुमेधानंद की अपने निर्वाचन क्षेत्र से गैर-मौजूदगी को लेकर उनकी आलोचना हो रही है. फिर भी वह अपने कार्यकाल के दौरान किए गए कार्यों के दम पर आलोचकों का मुकाबला कर रहे हैं. उनके और बीजेपी के नेतृत्व वाली केंद्र सरकार द्वारा शुरू की गई योजनाएं उनके पक्ष में काम कर रही हैं. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी की इमेज बीजेपी के लिए हर चुनाव में काफी कारगर साबित होती रही है. इसके बावजूद सीपीआई (एम) के नेतृत्व में विपक्ष किसानों की समस्याओं और बेरोजगारी के मुद्दे को उठा रहा है. विपक्ष के इन मुद्दों को पूरे निर्वाचन क्षेत्र में बल मिल रहा है, जिससे 'मोदी करिश्मा' भी फीका पड़ता नजर आ रहा है.
क्या हैं सीकर के मुद्दे?
सीकर लोकसभा सीट इस समय कई मुद्दों में उलझा हुआ है, यहां किसानों में काफी नाराजगी देखने को मिल रही है. किसान अपनी फसल, खासकर प्याज के लिए उचित दाम न मिलने पर सरकार को दोषी मानते हैं. यह क्षेत्र पूरी तरह से खेती किसानी पर निर्भर है, यहां मुख्य रूप से बाजरा, जौ, कपास और दालों की खेती होती है.
चुनावी डगर कितनी मुश्किल, कितनी आसान?
सीकर लोकसभा सीट के जाति समीकरण की बात करें तो अमरा राम, जिन्हें लोग 'कॉमरेड' के नाम से जानते हैं, और स्वामी सुमेधानंद जिन्हें लोग प्रेम से 'बाबा' बुलाते हैं. दोनों ही जाट समुदाय से आते हैं. दो बार के सांसद स्वामी सुमेधानंद सरस्वती राजस्थान के बजाय हरियाणा के रोहतक के मूल निवासी हैं. इसके विपरीत उनके प्रतिद्वंद्वी अमरा राम किसानों के आंदोलन के चेहरे और बॉर्डर प्रोटेस्ट में सक्रिय भागीदार निभाने वाले नेता हैं. हालांकि कॉमरेड के लिए भी जीत की राह आसान नहीं है. पिछले 6 लोकसभा चुनाव में उन्हें हार का सामना करना पड़ा था. इसके अलावा कांग्रेस के साथ गठबंधन होने के बावजूद उनके रिश्ते उनकी चुनावी सफलता में एक बड़ी बाधा बन सकते हैं.अमराराम हाल के किसान आंदोलन का एक जाना-पहचाना चेहरा हैं, उन्हें जाट आबादी का समर्थन प्राप्त है. लेकिन अमराराम के लिए आगे का काम उनके लगातार हारे हुए चुनावों और कांग्रेस के साथ उनके अनिश्चित गठबंधनों के कारण कठिन बना हुआ है.
दोनों प्रत्याशियों ने तेज किया अभियान
2 बार के सांसद सुमेधानंद एक कुशल राजनेता के रूप में जाने जाते हैं. उन्होंने लंबे समय से चली आ रही स्थानीय मांग, जैसे सीकर में सेना भर्ती केंद्र स्थापित करने के अपने प्रयासों से युवाओं के असंतोष को कम करने की कोशिश की है. उन्होंने अग्निवीर योजना को लेकर गलत जानकारी फैलाने के लिए विपक्ष को जिम्मेदार ठहराया और रक्षा मंत्री राजनाथ सिंह का हवाला देते हुए वोटर्स को आश्वासन दिया कि अग्निवीरों को सेना की ड्यूटी के बाद अर्धसैनिक बलों में रोजगार की पेशकश की जाएगी. दूसरी ओर अमरा राम अपना अभियान किसानों, कृषि श्रमिकों और युवाओं के मुद्दों पर केंद्रित करते हैं. उन्होंने कांग्रेस, लेफ्ट और आरएलपी के गठबंधन को सही ठहराते हुए कहा कि यह गठबंधन केंद्र सरकार की नीतियों के प्रति लोगों की नाराजगी का प्रतीक है. उनके अभियान चिह्न हसिया-हथौड़ा का प्रतीक है.
सीकर सीट का जातिगत समीकरण
राजस्थान में जाट बहुल क्षेत्र सीकर लोकसभा चुनाव के लिहाज से काफी अहम है. यहां जाटों का वोट शेयर लगभग 28% है, मुस्लिम आबादी लगभग 10% है, इसके बाद राजपूत लगभग 6% हैं. अनुसूचित जाति की आबादी 17% है और अनुसूचित जनजातियां 3.5% हैं. इस सीट पर 21 लाख से अधिक वोटर हैं.
पिछले चुनावों पर एक नजर
अगर पिछले विधानसभा चुनावों के दौरान कांग्रेस ने 8 विधानसभा क्षेत्रों में से पांच पर कब्जा किया. जबकि भाजपा ने शेष तीन सीटें हासिल कीं. भले ही कांग्रेस ने 5 सीटें जीतीं, लेकिन बीजेपी का वोट शेयर 41.3% था, जबकि कांग्रेस का वोट शेयर 40.5% था. 2019 के लोकसभा चुनाव बीजेपी के लिए जीत का गवाह बने. जिसने 58.4% वोटों के साथ सीटें हासिल कीं. जबकि कांग्रेस ने 36.1 फीसदी. सीपीआई (एम) को सिर्फ 2.4 फीसदी वोट शेयर मिला था. इन नतीजों की तुलना 2014 के लोकसभा चुनावों से करने पर यह स्पष्ट हो जाता है कि भाजपा की लोकप्रियता में बढ़ोतरी देखी गई है. 10 साल पहले हुए चुनाव में बीजेपी को 46.8 फीसदी वोट मिला था, जबकि कांग्रेस को सिर्फ 24.5 फीसदी वोट मिले थे. 2014 के चुनावों में बीजेपी के बागी सुभाष महरिया को 17.7% वोट मिले थे. जबकि उस चुनाव में सीपीआई (एम) को अपने दम पर 5% वोट मिला था.