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रोहतक लोकसभा: दमदार चेहरा उतार सकती है BJP, हुड्डा की पकड़ मजबूत

रोहतक लोकसभा सीट पर 1952 से लेकर 2014 तक 17 बार चुनाव हुए हैं, यहां से ज्यादातर जाट समुदाय के नेता सांसद बने हैं. क्योंकि रोहतक में जाट वोटर्स की आबादी काफी ज्यादा है. इसलिए पार्टियां अधिकतर जाट समुदाय के नेता को ही उम्मीदवार बनाती हैं.

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अपने पिता के साथ दीपेंद्र सिंह हुड्डा ( फोटो: फाइल)
अपने पिता के साथ दीपेंद्र सिंह हुड्डा ( फोटो: फाइल)

भारतीय जनता पार्टी रोहतक लोकसभा सीट युद्ध की छाया में ही जीती है, जनसंघ के बैनर तले पार्टी दो बार 1962 और 1971 में यहां से कामयाबी मिली थी. उसके बाद इस सीट पर जीत के लिए बीजेपी तरस गई है. हालांकि 1999 के चुनाव में बीजेपी का इंडियन नेशनल लोकदल के साथ गठबंधन था और यहां से INLD के उम्मीदवार कैप्टन इंदर सिंह को जीत मिली थी. इसलिए पिछले करीब 30 साल से इस सीट पर वापसी नहीं कर पाई है. अब 2019 के चुनाव में बीजेपी की कोशिश है कि किसी तरह यहां से 3 बार सांसद रहे दीपेंद्र सिंह हुड्डा को मात दी जाए.

2014 का जनादेश

दरअसल 2014 के लोकसभा चुनाव में मोदी लहर के बावजूद हरियाणा के रोहतक लोकसभा सीट से कांग्रेस उम्मीदवार दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने बीजेपी उम्मीदवार को 1,70,436 वोटों से हरा दिया. दीपेंद्र सिंह हुड्डा को 46.86 फीसद वोट के साथ कुल 4,90,063 वोट मिल थे, जबकि बीजेपी के उम्मीदवार ओम प्रकाश धनकड़ को 30.55 फीसदी वोट शेयर के साथ कुल 3,19,436 वोट पड़े थे. जबकि तीसरे नंबर 1,51,120 वोट के साथ INLD के उम्मीदवार शमशेर सिंह खरकडा रहे थे. आम आदमी पार्टी के उम्मीदवार नवीन जयहिंद को 46,759 वोट पड़े थे. वहीं 4,932 मतदाताओं ने नोटा का इस्तेमाल किया था.

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इससे पहले 2009 के लोकसभा चुनाव में दीपेंद्र सिंह हुड्डा ने 2014 से भी बड़ी जीत हासिल की थी. इस चुनाव में हुड्डा INLD के नफे सिंह राठी को 4,45,736 वोटों से हराया था. हुड्डा को करीब 70 फीसदी वोट के साथ कुल 5,85,016 मत मिला था.

रोहतक लोकसभा क्षेत्र के दायरे में 9 विधानसभा सीटें हैं. जिनके नाम- गढ़ी-सांपला-किलोई, महम, रोहतक, कलानौर, बहादुरगढ़, बादली, झज्जर, बेरी और कोशली है, इन 9 सीटों में से 5 पर कांग्रेस को जीत मिली है और 4 पर बीजेपी का कब्जा है.

सामाजिक ताना-बाना

रोहतक लोकसभा सीट पर 1952 से लेकर 2014 तक 17 बार चुनाव हुए हैं, यहां से ज्यादातर जाट समुदाय के नेता सांसद बने हैं. क्योंकि रोहतक में जाट वोटर्स की आबादी काफी ज्यादा है. इसलिए पार्टियां अधिकतर जाट समुदाय के नेता को ही उम्मीदवार बनाती हैं. यहां से 11 बार कांग्रेस ने बाजी मारी है. केवल 1962, 1971, 1977, 1980, 1989 और 1999 में गैर-कांग्रेसी प्रत्याशी को जीत हासिल हुई. कांग्रेस के अंदर भी 1952 और 1957 में सांसद दीपेंद्र सिंह हुड्डा के दादा रणबीर सिंह हुड्डा, 1991, 1996, 1998 और 2004 में भूपेंद्र सिंह हुड्डा सांसद चुने गए, जबकि 2005, 2009 और 2014 में दीपेंद्र हुड्डा सांसद बने.

INLD में दो फाड़ के बाद बीजेपी रोहतक सीट पर ज्यादा फोकस कर रही है. क्योंकि अगर 2019 में बीजेपी दीपेंद्र सिंह हुड्डा को हराने में कामयाब रही तो इसका सीधा असर आगामी विधानसभा चुनाव में कांग्रेस के मनोबल पर पड़ेगा. बीजेपी यहां से कोई बड़ा और दमदार चेहरा उतार सकती है. वो बड़ा चेहरा जाट समुदाय से हो सकता है. बीजेपी में इसको लेकर तेजी से तलाश जारी है, भले ही वो नाम बॉलीवुड या फिर क्रिकेट जगत से क्यों न हो.

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सांसद का रिपोर्ट कार्ड

40 साल के दीपेंद्र सिंह हुड्डा 16वीं लोकसभा के दौरान 2014 से अब तक संसद में 51 परिचर्चा में हिस्सा ले चुके हैं. जबकि ये तीन बार लोकसभा में प्राइवेट मेंबर बिल लेकर आए. वहीं अपने 5 साल के कार्यकाल में कांग्रेस सांसद ने कुल 81 सवाल पूछे.

रोहतक का इतिहास

इतिहास की मानें तो पहले रोहतासगढ़ (रोहतास का दुर्ग) कहलाने वाले रोहतक की स्थापना एक पंवार राजपूत राजा रोहतास द्वारा की गई थी. यहां 1140 में निर्मित दीनी मस्जिद है, रोहतक के खोकरा कोट टीले की खुदाई में बौद्ध मूर्तियों के अवशेष मिले थे.

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