लोकसभा चुनाव 2019 के तहत गुजरात की छोटा उदयपुर लोकसभा सीट पर बीजेपी ने फिर अपना परचम लहराया है. भारतीय जनता पार्टी(बीजेपी) प्रत्याशी गीता राठवा 377943 वोटों के अंतर से अपने नजदीकी प्रतिद्वंदी को शिकस्त देने में कामयाब रही. अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित इस सीट पर कुल 8 प्रत्याशी मैदान में थे. हालांकि मुख्य मुकाबला बीजेपी और कांग्रेस के बीच ही रहा.
2019 का जनादेश
भारतीय जनता पार्टी(बीजेपी) प्रत्याशी गीता राठवा को सात लाख 64 हजार 445 वोट मिले, वहीं कांग्रेस उम्मीदवार रंजीत मोहन सिंह राठवा को तीन लाख 86 हजार 502 को वोट मिले. 32868 वोटों के साथ नोटा का वोट प्रतिशत 2.67 रहा. बहुजन समाज पार्टी के बालाजीभाई राठवा को 14964 वोट मिले. बता दें कि इस सीट पर तीसरे चरण के तहत 23 अप्रैल को मतदान हुआ था और मतदान का प्रतिशत 67.60 रहा है.
पिछले चुनाव में इस सीट पर 71.6% मतदान हुआ था जिसमें बीजेपी प्रत्याशी रामसिंह राठवा को 607,916 वोट (55.2%) और कांग्रेस प्रत्याशी नारणभाई राठवा को 428,187 (38.9%) वोट मिले थे.
सामाजिक ताना-बाना
2011 की जनगणना के मुताबिक, यहां की कुल आबादी 22,90,199 है. इसमें से 87 फीसदी आबादी ग्रामीण और 13 फीसदी शहरी है. अनुसूचित जाति (SC) की जनसंख्या 3.23 प्रतिशत और अनुसूचित जनजाति (ST) 56.27 प्रतिशत है.
छोटा उदयपुर लोकसभा क्षेत्र के अंतर्गत सात विधानसभा सीट हैं. इनमें हलोल, सानखेड़ा, नांदोड, छोटा उदयपुर, दभोई, जेतपुर, पादरा सीट हैं. सानखेड़ा, नांदोड, छोटा उदयपुर और जेतपुर सीट अनुसूचित जनजाति के लिए आरक्षित है. जबकि बाकी सीटें सामान्य हैं. 2017 के विधानसभा चुनाव में हलोल से बीजेपी, सानखेड़ा से बीजेपी, नांदोड से कांग्रेस, छोटा उदयपुर से कांग्रेस, दभोई से बीजेपी, जेतपुर से कांग्रेस और पादरा से कांग्रेस ने जीत दर्ज की थी. यानी इस लोकसभा के तहत आने वाली सात विधानसभा में से 3 सीट बीजेपी और 4 कांग्रेस ने जीती थीं.
सीट का इतिहास
छोटा उदयपुर सीट पर पहला चुनाव इमरजेंसी के बाद 1977 में हुआ था. इस पहले चुनाव में ही कांग्रेस ने यहां से बाजी मारी थी और अमरसिंह राठवा पहले सांसद बने थे. इसके बाद 1980 और 1984 के चुनाव में भी अमरसिंह राठवा ने परचम लहराया और संसद पहुंचे. 1989 के चुनाव में यहां परिवर्तन हुआ और जनता दल के टिकट पर नारणभाई राठवा ने अमरसिंह राठवा को शिकस्त दी. जनता दल का विघटन होने पर उन्होंने अगला चुनाव यानी 1991 का आम चुनाव जनता दल (गुजरात) के टिकट पर लड़ा और एक बार फिर जीत दर्ज की.
नारणभाई राठवा ने अब कांग्रेस का हाथ थाम लिया और 1996 के चुनाव में फिर जीत गए. 1998 का चुनाव भी नारणभाई राठवा ने कांग्रेस के टिकट पर अपने नाम कर लिया. लेकिन 1999 में उनकी जीत पर बीजेपी के रामसिंह राठवा ने ब्रेक लगा दिया. हालांकि, रामसिंह बहुत ही मामूली अंतर से उन्हें हरा पाए, लेकिन इस चुनाव में नारणभाई का विजयरथ रुक गया. 2004 में जब देशभर में बीजेपी का शाइनिंग इंडिया नारा फेल हुआ तो नारणभाई ने फिर वापसी कर ली और रामसिंह राठवा को हरा दिया.
हालांकि, पिछले दो चुनाव यानी 2009 और 2014 में रामसिंह ने नारणभाई का स्वाद बिगाड़ दिया. 2009 में हालांकि, नारणभाई कम अंतर से हारे, लेकिन 2014 में मोदी लहर के साथ रामसिंह राठवा काफी आगे निकल गए.
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