अमेरिका-इजरायल की ओर से शनिवार को हुए इस हमले की नींव दिसंबर के आखिर में पड़ी, जब इजरायल के प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू ने मार-ए-लागो में ट्रंप से मुलाकात की. उस समय ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शन शुरू ही हुए थे और यह साफ नहीं था कि वे कितने बड़े बनेंगे. नेतन्याहू ने पिछली संयुक्त सैन्य कार्रवाई के बाद अगली रणनीति पर चर्चा की, जो मुख्य रूप से ईरान की बैलिस्टिक मिसाइल क्षमता पर केंद्रित थी और मई के आसपास की योजना थी. लेकिन कुछ ही दिनों में हालात बदल गए.
ईरानी सरकार ने सख्ती से प्रदर्शन दबा दिए और हजारों लोगों के मारे जाने की खबरें आईं. ट्रंप ने सोशल मीडिया पर लिखा, 'मदद पहुंचने वाली है' और प्रदर्शनकारियों से सरकारी संस्थानों पर कब्जा करने की अपील की. 14 जनवरी को ट्रंप हमले का आदेश देने ही वाले थे, लेकिन उन्होंने कदम पीछे खींच लिया. इसके बजाय उन्होंने मिडिल ईस्ट में बड़ी सैन्य तैनाती की और इजरायल के साथ एक संयुक्त ऑपरेशन की गुप्त योजना बनानी शुरू की.
वॉशिंगटन में बना ऑपरेशन 'एपिक फ्यूरी' और 'रोअरिंग लायन' का प्लान
आने वाले हफ्तों में मोसाद प्रमुख, इजरायली सैन्य खुफिया प्रमुख और आईडीएफ चीफ ऑफ स्टाफ वॉशिंगटन गए. वहीं 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' और 'ऑपरेशन रोअरिंग लायन' की रूपरेखा तैयार की गई. इसी दौरान ट्रंप ने यह भी परखा कि क्या सैन्य दबाव के जरिए ईरान से उनकी शर्तों पर समझौता कराया जा सकता है. फरवरी की शुरुआत में अमेरिका और ईरान के बीच ओमान में मुलाकात हुई. कुछ दिन बाद नेतन्याहू वॉशिंगटन पहुंचे ताकि बातचीत और संभावित संयुक्त हमले पर चर्चा हो सके.
ट्रंप के दूत जेरेड कुशनर और स्टीव विटकॉफ को शुरुआत से ही समझौते की संभावना कम लग रही थी, लेकिन उन्होंने बातचीत जारी रखी. ईरान को साफ बता दिया गया था कि अगर जल्दी ठोस प्रगति नहीं हुई तो सैन्य कार्रवाई होगी. जिनेवा बैठक से एक हफ्ते पहले अमेरिका और इजरायल ने हमले की संभावित तारीख तय कर ली थी- वही शनिवार, जब खामेनेई अपने सरकारी परिसर में नियमित बैठक करते थे. चुनौती यह थी कि उन्हें शक न हो और वे अंडरग्राउंड बंकर में न चले जाएं. एक इजरायली खुफिया अधिकारी के मुताबिक, मीडिया में खामेनेई की हत्या की संभावना वाली खबर से कुछ चिंता जरूर हुई, लेकिन उन्होंने अपनी योजना नहीं बदली.
जिनेवा की अंतिम बातचीत
गुरुवार को कुशनर और विटकॉफ जिनेवा पहुंचे. उन्हें पहले से अंदेशा था कि समझौता मुश्किल है, लेकिन उन्होंने बैठक की ताकि ईरान को लगे कि कूटनीति जारी है. एक अमेरिकी अधिकारी ने कहा, 'बातचीत का नियम है कि जल्दी समझ आ जाना चाहिए कि समझौता संभव है या नहीं.' बैठक में ईरान अमेरिकी रुख के करीब भी नहीं आया. अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक तीन मुद्दों पर सहमति नहीं बनी:
न्यूक्लियर प्रोग्राम: अमेरिका ने ईरान को नागरिक परमाणु कार्यक्रम के लिए मुफ्त ईंधन देने का प्रस्ताव दिया, बशर्ते वह यूरेनियम संवर्धन छोड़े. ईरान ने इनकार कर दिया.
बैलिस्टिक मिसाइल प्रोग्राम: ईरान ने अपनी मिसाइल क्षमता पर चर्चा से मना कर दिया.
क्षेत्रीय गुटों को फंडिंग: ईरान ने क्षेत्रीय मिलिशिया समूहों को मिलने वाली मदद पर भी बात नहीं की.
अधिकारियों का कहना है कि खुफिया रिपोर्टों से संकेत मिला कि ईरान कथित रूप से नष्ट की गई परमाणु सुविधाओं को फिर से बना रहा था. जब अमेरिकी टीम ने ठोस प्रस्ताव मांगा, तो ईरान ने सात पन्नों का दस्तावेज दिया, जिसमें संवर्धन की जरूरत बताई गई थी. अमेरिका ने इसे 2015 के समझौते से भी ज्यादा क्षमता वाला बताया.
आखिरी घंटे
जिनेवा के बाद ओमान के विदेश मंत्री वॉशिंगटन पहुंचे और आखिरी कोशिश की, लेकिन तब तक ट्रंप फैसला कर चुके थे. जब शुक्रवार को एक अरब अधिकारी ने विटकॉफ से पूछा कि क्या कोई हमला संभव है, तो उन्होंने सवाल को टाल दिया. शनिवार सुबह खामेनेई ने अपने सहयोगियों की बैठक बुलाई, जैसा अनुमान था.
उसी समय तेहरान में दो अन्य सुरक्षा बैठकों भी चल रही थीं. कुछ ही मिनटों बाद तीनों जगहों पर एक साथ हमले हुए. एक इजरायली अधिकारी ने कहा, 'अगर ईरान जिनेवा में ट्रंप की शर्तें मान लेता, तो हमला टल सकता था. लेकिन उन्हें लगा कि ट्रंप कार्रवाई नहीं करेंगे. वे गलत साबित हुए.'
रोहित शर्मा