अगर ट्रंप ने नॉर्थ कोरिया पर किया हमला तो चीन देगा तानाशाह का साथ, ये है वजह

ट्रंप को ये पता है कि जब तक चीन है, तब तक नॉर्थ कोरिया पर अमेरिका हमला नहीं कर सकता. वजह ये है कि नॉर्थ कोरिया से ना सिर्फ चीन की आर्थिक साझेदारी और दोस्ती है, बल्कि नॉर्थ कोरिया से टकराव चीन के साथ भी टकराव की वजह बन सकता है.

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अमेरिका-उत्तरी कोरिया के बीच क्या होगी चीन की भूमिका? अमेरिका-उत्तरी कोरिया के बीच क्या होगी चीन की भूमिका?

सुरभि गुप्ता

  • नई दिल्ली,
  • 04 सितंबर 2017,
  • अपडेटेड 9:44 AM IST

नॉर्थ कोरिया के छठे परमाणु परीक्षण के बाद पूरी दुनिया के सुर में सुर मिलाते हुए बेशक चीन ने भी उसकी मज़म्मत की हो, लेकिन हकीकत यही है कि चीन और नॉर्थ कोरिया के कुछ अलग और खास रिश्ते हैं. शायद यही वजह है कि नॉर्थ कोरिया और अमेरिका आए दिन एक-दूसरे को देख लेने की धमकी तो देते हैं, लेकिन दोनों को इस बात का अहसास भी है कि चीन की सूरत में उनके दरम्यान एक ऐसी दीवार खड़ी है, जिसे पार कर एक-दूसरे से भिड़ पाना इतना आसान भी नहीं है.

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किम जोंग उन और डोनाल्ड ट्रंप की तकरार

एक तरफ नॉर्थ कोरिया का मार्शल किम जोंग उन है, तो दूसरी तरफ महाशक्तिशाली देश का . दोनों एक दूसरे को आमने-सामने से देखे बिना ही इस कदर नफरत करने लगे हैं कि लगता है एक दूसरे पर हमला किए बिना चैन की सांस नहीं लेंगे. डोनाल्ड ट्रंप तो खैर किम को काफी दिनों से धमकी देते आ रहे हैं. लेकिन इस नए परमाणु परीक्षण ने जैसे नॉर्थ कोरिया पर अमेरिका की त्योरियां और चढ़ा दी हैं, जबकि किम ने भी कसम खा रखी है कि वो अमेरिकी द्वीप गोआम को बर्बाद करके दम लेगा. ऐसे में छठे परमाणु परीक्षण के बाद चीन ही एक ऐसा मुल्क है, जिसकी तरफ पूरी दुनिया की निगाहें टिकी हैं.

नॉर्थ कोरिया पर चीन का रुख

ट्रंप को भी ये पता है कि जब तक चीन है, तब तक नॉर्थ कोरिया पर अमेरिका हमला नहीं कर सकता. वजह ये है कि नॉर्थ कोरिया से ना सिर्फ चीन की आर्थिक साझेदारी और दोस्ती है, बल्कि नॉर्थ कोरिया से टकराव चीन के साथ भी टकराव की वजह बन सकता है. ये और बात है कि इस परमाणु परीक्षण के बाद चीन ने भी अपने साझेदार नॉर्थ कोरिया को आड़े हाथों लिया है और सब्र से काम लेने की ताकीद की है.

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वाशिंगटन-बीजिंग के बीच है ये संधि

दरअसल अगर अमेरिका नॉर्थ कोरिया पर हमला करता है, तो उसे लेने के देने पड़ सकते हैं क्योंकि जंग की हालत में हर हाल में नॉर्थ कोरिया का साथ देना ही होगा, ऐसा इसलिए क्योंकि अमेरिका और नॉर्थ कोरिया दोनों के एक साथ चीन की संधियां हैं. 1950 से लेकर 1953 तक नॉर्थ और साउथ कोरिया के बीच चली जंग में चीन और रूस ने उत्तर कोरिया का साथ दिया था. जिसके बाद यूएन की मध्यस्थता में हुई एक युद्ध विराम संधि के साथ ही ये जंग खत्म हुई थी. इस संधि के दौरान वाशिंगटन और बीजिंग के बीच एक समझौता ये भी हुआ था कि अगर अमेरिका भविष्य में नॉर्थ कोरिया पर हमला करता है तो सीज फायर टूट जाएगा.

उत्तर कोरिया-चीन के बीच है ये संधि

इसके अलावा 1961 में चीन और उत्तर कोरिया की वामपंथी सरकारों ने आपस में एक और अहम संधि की थी. इसका नाम ‘चीन-उत्तर कोरियाई पारस्परिक सहायता और सहयोग मित्रता संधि’ था. इस संधि में कहा गया है कि अगर चीन और नॉर्थ कोरिया में से किसी भी देश पर कोई दूसरा देश हमला करता है, तो दोनों देशों को तुरंत एक-दूसरे का सहयोग करना पड़ेगा. पिछले वर्षों में इन दोनों देशों ने इस संधि की वैधता की अवधि बढ़ाकर 2021 तक कर दी है.

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विदेश मामलों के कुछ जानकार कहते हैं कि इस संधि से दोनों देशों को बड़ा फायदा मिला है, जहां चीन ने इससे अपने व्यापारिक हित साधे, वहीं नॉर्थ कोरिया ये संधि करके अपने आप को और सुरक्षित करने में कामयाब हो गया.

उत्तर कोरियाई बाजार में चीन का राज

आर्थिक नजरिये से भी चीन के लिए बहुत ज्यादा अहम है. पिछले चार दशकों से उत्तर कोरियाई बाजार में चीन का राज कायम है. इसके अलावा अमेरिकी सेनाओं की इस क्षेत्र में मौजूदगी ने भी चीन को परेशान कर रखा है और इसीलिए वो जल्द इस समस्या को हल करना चाहता है. चीन लगातार यही कोशिश कर रहा है कि किसी तरह जंग के हालात को खत्म किया जा सके. इसलिए चीनी विदेश मंत्री ने अमेरिका और उत्तर कोरिया दोनों को ही चेताते हुए कहा था कि अगर युद्ध हुआ तो उसमें जीत किसी की नहीं होगी, जबकि दोनों को कभी ना दूर होने वाले जख्म झेलने पड़ सकते हैं.

क्या होगी चीन की भूमिका?

मगर अब चीन में इस बात की सुगबुगाहट तेज है कि जंग के हालात में चीन का रोल क्या होगा. सरकारी अखबार ग्लोबल टाइम्स के मुताबिक अगर अमेरीका नॉर्थ कोरिया के खिलाफ सत्ता परिवर्तन के इरादे से हमला करता है तो चीन को चुप नहीं रहना चाहिए.

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