...कल्पना कीजिए एक ऐसे शहर की, जहां आप सुबह की सैर पर निकलें तो बगल से करोड़ों की बुगाटी चिरॉन सरसराती हुई निकल जाए, सड़क पर खड़ा पुलिस का सिपाही हाथ में रोलेक्स घड़ी पहने ट्रैफिक संभाल रहा हो, जिधर भी नजर जाए उधर आम मकान नहीं, सिर्फ आलीशान स्काईस्क्रेपर्स और बंगले खड़े हों. नजर दाएं जाए तो भूमध्य सागर का खूबसूरत किनारा दिखे और दुनिया के सबसे महंगे लग्जरी सुपरयाट्स की लाइन लगी हो. यानी एक ऐसा परीलोक जहां आम शहरों की चिक-चिक नहीं, बल्कि चमचमाती जिंदगी ही 'न्यू नॉर्मल' हो.
ये कोई फिल्मी कल्पना नहीं है, बल्कि एक ऐसे शहर की हकीकत है जिसकी लाइफस्टाइल देखकर दुनिया के किसी भी कोने में रहने वाले इंसान को रश्क हो जाए. ये कहानी है मोनाको की जिसे दुनिया का दूसरा सबसे छोटा मुल्क कहा जाता है.
मोनाको को एक माइक्रोनेशन या सिटी-स्टेट कहा जाता है, क्योंकि यह महज 2.02 वर्ग किलोमीटर इलाके में फैला है. आसान शब्दों में कहें तो दिल्ली के इंडिया गेट से कनॉट प्लेस तक के एक छोटे से इलाके से भी कम जगह में पूरा देश बसा है. लेकिन अमीरी ऐसी कि दुनिया का कोई भी बड़ा शहर इसके आगे पानी भरता दिखे. इस भूमध्यसागरीय मुल्क को दुनिया के सबसे अमीर लोगों के 'खेल के मैदान' के रूप में देखा जाता है, जहां फॉर्मूला-1 रेस से लेकर कैसीनो तक के लिए दुनियाभर के रईस जुटते हैं.
संयुक्त राष्ट्र के मानव विकास सूचकांक और विश्व बैंक के आंकड़े बताते हैं कि मोनाको में रहने वाले लोगों की औसत सालाना आय ₹2 करोड़ से भी अधिक है, जो दुनिया में सबसे ऊपर है. यहां की कुल 39,000 की आबादी में से 40% से अधिक लोग करोड़पति या अरबपति हैं. संयुक्त राष्ट्र की डेमोग्राफिक रिपोर्ट के मुताबिक यहां की औसत जिंदगी लगभग 87 वर्ष है, जो दुनिया में सबसे ज्यादा है.
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मोनाको की सबसे बड़ी यूएसपी यह है कि यहां लोगों की व्यक्तिगत कमाई पर कोई टैक्स नहीं लगता. मतलब यहां इंसान जो भी कमाता है, पूरा का पूरा अपने घर लेकर जाता है. इसी टैक्स-फ्री लाइफस्टाइल की वजह से दुनिया भर के अमीर कारोबारी, निवेशक, सेलिब्रिटीज और हाई-नेट-वर्थ लोग यहां बसना पसंद करते हैं. यहां की सड़कों, मरीना और रेस्टोरेंट्स में संपन्नता दिखती ही नहीं, महसूस भी की जा सकती है.
लेकिन ठहरिए, ये चकाचौंध आखिरी सच नहीं है. अमीरी के इस शोर के बीच यहां एक मिडिल क्लास समाज भी सांस लेता है. ये मोनाको के वो 'आम' इंसान हैं जो इन 40% अरबपतियों में नहीं आते- जैसे बैंक का क्लर्क, स्कूल का शिक्षक या अस्पताल की नर्स. इन लोगों के लिए इस मुल्क में जिंदगी जीना वित्तीय जंग से कम नहीं है, क्योंकि चारों ओर रईसी का बेहिसाब शोर है.
इस बेतहाशा महंगाई का सबसे पहला और क्रूर शिकार यहां का रियल एस्टेट मार्केट है. नाइट फ्रैंक की वेल्थ रिपोर्ट के अनुसार, मोनाको में संपत्ति की औसत दरें ₹42 लाख से ₹45 लाख प्रति वर्ग मीटर से भी ऊपर हैं. यहां किराए पर एक छोटा सा 1 BHK फ्लैट लेना भी किसी मध्यमवर्गीय परिवार की वित्तीय कमर तोड़ देता है. क्योंकि उसका मासिक किराया ही लगभग ₹3.5 लाख से ₹5.3 लाख तक आता है. इसके अलावा ग्रोसरी, कैफे, रेस्टोरेंट, परिवहन और पार्किंग जैसी बुनियादी सेवाएं सामान्य यूरोपीय शहरों की तुलना में कई गुना अधिक महंगी हैं.
इसका नतीजा यह है कि मोनाको को सुचारू रूप से चलाने वाले असली मिडिल क्लास लोग- जैसे होटल स्टाफ, शेफ, नर्स, पुलिसकर्मी, शिक्षक, दुकानदार और सफाई कर्मचारी- मोनाको के भीतर रहने का खर्च उठा ही नहीं सकते. इसलिए रात को ये शहर खाली हो जाता है. इस शहर-राज्य की पूरी जीवनशैली और अर्थव्यवस्था उन हजारों कामकाजी लोगों पर टिकी है, जिन्हें स्थानीय भाषा में 'फ्रंटालियर्स' कहा जाता है.
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रोजाना करीब 57,000 बाहरी कर्मचारी हर सुबह पड़ोसी देश फ्रांस के नीस, मेंटन या इटली के सीमावर्ती गांवों से आने वाली ट्रेनों और बसों से यहां उतरते हैं. ये लोग मोनाको के कैफे में कॉफी परोसते हैं, सड़कों को साफ करते हैं, दफ्तरों को व्यवस्थित रखते हैं और आलीशान होटलों की सुरक्षा करते हैं. फिर शाम में अपने मुल्क फ्रांस या इटली लौट जाते हैं.
इन आम लोगों की आय फ्रांस के आम वेतन के मुकाबले काफी बेहतर होती है मतलब औसतन ₹4 लाख से ₹5 लाख प्रति महीना. ये कर्मचारी दुनिया के सबसे महंगे शहर में दिन के 8 घंटे एक रईस माहौल का हिस्सा बनते हैं, लेकिन शाम होते ही वापस अपने सामान्य फ्रांसीसी या इतालवी जीवन में लौट जाते हैं, जहां वे अपनी साधारण कारों में ईंधन भरवाते हैं और सामान्य सुपरमार्केट से बजट देखकर राशन खरीदते हैं.
दूसरी ओर, स्थानीय लोगों के लिए इस आवासीय संकट से निपटने के लिए मोनाको के शासक प्रिंस अल्बर्ट द्वितीय की सरकार ने एक विशेष व्यवस्था की है. सरकार अपने मूल नागरिकों को भारी सब्सिडी वाले 'सोशल हाउसिंग' प्रदान करती है. लेकिन यह सुविधा केवल उन लगभग 9,000 लोगों के लिए है जिनके पास यहां का असली पासपोर्ट है. बाकी बचे विदेशी प्रवासियों के लिए राह आसान नहीं है.
लेकिन जो स्थानीय लोग यहां रहते हैं उनकी जिंदगी सुरक्षा और नागरिक सुविधाओं के लिहाज से किसी वरदान जैसी है. यहां क्राइम रेट जीरो है क्योंकि हर 73 निवासियों पर एक पुलिस अधिकारी तैनात है. पूरे देश का चप्पा-चप्पा 24 घंटे हाई-डेफिनिशन कैमरों की निगरानी में रहता है. इलाका इतना छोटा है कि एक भी संदिग्ध शख्स सीसीटीवी कैमरे में दिखते ही पूरा मुल्क सील कर दिया जाता है.
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आम लोगों के लिए कई विश्वस्तरीय सुविधाएं भी हैं. यहां के सरकारी स्कूल पूरी तरह मुफ्त हैं और उनका स्तर किसी अंतरराष्ट्रीय बोर्डिंग स्कूल जैसा है. प्रिंसेस ग्रेस हॉस्पिटल में आम नागरिकों को भी वही विश्वस्तरीय इलाज मिलता है जो किसी अरबपति को. पहाड़ी रास्तों के लिए विशाल पब्लिक लिफ्ट लगी हैं और प्रदूषण कंट्रोल के लिए सरकार लोगों को मुफ्त इलेक्ट्रिक साइकिलें देती है.
हालांकि, इस अति-सुरक्षित माहौल की अपनी एक मनोवैज्ञानिक कीमत भी है. एक स्थानीय नागरिक के शब्द इस हकीकत को बयां करते हैं- 'यहां अपराध न होने के बराबर है. आप अपनी महंगी गाड़ी की चाबी भी अंदर ही छोड़ सकते हैं. लेकिन आप कभी भी पूरी तरह से आजाद महसूस नहीं करते, कैमरे हमेशा आपको देख रहे होते हैं.'
इतनी सुविधाओं के बावजूद मोनाको में मिडिल क्लास जिंदगी जीना हमेशा एक अदृश्य मानसिक दबाव में जीने जैसा है. जब आपके चारों तरफ लोग करोड़ों की गाड़ियों में घूम रहे हों, तो रईसों के उस बड़े मंच पर खुद को एक 'बैकस्टेज आर्टिस्ट' की तरह महसूस करना मानसिक रूप से थका देता है.
संदीप कुमार सिंह