लेबनान में इजरायली डिफेंस फोर्सेज (IDF) द्वारा दक्षिण लेबनान और दक्षिणी बेरूत खाली करने के आदेश के बाद भारी मानवीय संकट पैदा हो गया है. इस मुश्किल वक्त में 60 लाख की आबादी वाला यह देश अभूतपूर्व एकता का परिचय दे रहा है. लेबनान की जनसंख्या में करीब 30 फीसदी शिया मुस्लिम, 30 फीसदी सुन्नी मुस्लिम और 30 फीसदी ईसाई शामिल हैं.
धार्मिक नजरिए से बंटे होने के बावजूद दक्षिणी लेबनान के एक ईसाई गांव 'मखदोशा' ने इंसानियत की मिसाल पेश की है.
मखदोशा गांव के लोगों ने अपने स्कूल इमारतों के दरवाजे 200 विस्थापित परिवारों के लिए खोल दिए हैं, जो जंग की वजह से बेघर हो गए थे.
मजहब पर भारी पड़ी इंसानियत...
लेबनान से आजतक के रिपोर्टर अशरफ वानी की ग्राउंड रिपोर्ट के मुताबिक, लेबनानी समाज इस वक्त किसी भी धार्मिक भेदभाव से ऊपर उठकर एक-दूसरे की मदद कर रहा है. विस्थापन का शिकार हुए लोगों को छत देने और उनके भोजन-पानी की व्यवस्था करने में स्थानीय लोग बढ़-चढ़कर हिस्सा ले रहे हैं.
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साउथ लेबनान का ईसाई बहुल गांव मखदोशा इस वक्त चर्चा का केंद्र बना हुआ है. जब आईडीएफ के आदेश के बाद हजारों लोग सुरक्षित ठिकानों की तलाश में भटक रहे थे, तब इस गांव ने आगे आकर अपने संसाधनों को साझा किया. स्कूल की इमारतों को शेल्टर होम में बदल दिया गया है, जहां अब सैकड़ों परिवार बिना किसी डर के रह रहे हैं.
अमेरिका-इजरायल-ईरान संघर्ष के बढ़ते दायरे ने लेबनान को इस कदर जकड़ लिया है कि उसकी सरकार का कहना है कि न तो उसने ऐसा चाहा था और न ही इसे मंज़ूरी दी थी. जैसे-जैसे इजरायली हमले तेज़ होते जा रहे हैं और हिज़्बुल्लाह की कार्रवाइयां देश को संघर्ष में और भी गहराई तक खींच रही हैं, लेबनान हाल के इतिहास के सबसे गंभीर मानवीय संकटों में से एक का सामना कर रहा है.
अशरफ वानी