'जानबूझकर ईरान के निशाने पर भेजा...', कुवैत अटैक में बचे अमेरिकी फौजियों की आपबीती, 6 की गई थी जान

कुवैत में अमेरिकी सैन्य बेस पर हुए घातक ड्रोन हमले में छह अमेरिकी सैनिकों की मौत हो गई थी. वहीं 20 सैनिक घायल हो गए थे. सैनिकों ने दावा किया है कि बेस पर सुरक्षा कवच न होने की वजह से ये हमला रोका नहीं जा सका. जबकि अमेरिकी रक्षा सचिव ने कड़ी सुरक्षा का दावा किया था.

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इस हमले में 6 अमेरिकी सैनिक मारे गए थे. (File Photo: AP) इस हमले में 6 अमेरिकी सैनिक मारे गए थे. (File Photo: AP)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 11 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 1:41 PM IST

ईरान और इजरायल के बीच छिड़े युद्ध के दौरान कुवैत में अमेरिकी सैन्य बेस पर हुए हमले में छह अमेरिकी सैनिक मारे गए थे. अमेरिकी रक्षा सचिव पीट हेगसेथ ने कहा था कि एक 'स्कर्टर' ड्रोन कुवैत के एक किलेबंद बेस की सुरक्षा में सेंध लगाकर अंदर घुस गया था. लेकिन इस हमले में जिंदा बचे सैनिकों इस दावे को सरासर झूठ बताया है.

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अमेरिकी सैन्य बेस पर हुआ ये हमले 2021 के बाद अमेरिकी सेना पर हुआ सबसे घातक हमला था. इसे लेकर सीबीएस न्यूज को दिए इंटरव्यू में सैनिकों ने दावा किया कि इस हमले को रोका जा सकता था और उन्हें जानबूझकर खतरे में डाला गया. सैनिकों ने खुलासा किया कि असल में बेस पर हवाई हमलों से बचने के लिए कोई सुरक्षा कवच मौजूद नहीं था.

एक घायल सैनिक ने अमेरिका के दावों को लेकर कहा, 'ये कहना कि एक ड्रोन सुरक्षा घेरा तोड़कर निकल गया, ये गलत है. हकीकत ये है कि हमारी यूनिट के पास आत्मरक्षा का कोई साधन नहीं था. वो कोई सुरक्षित किला नहीं, बल्कि एक पुराना सैन्य बेस था.' 

इस कहानी के केंद्र में '60 बहादुर' सैनिक हैं, जो 103वें सस्टेनमेंट कमांड का हिस्सा थे. युद्ध शुरू होने से पहले, ट्रंप सरकार ने कुवैत में तैनात ज्यादातर सैनिकों को जॉर्डन और सऊदी अरब ट्रांसफर कर दिया था क्योंकि वो इलाके ईरानी मिसाइलों की मारक क्षमता से बाहर थे.

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जानबूझकर सैनिकों को खतरे में डाला गया?

हालांकि, इन 60 कर्मियों को जानबूझकर ईरान के करीब 'शुआइबा बंदरगाह' के पास एक छोटी सैन्य चौकी पर भेजा गया. उनका काम हथियारों और उपकरणों के फ्लो को मैनेज करना था. एक सैनिक ने कहा, 'हमें बिना किसी साफ वजह के ईरान के करीब एक ऐसे असुरक्षित इलाके में भेज दिया गया, जो पहले से ही उनके निशाने पर था.'

पुराने जमाने का बेस और ड्रोन का खतरा

सैनिकों ने बताया कि जिस 'टैक्टिकल ऑपरेशंस सेंटर' में वो तैनात थे, वो ड्रोन युद्ध के दौर से बहुत पहले बना था. वहां सिर्फ कंक्रीट के बैरियर थे जो रॉकेट या मोर्टार रोक सकते थे, लेकिन ऊपर से होने वाले हमलों के खिलाफ वो बेकार थे.

एक सैनिक ने बताया कि वहां बस कुछ छोटे बैरियर और टिन की बनी छोटी इमारतें थीं जिन्हें ऑफिस बनाया गया था. बंकर के नाम पर वो सबसे कमजोर जगह थी. सैनिक ने दावा किया कि अमेरिकी खुफिया विभाग को पहले से जानकारी थी कि य बेस ईरान का निशाना बन सकती है.

2 मार्च का खौफनाक मंजर

दरअसल 2 मार्च को कुवैत में अमेरिकी बेस पर सायरन बजा था, जिसके बाद सैनिकों ने एक कंक्रीट बंकर में शरण ली थी. उस दौरान एक बैलिस्टिक मिसाइल ऊपर से गुजर गई, जिसके बाद 'ऑल-क्लियर' का अलर्ट जारी किया गया और सैनिक अपने दफ्तरों में लौट आए. लेकिन करीब 30 मिनट बाद, अचानक जमीन हिलने लगी और ईरान के 'शाहिद ड्रोन' ने सीधे बेस के बीचों-बीच धमाका कर दिया.

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इस हमले 6 सैनिकों की जान चली गई और 20 सैनिक घायल हो गए थे. एक सैनिक ने बताया, 'सब कुछ वैसा था जैसा फिल्मों में दिखता है. कानों में घंटियां बज रही थीं, आंखों के सामने धुंधलापन था और चारों तरफ धूल ही धूल थी.'

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