समरकंद की धूल भरी हवा में एक अजीब-सी खामोशी छाई हुई थी. गुर-ए-अमीर के गुंबद के नीचे एक खूंखार जंगजू अपनी कब्र में 500 सालों से आराम कर रहा था. लेकिन उस तारीख कुछ बदलने वाला था. किसी ने उसकी कब्र पर दस्तक दी.
अंदर सो रहे लड़ाके का नाम था तैमूर लंग. इस लंगड़े तैमूर की करतूतें रोम रोम में सिहरन पैदा कर देती हैं. वो तैमूर दु्श्मन के खोपड़ियों की मीनारें खड़ी करवाता था. जिसने शहरों को राख कर दिया था, जिसके घोड़े की टापों से धरती कांप जाती थी.
आइए इतिहास की यात्रा पर निकलते हैं. वर्ष 1404. 68 साल का तैमूर, जो अबतक तुर्की, ईरान, इराक, सीरिया, दिल्ली और अनातोलिया जीत चुका था, ने अपने लश्कर का मुंह चीन की ओर मोड़ दिया. जुनूनी तैमूर अब इस जमीन पर अपना परचम लहराना चाहता था. सोचिए 600 साल पहले लोग सर्दियां कैसे काटा करते होंगे. और जब जंग पर जाना हो, खुले आसमान में, दूर फैले मैदान में, दरियाओं को लांघना हो, पहाड़ों पर चढ़ना हो तो कैसी गुजरती होगी.
तैमूर का कारवां और समरकंद की सर्दी
तैमूर का लश्कर निकल पड़ा. तापमान फ्रीजिंग पॉइंट पर था. लेकिन एक पैर से छोटा तैमूर जोश से उबलता हुआ. तैमूर के जरनैलों ने डरते-डरते मशविरा पेश किया- हुजूर इंतजार किया जाए, मौसम बदलने का. हकीमों ने भी राय दी. लेकिन तैमूर का जिद किसी की सुनता कहां था. गौरतलब है कि तैमूर वसंत में युद्ध करना पसंद करता था.
तैमूर ने समरकंद में भव्य दावत दी, दस्तारखाने पर परिवार वालों के साथ बैठकर भोजन किया और उन्हें विदाई दी. वक्त दिसंबर का था.
2 लाख की फौज लेकर तैमूर समरकंद से निकल पड़ा. सिर दरिया को पारकर वो ओतरार (आधुनिक कजाकिस्तान) की ओर बढ़ा. खैर इंसान की शख्सियत जितनी भी बड़ी हो जाए प्रकृति के आगे उसकी नहीं चलती.
जनवरी 1405 में भयंकर सर्दी ने ओतरार में उसे जकड़ लिया. दुनिया का खूरेंजी लड़ाका जुकाम और निमोनिया/ बुखार से कराह रहा था. कोई भी इलाज उसके ठंडे जिस्म को गर्मी न दे सकी. 17/18 फरवरी 1405 को तैमूर मर गया. उसकी मृत्यु से पहले उसकी सेना चीन की सीमा तक भी नहीं पहुंची थी. चीन फतह करने का तैमूर ख्वाब बर्फ की मोटी परतों में दफन हो गया.
तैमूर समरकंद लौटा. लेकिन इस बार न तो वो जीता था, न ही हारा था. इस बार उसकी आमद एक मुर्दा के तौर पर हुई थी.
समरकंद के एक मकबरे में उसे दफना दिया गया. इसे गुर-ए-अमीर कहते हैं.
कहानी तो यही खत्म हो जानी चाहिए थी
रक्त पिपासु एक लुटेरे आक्रांता की कहानी तो यही खत्म हो जानी चाहिए थी. लेकिन इतिहास की कहानियों में कई रोमांच और ट्विस्ट होते हैं.
असल रहस्य यहीं से शुरू होता है. 500 साल से ज्यादा अरसा गुजर गया. दुनिया ए फानी कितनी बार बनी, कितनी बार बिगड़ी. तैमूर अपनी कब्र में सोता रहा.
फिर जून 1941 में उसे किसी ने जगा दिया.
सोवियत रूस के तानाशाह जोसेफ स्टालिन ने मशहूर रूसी मानव-विज्ञानी मिखाइल गेरासिमोव को तैमूर के शव को बाहर निकालने के लिए भेजा. स्टालिन देखता चाहता था कि तैमूर का चेहरा कैसा था. साथ उसका वैज्ञानिक अध्ययन किया जा सके. स्टालिन का जिज्ञासु मन जानना चाहता था कि क्या तैमूर वाकई लंगड़ा था.
रूस के मशहूर मानव विज्ञानी गेरासिमोव अपनी टीम के साथ समरकंद पहुंचे.
जब समरकंद के स्थानीय मुसलमानों को इस बारे में पता चला तो वे बिगड़ गए. उन्होंने ऐसा करने से रोका और चेतावनी दी कि तैमूर की कब्र से एक भयानक श्राप जुड़ा हुआ है. लेकिन कम्युनिस्ट वैज्ञानिक भला किसकी सुनते. रूसी मानव-विज्ञानियों ने इसे अंधविश्वास और बकवास कहकर खारिज कर दिया.
यहां यह जानना जरूरी है कि 1941 में समरकंद सोवियत रूस का हिस्सा था और उसकी ये स्थिति 1991 तक कायम रही.
कब्र से भभककर आई लोहबान की खुशबू
खैर सभी आपत्तियों को दरकिनार कर 16 जून 1941 को कब्र को तोड़ना शुरू कर दिया गया.
19/20 जून को कब्र खोल दी गई. शव से अब भी उन खास खुशबूदार तेलों की महक आ रही थी, जिनसे चार सदी पहले तैमूर के शरीर पर लेप चढ़ाया गया था. इस सुगंध को कुछ लोग लोहबान के रूप में पहचानते हैं.
दुनिया जीतने वाले तैमूर की हड्डियां ताबूत में सूखी पड़ीं थी. वो कंकाल बना हुआ था. लेकिन आश्चर्य, महान आश्चर्य...
तैमूर सचमुच लंगड़ा था. उसकी एक पांव, दूसरे से छोटी थी.
इस ताबूत में जिस चीज ने सभी को हतप्रभ किया वो था- इसके अंदर लिखा एक श्राप.
जो इस तरह था- जो भी मेरी कब्र खोलेगा वो एक ऐसे हमलावर को आजाद कर देगा जो मुझसे भी खतरनाक होगा.
मिखाइल गेरासिमोव की टीम ने स्वाभाविक रूप से एक बार फिर इस श्राप को मध्ययुगीन अंधविश्वास मानकर इसे नजरअंदाज़ कर दिया. तैमूर के शव को निकाला और अपनी रिसर्च के लिए मॉस्को ले गए.
याद करिए उस दौर को. तब तैमूर की तरह हिटलर भी यूरोप पर कहर ढा रहा था. 1939 में द्वितीय विश्वयुद्ध शुरू हो चुका था.
20 जून को तैमूर की कब्र खोदी गई. तीन दिन बाद 22 जून, 1941 को हिटलर ने रूस पर अचानक हमला कर दिया. ये नाजियों का सबसे बड़ा हमला था.
ये ऐसा भयानक खूनी आक्रमण था जिसमें अनुमानित 3 करोड़ रूसी लोगों की जान चली गई. रूस हिटलर के सामने अपनी बर्बादी और बेबसी पर सिसक रहा था.
लेकिन रूसियों को तैमूर की लाश का ख्याल कहां था.
तैमूर के श्राप की कहानी
नाजी सेना जैसै जैसे आगे बढ़ रही थी गेरासिमोव को चिंता होने लगी. उस श्राप का खौफ उस पर हावी होने लगा.उसने स्टालिन को एक मैसेज भेजने की कोशिश की.
एकबार फिर सर्दियां आईं. 1942 की सर्दियां. गेरासिमोव स्टालिन से बात करने में कामयाब रहे. स्टालिन जो खुद बहुत अंधविश्वासी आदमी थे, ने तैमूर की बॉडी को समरकंद वापस ले जाने के लिए एक खास एयरक्राफ्ट का इंतज़ाम किया. तैमूर को फिर से दफनाया जाना था.
नवंबर 1942 में तैमूर की बॉडी को दोबारा दफ़नाया गया और कब्र को ध्यान से दोबारा सील कर दिया गया.
एक बार फिर चमत्कार हुआ.
तारीख गवाह है कि कुछ हफ्ते बाद ही रूसियों ने जर्मनी को द्वितीय विश्वयुद्ध में शिकस्त दे दी. ये थी स्टालिनग्राद की लड़ाई.
लोग इसे इत्तेफाक कहते हैं. लेकिन समरकंद की जनता इसपर आज भी यकीन करती है.
किवदंतियों, कहानियों और गप्पों में इस घटना को तैमूर का श्राप कहा जाता है.
आज तैमूर का मकबरा गुर-ए-अमीर जिसे अब भव्य रूप दे दिया गया है. अभी भी समरकंद में है.
पन्ना लाल