ट्रंप फैक्टर से BRICS में दरार? युद्धाभ्यास में ईरान पर पीछे हटने का दबाव, फंसा साउथ अफ्रीका

BRICS के पहले बहुपक्षीय नौसैनिक अभ्यास ‘विल फॉर पीस’ पर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप का दबाव साफ दिखने लगा है. ईरान को पीछे हटाने की कोशिशों ने BRICS की एकजुटता पर सवाल खड़े कर दिए हैं.

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ईरानी नौसेना का जहाज नघदी केपटाउन के साइमन्स टाउन बंदरगाह पर पहुंचा. ईरानी नौसेना का जहाज नघदी केपटाउन के साइमन्स टाउन बंदरगाह पर पहुंचा.

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 14 जनवरी 2026,
  • अपडेटेड 1:14 PM IST

BRICS देशों के पहले बहुपक्षीय नौसैनिक युद्धाभ्यास 'विल फॉर पीस' पर अब अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की सियासी छाया साफ नजर आने लगी है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, साउथ अफ्रीका ने आखिरी वक्त पर ईरान से इस अभ्यास में अपनी भूमिका सीमित करने या पूरी तरह पीछे हटने को कहा. इसकी वजह ट्रंप का ईरान को लेकर सख्त रुख और उस पर संभावित अमेरिकी कार्रवाई का डर बताया जा रहा है.

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यह नौसैनिक अभ्यास 13 जनवरी से केप टाउन के तट के पास शुरू हुआ है. इसकी मेजबानी चीन कर रहा है और यह BRICS का पहला ऐसा सैन्य अभ्यास है, जिसने पश्चिमी देशों में पहले ही असहजता पैदा कर दी थी. पश्चिमी देशों का सवाल है कि जो समूह एक आर्थिक गठबंधन के तौर पर बना था, उसे सैन्य अभ्यास की जरूरत क्यों पड़ी.

इस विवाद में ईरान की एंट्री ने तनाव और बढ़ा दिया. ईरान 2024 में BRICS में शामिल हुआ था. हालांकि भारत ने इस नौसैनिक अभ्यास से खुद को अलग रखा है.

दबाव के बावजूद ईरान का पलटवार

रिपोर्ट के मुताबिक, ट्रंप द्वारा ईरान के साथ कारोबार करने वाले देशों को चेतावनी दिए जाने और अमेरिका-साउथ अफ्रीका संबंधों के ऐतिहासिक रूप से निचले स्तर पर पहुंचने के बाद प्रिटोरिया सरकार झुकती दिखी. साउथ अफ्रीका ने चुपचाप ईरान से कहा कि वह अभ्यास से हट जाए या सिर्फ पर्यवेक्षक की भूमिका निभाए.

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शुरुआत में ईरान ने इस अनुरोध को मानते हुए खुद को पर्यवेक्षक के तौर पर सीमित करने पर सहमति जताई थी और उसके जहाजों के लौटने की संभावना जताई जा रही थी. लेकिन मंगलवार को तस्वीर बदल गई. रिपोर्ट्स के मुताबिक, एक ईरानी युद्धपोत रूस, चीन, साउथ अफ्रीका और यूएई के जहाजों के साथ समुद्र में निकलता देखा गया. यह पश्चिमी दबाव को खुली चुनौती के तौर पर देखा जा रहा है.

गौरतलब है कि ईरान ने इस अभ्यास के लिए तीन युद्धपोत भेजे हैं, जिनमें एक इस्लामिक रिवोल्यूशनरी गार्ड कॉर्प्स (IRGC) का जहाज भी शामिल है. IRGC पर ईरान में सरकार विरोधी प्रदर्शनों को हिंसक तरीके से कुचलने और 2,000 से ज्यादा लोगों की मौत के आरोप हैं. IRGC पहले से ही पश्चिमी देशों के प्रतिबंधों के दायरे में है.

दिलचस्प बात यह है कि साउथ अफ्रीकी सेना ने सोशल मीडिया पर ईरान की भागीदारी की पुष्टि की थी, लेकिन बाद में वह पोस्ट रहस्यमय तरीके से डिलीट कर दी गई. शुरू से ही यह अभ्यास गोपनीयता के घेरे में रहा है. साउथ अफ्रीका ने ना तो अभ्यास की ज्यादा जानकारी दी और ना ही मीडिया ब्रीफिंग समय पर की.

यहां तक कि चीन ने भी जब अभ्यास की शुरुआत की घोषणा की तो अपनी पोस्ट में ईरान का नाम लेने से परहेज किया. हालांकि साउथ अफ्रीका के उप रक्षा मंत्री बंटू होलोमिसा ने साफ कहा कि यह अभ्यास किसी देश के खिलाफ नहीं है और बढ़ते समुद्री तनाव के दौर में यह जरूरी है. उन्होंने कहा, सिर्फ इसलिए घबराने की जरूरत नहीं कि अमेरिका को कुछ देशों से दिक्कत है. वे हमारे दुश्मन नहीं हैं.

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ट्रंप के दबाव में फंसा साउथ अफ्रीका

इन बयानों के बावजूद साउथ अफ्रीका की स्थिति दो पाटों के बीच फंसी हुई दिखती है. एक तरफ BRICS के प्रति उसकी प्रतिबद्धता है तो दूसरी तरफ ट्रंप को नाराज ना करने की मजबूरी है.

डोनाल्ड ट्रंप ने साउथ अफ्रीका पर 30 फीसदी टैरिफ लगाया है और राष्ट्रपति सिरिल रामाफोसा सरकार पर श्वेत अल्पसंख्यकों की सुरक्षा में विफल रहने का आरोप लगाया है. फिलहाल साउथ अफ्रीका अमेरिका के साथ ट्रेड डील को लेकर बातचीत कर रहा है. स्थानीय मीडिया का कहना है कि इसी वजह से इस नौसैनिक अभ्यास को लो-प्रोफाइल रखा जा रहा है.

इससे पहले अमेरिकी रिपब्लिकन सीनेटर जिम रिश ने साउथ अफ्रीका के इस कदम को अमेरिका के प्रति खुली दुश्मनी करार दिया था. उन्होंने कहा था कि साउथ अफ्रीका गैर-गुटनिरपेक्षता की बात करता है, लेकिन अमेरिकी दुश्मनों के साथ सैन्य अभ्यास करता है. हालांकि साउथ अफ्रीका को अमेरिका की तरफ से एक छोटी राहत भी मिली है. बुधवार को अमेरिका ने अफ्रीका के लिए अपने प्राथमिक व्यापार कार्यक्रम AGOA को तीन साल के लिए बढ़ाने वाले बिल को मंजूरी दी.

BRICS की एकजुटता पर सवाल

पूरे घटनाक्रम ने यह साफ कर दिया है कि अमेरिकी आर्थिक दबाव के सामने BRICS देशों की एकजुटता की भी अपनी सीमाएं हैं. बीते साल से ट्रंप लगातार BRICS को ‘एंटी-अमेरिकन’ करार दे रहे हैं. उन्होंने चेतावनी दी है कि अगर BRICS डॉलर के विकल्प को बढ़ावा देने की कोशिश करता है, तो उस पर 100 फीसदी टैरिफ लगाया जाएगा.

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