ग्वादर में चीन-पाकिस्तान ऐसा क्या कर रहे कि बलोचों ने नेवी बनाकर हमले शुरू कर दिए?

ग्वादर पोर्ट और CPEC को लेकर चीन-पाकिस्तान की बड़ी रणनीति अब बड़े संकट में फंसती दिख रही है. बलोच विद्रोह अब जमीन से निकलकर समुद्र तक पहुंच गया है. आखिर क्यों बढ़ा ये संघर्ष और क्या है इसके पीछे की पूरी कहानी, विस्तार से समझिए...

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BLA ने नेवी बनाई है और पाकिस्तानी सेना पर हमले भी किए हैं. (Photo- ITG) BLA ने नेवी बनाई है और पाकिस्तानी सेना पर हमले भी किए हैं. (Photo- ITG)

एम. नूरूद्दीन

  • नई दिल्ली,
  • 15 अप्रैल 2026,
  • अपडेटेड 1:18 PM IST

पाकिस्तान का बलोचिस्तान लंबे समय से गरीबी और अस्थिरता का शिकार रहा है. लेकिन जब चीन ने चीन-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) के जरिए इस इलाके को अपने वैश्विक व्यापार नेटवर्क का हिस्सा बनाने की योजना बनाई, तब इसे पाकिस्तान के लिए "गेमचेंजर" बताया गया. अरबों डॉलर के निवेश, नई सड़कें, रेल नेटवर्क और बंदरगाह के वादों के बीच एक नई उम्मीद जरूर बनी, लेकिन इसी के साथ एक नया संघर्ष भी पनप चुका था. यह संघर्ष सिर्फ विकास बनाम पिछड़ापन का नहीं, बल्कि पहचान, अधिकार और संसाधनों पर नियंत्रण का बन गया.

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बलोचिस्तान के दक्षिण में स्थित ग्वादर पोर्ट इस पूरे विवाद का केंद्र है. चीन इसे अपने बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI प्रोजेक्ट) का अहम हिस्सा मानता है, जहां से वह सीधे अरब सागर तक पहुंच बना सकता है. इससे चीन को मध्य पूर्व के तेल और वैश्विक व्यापार तक सीधी पहुंच मिलती.

लेकिन बलोचों की नजर में यह प्रोजेक्ट उनके लिए नहीं है. उनका मानना है कि उनकी जमीन ली जा रही है, उनके संसाधनों का इस्तेमाल बाहरी ताकतें कर रही हैं और बदले में उन्हें न तो रोजगार मिल रहा है और क्षेत्र का विकास हो रहा है. ग्वादर शहर, जो कभी एक शांत तटीय कस्बा था अब वहां भारी सैन्य मौजूदगी है, जिससे स्थानीय लोगों में नाराजगी और बढ़ गई.

CPEC: निवेश, कर्ज और बलोचों की नाराजगी

करीब 60 अरब डॉलर से ज्यादा के निवेश वाला CPEC पाकिस्तान की अर्थव्यवस्था को नई दिशा देने के लिए लाया गया था. लेकिन समय के साथ इसके कई नकारात्मक पहलू भी सामने आए. प्रोजेक्ट्स में ज्यादातर काम चीनी कंपनियों और इंजीनियरों को मिला, जबकि स्थानीय लोगों को सीमित अवसर ही मिले.

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इसके अलावा, पाकिस्तान का कर्ज तेजी से बढ़ा और चीन उसका सबसे बड़ा कर्जदाता बना. पारदर्शिता की कमी, प्रोजेक्ट्स में देरी और भ्रष्टाचार के आरोपों ने इस पहल पर सवाल खड़े कर दिए. कई आलोचक इसे "डेब्ट ट्रैप" तक कहने लगे, जिससे बलोचिस्तान में पहले से मौजूद नाराजगी और गहरी हो गई.

CPEC का प्रभाव सिर्फ आर्थिक नहीं, राजनीतिक भी

बलोचिस्तान में नाराजगी सिर्फ आर्थिक कारणों से नहीं है. यह एक गहरी राजनीतिक और सामाजिक समस्या भी है. बलोच लिबरेशन आर्मी (BLA) जैसे संगठन लंबे समय से अलगाववादी आंदोलन चला रहे हैं. उनका आरोप है कि पाकिस्तान सरकार बलोचों के साथ भेदभाव करती है, उनकी आवाज दबाई जाती है और जबरन गायब किए जाने जैसे मामलों ने हालात को और खराब कर दिया है. बलोचों को लगता है कि उनके प्राकृतिक संसाधनों, जैसे कि गैस, खनिज और समुद्री संपत्ति का फायदा उन्हें नहीं मिल रहा. इसी वजह से यह आंदोलन धीरे-धीरे हिंसक रूप लेता गया और अब यह पाकिस्तान और चीन दोनों के लिए बड़ी चुनौती बन चुका है.

समुद्र तक पहुंचा संघर्ष, BLA ने बनाई नौसेना

हालात तब और गंभीर हो गए जब BLA ने अपने नए नौसैनिक विंग हम्माल समुद्री रक्षा बल (HMDF) के गठन का ऐलान किया. यह सिर्फ एक प्रतीकात्मक कदम नहीं, बल्कि रणनीतिक बदलाव है. जिवानी क्षेत्र में गश्ती नौका पर हमले का दावा इस बात का संकेत है कि अब बलोच विद्रोह सिर्फ जमीन तक सीमित नहीं रह गई है. अगर यह रणनीति आगे बढ़ती है, तो ग्वादर पोर्ट और समुद्री व्यापार दोनों के लिए बड़ा खतरा पैदा हो सकता है. यह चीन के लिए भी चिंता का विषय है, क्योंकि उसका पूरा निवेश इसी क्षेत्र की स्थिरता पर टिका हुआ है.

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हालिया हमलों के बाद चीन ने ग्वादर से अपने कर्मचारियों को निकालने और ऑन-ग्राउंड ऑपरेशंस रोकने का फैसला किया. यह कदम दिखाता है कि सुरक्षा स्थिति कितनी गंभीर हो चुकी है. चीन पहले ही अपने निवेश को लेकर सतर्क हो गया है और अब वह बड़े प्रोजेक्ट्स की बजाय छोटे, जल्दी फायदा देने वाले प्रोजेक्ट्स पर ध्यान दे रहा है. इसे "स्मार्ट CPEC" कहा जा रहा है. लेकिन इससे यह भी साफ है कि चीन अब जोखिम कम करना चाहता है.

CPEC की सुरक्षा के लिए पाकिस्तान ने भारी सैन्य तैनाती की है. हजारों सुरक्षाकर्मी, विशेष यूनिट्स और यहां तक कि चीनी सुरक्षा तंत्र भी मौजूद है. लेकिन इसके बावजूद हमले रुक नहीं रहे. यह दिखाता है कि समस्या सिर्फ सुरक्षा की नहीं, बल्कि गहरी नाराजगी की है. जब तक बलोचों की राजनीतिक और आर्थिक मांगों का समाधान नहीं होगा, तब तक यह संघर्ष जारी रह सकता है.

क्या CPEC पाकिस्तान के लिए बन गया बोझ?

जिस CPEC को पाकिस्तान की आर्थिक रीढ़ कहा जा रहा था, वही अब उसके लिए चुनौती बना हुआ है. कर्ज का बोझ, सुरक्षा खर्च और प्रोजेक्ट्स की धीमी प्रगति ने इस प्रोजेक्ट पर सवाल खड़े कर दिए हैं. "क्राउन ज्वेल" कहा जाने वाला ग्वादर पोर्ट अब तक अपेक्षित व्यापारिक गतिविधि नहीं ला पाया है. इससे चीन और पाकिस्तान दोनों के लिए चिंता बढ़ गई है.

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मसलन, ग्वादर और बलोचिस्तान का यह संकट अब एक बड़े भू-राजनीतिक संघर्ष में बदल चुका है. एक तरफ चीन और पाकिस्तान का आर्थिक और रणनीतिक एजेंडा है, तो दूसरी तरफ बलोचों की पहचान और अधिकारों की लड़ाई. अगर इस टकराव का समाधान नहीं निकाला गया, तो यह संघर्ष और गहरा हो सकता है और समुद्र तक फैल सकता है. इससे न सिर्फ पाकिस्तान की स्थिरता प्रभावित होगी, बल्कि पूरे क्षेत्र में अस्थिरता बढ़ सकती है. सवाल अब यह है कि क्या विकास और सुरक्षा के बीच संतुलन बनाया जा सकेगा, या फिर ग्वादर आने वाले समय में एक और बड़े संघर्ष का केंद्र बन जाएगा.

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