बलोचों के मुस्लिम भर होने से कलात (बलूचिस्तान) को पाकिस्तान का हिस्सा नहीं बन जाना चाहिए... 27 मार्च 1948 को जब पाकिस्तान के संस्थापक मोहम्मद अली जिन्ना ने बलूचिस्तान को जबरन कब्जाया तो इसका काफी विरोध हुआ. जिन्ना अपनी ही बातों से मुकर गए. जिस जिन्ना ने बलूचिस्तान को स्वायत्त रहने देने की सलाह दी थी, उन्होंने ही जबरन आजाद बलूचिस्तान को पाकिस्तान में मिला लिया.
पाकिस्तानी इतिहासकार याकूब खान बंगाश अपनी किताब, 'अ प्रिंसली अफेयर' में लिखते हैं, 'आजाद रहने के प्रतिरोध को पाकिस्तान की सरकार ने कुचल दिया और बलपूर्वक कलात को अपने में मिला लिया.'
पाकिस्तान जब आजाद हुआ तब कलात को अलग स्वायत्त प्रदेश की मान्यता मिली थी. 11 अगस्त 1947 को कलात और मुस्लिम लीग के बीच हुए समझौते में बलूचिस्तान एक अलग देश बना लेकिन उसकी सुरक्षा पाकिस्तान के जिम्मे दी गई. 12 अगस्त को बलूचिस्तान के शासक मीर अहमद खान ने अपनी रियासत को एक आजाद देश घोषित किया. लेकिन बलूचिस्तान की आजादी महज 227 दिनों की मेहमान थी.
27 मार्च 1948 को मीर अहमद खान से पाकिस्तान में विलय के पत्र पर हस्ताक्षर कराए गए. उसी दिन से बलूचिस्तान में हिंसा और टकराव का सिलसिला शुरू हुआ, जो आज भी थमा नहीं है.
बीएलए के हमलों से दहल उठा पाकिस्तान
बीते शुक्रवार रात को बलूचिस्तान की आजादी के लिए लड़ रहे हथियारबंद समूह बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) ने प्रांत के करीब एक दर्जन ठिकानों को सिलसिलेवार तरीके से निशाना बनाया. हमले अगले दिन भी जारी रहे और एक के बाद एक हुए इन धमाकों से पाकिस्तान दहल उठा.
करीब 200 बीएलए लड़ाके, जिनमें महिलाएं भी शामिल थीं, ने छोटे-छोटे समूहों में बंटकर एक साथ आत्मघाती धमाके और गोलीबारी की. पुलिस थानों, लोगों के घरों और सेना से जुड़े ठिकानों को निशाना बनाया गया. बीएलए का दावा है कि उसके हमलों में 200 से अधिक पाकिस्तानी सुरक्षाकर्मी मारे गए हैं. लेकिन पाकिस्तान की तरफ से कहा जा रहा है कि हमले में 17 सैनिक और 31 नागरिक मरे हैं.
पाकिस्तानी सेना की जवाबी कार्रवाई में विद्रोही लड़ाकों को भारी नुकसान पहुंचा है. सेना की कार्रवाई में 177 बीएलए लड़ाके मारे गए हैं.
पाकिस्तान के रक्षा मंत्री ख्वाजा आसिफ ने हमले पर बोलते हुए सोमवार को कहा कि बलूचिस्तान में बड़ी संख्या में सैनिकों की तैनाती जरूरी है.
पाकिस्तान की संसद में खड़े होकर आसिफ ने कहा, 'भौगोलिक रूप से बलूचिस्तान पाकिस्तान के 40 प्रतिशत से अधिक क्षेत्र में फैला हुआ है. इसे कंट्रोल करना किसी घनी आबादी वाले शहर से कहीं ज्यादा मुश्किल है. ऐसी जगह को कंट्रोल करने के लिए भारी संख्या में सुरक्षाबलों की तैनाती की जरूरत होती है. हमारे सैनिक वहां तैनात हैं और आतंकियों के खिलाफ कार्रवाई कर रहे हैं, लेकिन इतने बड़े इलाके की निगरानी और वहां पेट्रोलिंग करना बेहद चुनौती भरा है.'
ये वही बलूचिस्तान है जिसके कीमती पत्थर देख ट्रंप की आंखों में आ गई चमक
पिछले साल सितंबर में पाकिस्तान के सेना प्रमुख फील्ड मार्शल आसिम मुनीर प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ के साथ अमेरिका पहुंचे थे. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने व्हाइट हाउस के ओवल ऑफिस में दोनों से मुलाकात की.
इस दौरान मुनीर ने शहबाज शरीफ की मौजूदगी में ट्रंप के सामने एक ब्रीफकेस खोला... ब्रीफकेस खुलते ही बिजनेसमैन राष्ट्रपति ट्रंप की आंखें चमक उठीं. अंदर चमकते कीमती पत्थरों और खनिजों का एक सेट था. मुनीर का यह गिफ्ट ट्रंप को पाकिस्तान की ताजा पेशकश का हिस्सा था. मतलब साफ था कि पाकिस्तान अपने खनिज संसाधनों को अमेरिकी निवेश के लिए खोलने को तैयार है. पाकिस्तान के खनिज संसाधन यानी बलूचिस्तान के खनिज संसाधन.
गैस, सोने, तांबे की खान है बलूचिस्तान
बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा और प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर प्रांत है. पाकिस्तान की कुल जमीन का करीब 44 प्रतिशत हिस्सा बलूचिस्तान है जहां पाकिस्तान के गैस, कोयला, सोना, तांबा का अधिकांश रिजर्व है.
बलूचिस्तान में कीमती पत्थरों की भी भरमार है और पाकिस्तान के कुल कीमती पत्थरों का 90% हिस्सा यही से निकाला जाता है. यहां के संगमरमर काफी मशहूर है जो हाई क्वालिटी के होते हैं. जियारत व्हाइट, ब्लैक एंड गोल्ड मार्बल यहां की पहचान हैं. बलूचिस्तान में रेयर अर्थ मिनरल्स के भी बड़े भंडार हैं.
पाकिस्तान के कुल खनिज संसाधनों का 75% हिस्सा बलूचिस्तान से निकाला जाता है. लेकिन इन संसाधनों से होने वाली आय का बड़ा हिस्सा पाकिस्तान की सरकार के पास जाता है.
बलूचिस्तान का ईरान और अफगानिस्तान एंगल
बलूचिस्तान पाकिस्तान का सबसे बड़ा प्रांत है बावजूद इसके, यहां की आबादी काफी कम है. पाकिस्तान की 25 करोड़ आबादी का केवल छह फीसद हिस्सा यहां रहता है. बलूचिस्तान में बलूच जनजाति की बहुलता है जो यहां के स्थानीय निवासी हैं. कुछ संख्या में पश्तून भी बलूचिस्तान में रहते हैं.
बलूचिस्तान क्षेत्र तीन देशों के बीच बंटा है जिसमें पाकिस्तान का बलूचिस्तान प्रांत, ईरान का सिस्तान-बलूचिस्तान प्रांत और अफगानिस्तान के निमरुज, हेलमंद और कांधार शामिल हैं. दोनों देशों से लगती बलूचिस्तान की सीमाएं हमेशा से अस्थिर रही हैं.
ईरान और पाकिस्तान के बीच यूं तो भाईचारे वाला संबंध रहा है लेकिन दोनों देश एक-दूसरे पर बलूच विद्रोहियों को लेकर आरोप लगाते रहे हैं. ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान में स्थित विद्रोही समूहों को लेकर पाकिस्तान और बलूचिस्तान स्थित समूहों को लेकर ईरान एक-दूसरे पर दोष मढ़ते रहते हैं.
इसी लड़ाई को लेकर 16 जनवरी 2024 को ईरान ने पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में मिसाइल और ड्रोन हमले किए थे. ईरान का दावा था कि उसने बलोच सुन्नी मिलिटेंट समूह जैश अल-अदल के ठिकानों को निशाना बनाया क्योंकि वो ईरान पर हमले कर रहा है.
जवाब में पाकिस्तान ने भी ईरान के सिस्तान-बलूचिस्तान में रॉकेट और मिसाइलों से हमले किए. पाकिस्तान ने दावा किया कि ये हमले उसने बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) और बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट (BLF) के ईरान स्थित ठिकानों पर किए हैं. इन हमलों से दोनों देशों में भारी तनाव देखा गया था. अफगानिस्तान से लगती बलूचिस्तान की सीमा भी लंबे समय से अस्थिर बनी हुई है.
पाकिस्तान लगातार अफगानिस्तान के तालिबान शासन पर आरोप लगाता रहा है कि वो इन सीमाओं से आतंकियों की आवाजाही रोकने में नाकाम रहा है. बलूचिस्तान में अशांति को लेकर पाकिस्तान कभी अफगानिस्तान तो कभी भारत पर बेबुनियाद आरोप लगाता है लेकिन वो यह बात नहीं समझ पा रहा कि बलूचिस्तान की इस हालत के लिए जिम्मेदार खुद वहां की अब तक की सभी सरकारें और सैन्य प्रमुख हैं.
सबसे बड़े और संपन्न प्रांत को पाकिस्तान ने बना दिया सबसे गरीब
19वीं सदी में जब ब्रिटिश सरकार भारत (जिसमें आज का पाकिस्तान, बांग्लादेश शामिल थे) पर राज कर रही थी तब एक कहावत चलन में थी. अंग्रेज कहा करते थे- बलूचों का सम्मान करो, पश्तूनों को खरीद लो, पंजाबियों पर राज करो और सिंधियों को डराकर रखो.'
इस कहावत से एक बात साफ हो जाती है कि बलूचों पर जीत हासिल करना अंग्रेजों के लिए भी मुश्किल था और इसलिए उन्होंने उनके साथ ससम्मान रहने का रास्ता चुना. लेकिन पाकिस्तान की सरकार यह बात समझ नहीं पाई और उन्होंने बलूचिस्तान पर जबरन कब्जा किया. इसी कब्जे का नतीजा पाकिस्तान आजतक भुगत रहा है और बलूच अपने स्वाभिमान के लिए अब तक लड़ रहे हैं.
प्राकृतिक संसाधनों से भरपूर बलूचिस्तान को पाकिस्तान की सरकारों ने सबसे गरीब प्रांत बना दिया. यहां के प्राकृतिक संसाधन पाकिस्तान की सरकार चीन और अब अमेरिका के साथ मिलकर लूट रही है और इसका फायदा बलूचों तक नहीं पहुंच रहा.
पाकिस्तान ने जबरन बलूचिस्तान पर कब्जा तो कर लिया लेकिन वहां के लोगों का मन कभी नहीं पढ़ पाया. बलूच हमेशा से पाकिस्तान की सरकारों से नाराज रहे हैं और विलय के बाद से ही विरोध की आवाज उठती रही है. बलूचिस्तान में विरोध की ज्वाला तब और भड़क गई है जब पाकिस्तान ने चीन को इस क्षेत्र में बड़े प्रोजेक्ट्स दे दिए.
बलूचिस्तान के विलय के बाद से ही शुरू हो गया था विद्रोह
बलूचिस्तान के पाकिस्तान में विलय के बाद से ही प्रांत में विद्रोही आंदोलनों को शुरुआत हो गई. और उस विरोध की मशाल कलात के शासक मीर अहमद खान के भाई प्रिंस करीम खान ने उठाई. उन्होंने बलूच राष्ट्रवादियों का एक दस्ता बनाया और 1948 में ही पाकिस्तान के खिलाफ पहला विद्रोह किया. पाकिस्तान ने बड़े ही बेरहमी से विद्रोह को कुचल दिया और प्रिंस करीम अपने सहयोगियों समेत गिरफ्तार कर जेल भेज दिए गए.
इसके बाद भी बलूच शांत नहीं हुए और उन्होंने अपने हक के लिए लगातार विद्रोह किए. 1950, 1960, 1970 के दशक में विद्रोह हुए. बलूचों के विद्रोह में साल 2000 में तेजी आई. विद्रोह का शुरुआती मकसद प्रांत के संसाधनों में स्थानीय लोगों की हिस्सेदारी बढ़ाना था, लेकिन जल्द ही यह विद्रोह आजादी की मांग में बदल गई.
पाकिस्तानी सरकार के प्रति बढ़ते गुस्से के बीच बलूचिस्तान में कई विद्रोही समूह बन गए. इनमें बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA), बलूचिस्तान लिबरेशन फ्रंट (BLF), बलूच नेशनल आर्मी (BNA), यूनाइटेड बलूच आर्मी (UBA), हिज्ब-उत-तहरीर (HuT) जैसे समूह प्रमुख हैं.
इनमें बीएलए सबसे अधिक सक्रिय है जिसने पाकिस्तान में कई बड़े हमलों को अंजाम दिया है. समूह पाकिस्तानी सेना, उनके ठिकानों, प्रांत में चीनी प्रोजेक्ट्स और उससे जुड़े लोगों को टार्गेट करता है.
बलूचिस्तान में विद्रोह का चेहरा है बीएलए
बलूचिस्तान लिबरेशन आर्मी (BLA) की स्थापना साल 2000 में ही हुई थी और इसकी अगुवाई वरिष्ठ बलूच राष्ट्रवादी नेता नवाब खैर बख्श मरी के बेटे बलाच मरी ने की.
2006 में तत्कालीन सैन्य शासक परवेज मुशर्रफ के दौर में बलूच नेता नवाब अकबर बुगती की हत्या कर दी गई. बुगती बलूचों के बड़े नेता थे और उनकी हत्या ने पूरे बलूचिस्तान को सुलगा दिया. एक साल बाद बलाच मरी भी मारे गए और इसके बाद सरकार ने बीएलए पर प्रतिबंध लगा दिया.
पाकिस्तान की सरकारों ने बलूचिस्तान में विरोध की आवाजों को दबाने के लिए बेहद कड़ा रुख अपनाया. मानवाधिकार संगठनों का आरोप है कि सुरक्षा बलों ने अलगाववादी संगठनों से जुड़े होने या उनके प्रति सहानुभूति रखने के शक में हजारों बलूचों की हत्या की है या उन्हें जबरन गायब कर दिया है. बीएलए ने सरकार के प्रति बलूचों के असंतोष को अपना सबसे बड़ा हथियार बना लिया है.
समय के साथ मजबूत हो रहा BLA
समय के साथ बीएलए ने खुद को ऐसे संगठन के रूप में स्थापित किया है जो बलूचिस्तान की आजादी से कम पाकिस्तान से कुछ लेने पर राजी नहीं है. इस वक्त बीएलए को बशीर जैब बलूच लीड कर रहे हैं और पिछले साल जाफर एक्सप्रेस हाईजैक के पीछे भी वही थे.
इस हाइजैक को 11 मार्च को अंजाम दिया गया था. उन्होंने क्वेटा से उत्तर-पश्चिमी प्रांत खैबर पख्तूनख्वा जा रही जाफर एक्सप्रेस पैसेंजर ट्रेन को हाईजैक कर लिया. ट्रेन में लगभग 400 यात्री सवार थे. घंटों चले ऑपरेशन के बाद यात्रियों को सुरक्षित बचा लिया गया. इस दौरान 31 लोगों की मौत हुई जिनमें बड़ी संख्या में सुरक्षाकर्मी शामिल थे.
पाकिस्तान इंस्टीट्यूट फॉर पीस स्टडीज के मुताबिक, 2025 में बलूचिस्तान में कम से कम 254 हमले हुए, जो पिछले साल के मुकाबले 26 प्रतिशत अधिक थे. इन हमलों में 400 से ज्यादा लोगों की मौत हुई. इनमें से अधिकांश के पीछे बीएलए का हाथ था.
हालिया हमले के संबंध में विल्सन सेंटर के साउथ एशिया इंस्टिट्यूट के डायरेक्टर माइकल कुगेलमैन ने सोशल मीडिया एक्स पर लिखा, 'बलूचिस्तान संकट को सिर्फ मारे गए लड़ाकों की संख्या के नजरिए से देखना नीतिगत नाकामी है. क्योंकि असली सवाल यह है कि इतने सारे लड़ाके पैदा ही क्यों हो रहे हैं. बीएलए ने सरकार के खिलाफ स्थानीय गुस्से का फायदा उठाया है, जिससे उसमें बड़ी संख्या में लड़ाके भर्ती हो रहे हैं और संगठन पहले से ज्यादा मजबूत हुआ है.'
बीएलए के सुसाइड स्कॉड ने मचाई तबाही
2010 में बीएलए ने अपना सुसाइड स्कॉड मजीद ब्रिगेड बनाया. यह दस्ता अपने शुरुआती सालों में एक्टिव नहीं था लेकिन 2018 में बीएलए के तत्कालीन प्रमुख असलम बलोच ने अपने बेटे को ही दल्बंदिन में काम कर रहे चीनी इंजीनियरों पर हमले के लिए भेज दिया. हमले में पांच लोग घायल हुए, जिनमें तीन चीनी नागरिक थे. आत्मघाती हमले में असलम बलोच के बेटे की मौत हो गई.
इसके बाद बीएलए ने चीनी नागरिकों और ठिकानों को निशाना बनाने का सिलसिला तेज किया. नवंबर 2018 में कराची स्थित चीनी वाणिज्य दूतावास पर हमला हुआ, जिसमें दो पुलिसकर्मियों समेत चार लोग मारे गए.
2022 में कराची यूनिवर्सिटी में शरी बलूच नाम की महिला आत्मघाती हमलावर ने चीनी नागरिकों को निशाना बनाया, जिसमें तीन चीनी नागरिकों समेत चार लोगों की मौत हुई. इस हमले के बाद से मजीद ब्रिगेड दुनिया भर में चर्चा में आ गई.
मजीद ब्रिगेड ने शुक्रवार रात और वीकेंड में हुए हमले में भी अहम भूमिका निभाई है. बीएलए ने दो महिला फिदायीन की तस्वीर पोस्ट कर बताया कि वो हमलों में शामिल थीं. इसके बाद बीएलए की ओर से दो और फिदायीन की तस्वीर शेयर की जो कि पति-पत्नी थे.
बलूच विद्रोहियों के निशाने पर क्यों है चीन?
बलूचिस्तान में चीनी राष्ट्रपति शी जिनपिंग के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव (BRI) का फ्लैगशिप प्रोजेक्ट चाइना-पाकिस्तान इकोनॉमिक कॉरिडोर (CPEC) का एक बड़ा हिस्सा है. CPEC प्रोजेक्ट के तहत चीन पाकिस्तान में 62 अरब डॉलर निवेश कर रहा है. इस प्रोजेक्ट का मकसद पाकिस्तान के जरिए दक्षिण-पश्चिमी चीन को अरब सागर से जोड़ना है.
CPEC के तहत चीन बलूचिस्तान के ग्वादर शहर में डीप सी पोर्ट ग्वादर पोर्ट का विकास कर रहा है. चीन ने साल 2002 में ग्वादर पोर्ट का निर्माण शुरू किया जिसने बलूचों के आंदोलन में चिंगारी का काम किया.
चीन ने ग्वादर में पाकिस्तान का सबसे बड़े एयरपोर्ट ग्वादर इंटरनेशनल एयरपोर्ट भी डेवलप भी किया है. इसके अलावा चीन बलूचिस्तान में कई माइनिंग प्रोजेक्ट्स और एनर्जी प्रोजेक्ट्स पर काम कर रहा है.
ग्वादर पोर्ट को मकरान हाइवे से जोड़ने के लिए चीन ने ईस्ट बे एक्सप्रेसवे भी बनाया है. उसने इलाके में रोड नेटवर्क्स का जाल बिछाया है ताकि उसे व्यापार में आसानी हो.
चीन बलूचिस्तान में 1320 मेगावाट का पावर प्रोजेक्ट स्थापित कर कोयले से बिजली भी बना रहा है. चीन के इन प्रोजेक्ट्स को लेकर स्थानीय बलूचों में भारी गुस्सा है. लोगों का कहना है कि विदेशी उनके प्रांत के संसाधनों का दोहन कर रहे हैं और उनके हाथ कुछ नहीं आ रहा है. इसी का नतीजा है कि बीएलए विद्रोही चीनी प्रोजेक्ट्स और चीनी नागरिकों को निशाना बना रहे हैं.
चीन के साथ-साथ अमेरिका की नजर भी है बलूचिस्तान पर
पाकिस्तान बलूचिस्तान के प्राकृतिक संसाधनों का एक हिस्सा अपने सबसे करीबी सहयोगी चीन के साथ बांट रहा है. ऐसे में अमेरिका कहां पीछे रहने वाला था. अमेरिकी राष्ट्रपति ट्रंप ने पिछले साल पाकिस्तान के साथ एक खनिज समझौते पर मुहर लगाई. इस समझौते में अमेरिका की खनन कंपनी USSM शामिल है जिसने सितंबर में पाकिस्तान में खनिज उत्खनन के लिए 50 करोड़ डॉलर के समझौता ज्ञापन पर हस्ताक्षर किया था.
लेकिन पाकिस्तान ने ट्रंप को खनिजों का जो सपना दिखाया है, वो पूरा होगा, कहा नहीं जा सकता है.
जियो-पॉलिटिक्स एक्सपर्ट ब्रह्म चेलानी सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखते हैं, 'ट्रंप के सामने पाकिस्तान ने बलूचिस्तान को अमेरिकी कंपनियों के लिए एक मुनाफे वाला खनन क्षेत्र बताकर पेश किया. लेकिन यह दांव एक गलत धारणा पर टिका था कि स्थिरता बनाई नहीं जाती, बल्कि सिर्फ घोषित कर दी जाती है.'
एक्सपर्ट ने कहा कि किसी भी बड़े माइनिंग प्रोजेक्ट के लिए भारी सुरक्षा व्यवस्था, सैनिकों की तैनाती, नियंत्रित कॉरिडोर और राजनीतिक गारंटियों की जरूरत होगी, ऐसी गारंटियां, जिन्हें पाकिस्तान व्यावहारिक रूप से लागू नहीं कर सकता.
उन्होंने लिखा, 'बलूचिस्तान को एक ओर संसाधनों की खदान के रूप में बेचना और दूसरी ओर उस पर सैन्यीकृत घरेलू उपनिवेश की तरह शासन करना, पाकिस्तान की उसी नीति को दर्शाता है जो विद्रोह को और भड़काती है. ताजा हमला इसी सच्चाई की एक और पुष्टि है.'
विदेश मामलों के जानकार माइकल कुगेलमैन ने भी बीएलए को हमलों पर चेतावनी दी है. उन्होंने लिखा, 'आज बलूचिस्तान में हुए हमले उन सभी के लिए चेतावनी है, खासकर व्हाइट हाउस में बैठे लोगों के लिए, जो पाकिस्तान के क्रिटिकल मिनरल्स में निवेश करना चाहते हैं. बीएलए की सबसे बड़ी शक्ति ही यही रही है कि बाहरी ताकतें स्थानीय संसाधनों का दोहन कर रही हैं.'
बलूचिस्तान को दुबई बनाने का वादा किया था, हाई सिक्योरिटी किले में बदल दिया
पाकिस्तान ने अप्रैल 2015 में जब चीन के साथ CPEC समझौता किया तब कहा कि वो बचूलिस्तान को दुबई बना देगा. लेकिन पाकिस्तान ने बलूचिस्तान में भारी सैन्य तैनाती कर प्रांत को किले में तब्दील कर दिया है. ग्वादर के लोगों का आरोप है कि पाकिस्तान की सरकार ने शहर को हाई सिक्योरिटी वाली जेल में बदल दिया है. चीनी प्रोजेक्ट्स को सुरक्षा देने के लिए शहर में ऊंचे-ऊंचे बाड़ लगाए गए हैं, चीनी श्रमिकों के लिए अलग जगह बनाई गई है, सुरक्षा चौकियां बनाई गई हैं और सड़कों पर भारी पुलिस और सेना की तैनाती है.
ग्वादर के स्थानीय लोगों का कहना है कि उन्हें ग्वादर पोर्ट के आसपास के समुद्र तक नहीं जाने दिया जाता. मछआरे शिकायत करते हैं कि उनके ही समुद्र में उन्हें मछली पकड़ने नहीं दिया जाता.
कुछ समय पहले ब्रिटिश अखबार द गार्डियन से बात करते हुए मछुआरे दाद करीम ने कहा था, 'हमने पूरा समुद्र खो दिया है. ये समंदर अब हमारा नहीं... चीनियों का है.'
राधा कुमारी