बुचर ऑफ बंगाल पर नया विवाद! एक सड़क, तीन किरदार… फिर चर्चा में हसन, हुसैन सुहरावर्दी और गोपाल पाठा

कोलकाता का सुहरावर्दी एवेन्यू किसके नाम पर था. बुचर सुहरावर्दी के नाम पर या फिर शिक्षाविद् सुहरावर्दी. बंगाल में इस सड़क का नाम बदलने से देश में पहचान की राजनीति की चर्चा एक बार फिर शुरू हो गई है.

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कोलकाता के सुहरावर्दी एवेन्यू का नाम अब गोपाल मुखर्जी के नाम पर होगा. (Photo: ITG) कोलकाता के सुहरावर्दी एवेन्यू का नाम अब गोपाल मुखर्जी के नाम पर होगा. (Photo: ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 22 जून 2026,
  • अपडेटेड 5:25 PM IST

एक सड़क, तीन किरदार... और इतिहास की ऐसी बहस, जिसमें 1946 के दंगे, विभाजन की त्रासदी और आज की राजनीति सब एक साथ आ खड़े हुए हैं. कोलकाता की सुहरावर्दी एवेन्यू का नाम बदलकर गोपाल पाठा के नाम पर किए जाने के फैसले ने एक बार फिर तीन नामों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है. ये नाम हैं- हसन सुहरावर्दी, हुसैन शहीद सुहरावर्दी और गोपाल पाठा. 

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विवाद की शुरुआत इस सवाल से हुई कि आखिर जिस सड़क का नाम "सुहरावर्दी एवेन्यू" था, वह किस सुहरावर्दी के नाम पर थी? वर्षों तक कई लोगों ने इसे बंगाल के तत्कालीन प्रधानमंत्री हुसैन सुहरावर्दी के नाम से जोड़ दिया. सुहरावर्दी वही शख्स है जिसे इतिहास 'बंगाल का कसाई- बुचर ऑफ बंगाल' के नाम से जानती है. 

पश्चिम बंगाल की नई बीजेपी सरकार ने इस सड़क का नाम बदलकर गोपाल मुखर्जी यानी कि गोपाल पाठा के नाम पर कर दिया.  सीएम शुभेंदु अधिकारी ने कोलकाता नगर निगम के इस फैसले की खुद तारीफ की. 

लेकिन बीजेपी सरकार के इस फैसले टीएमसी और कांग्रेस हमलावर हो गई. दोनों पार्टियों ने कहा कि बीजेपी को यह पता ही नहीं है कि ये सड़क हुसैन सुहरावर्दी के नाम पर नहीं बल्कि हसन सुहरावर्दी के नाम पर थी. 

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इतिहासकारों के अनुसार हसन शहीद सुहरावर्दी एक प्रसिद्ध विद्वान, डॉक्टर, कला समीक्षक और राजनयिक थे. उनका 1946 की सांप्रदायिक हिंसा से कोई संबंध नहीं था. हसन सुहरावर्दी एक प्रमुख चिकित्सक और 1930 और 1934 के बीच कलकत्ता विश्वविद्यालय के कुलपति थे. 

जिन्ना की धमकी और बंगाल में हिंसा

29 जुलाई 1946 को मुहम्मद अली जिन्ना के नेतृत्व वाली मुस्लिम लीग ने कैबिनेट मिशन योजना को अस्वीकार करते हुए 16 अगस्त 1946 को डायरेक्ट एक्शन डे मनाने का ऐलान किया. पाकिस्तान की मांग को बल देने के लिए हड़ताल और प्रदर्शन का आह्वान किया गया. बंगाल में मुस्लिम लीग की सरकार थी, पीएम थे सुहरावर्दी. उन्होंने इस दिन को छुट्टी घोषित कर दिया. 

16 अगस्त को कलकत्ता में मुस्लिम लीग की रैली के बाद सांप्रदायिक हिंसा भड़क उठी. शुरू में मुस्लिम भीड़ ने हिंदुओं पर हमले किए. लूटपाट, हत्याएं, बलात्कार और आगजनी हुई. सड़कें लाशों से भर गईं. कई जगहों पर हिंदू समुदाय ने ने भी प्रतिकार किया, जिससे हिंसा दोतरफा हो गई. तीन-चार दिनों तक शहर में अराजकता रही. पुलिस और प्रशासन की भूमिका निष्क्रिय रही. 

इस दंगे में मृतकों की संख्या 4,000 से 10,000 के बीच बताई जाती है, हजारों घायल हुए और लाखों बेघर. इसे इतिहास में  “ग्रेट कलकत्ता किलिंग्स” के नाम से जाना गया.

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क्यों सुहरावर्दी को बंगाल का कसाई कहा जाता है 

हसन शहीद सुहरावर्दी और हुसैन शहीद सुहरावर्दी एक ही प्रतिष्ठित बंगाली मुस्लिम परिवार से थे. हसन सुहरावर्दी, हुसैन शहीद सुहरावर्दी के चाचा थे. हुसैन का नाम बंगाल की राजनीति और 1946 के सांप्रदायिक दंगों के संदर्भ में विवादों से जुड़ा है.

हुसैन सुहरावर्दी 1946 में अविभाजित बंगाल का प्रधानमंत्री था. 16 अगस्त 1946 को जिन्ना ने पाकिस्तान बनाने की मांग को लेकर डायरेक्ट एक्शन डे का आह्वान किया. इसके बाद कलकत्ता में भयंकर सांप्रदायिक हिंसा भड़की, जिसमें हजारों लोग मारे गए. इस समय बंगाल में मुस्लिम लीग की सरकार थी और प्रशासन सीधे सुहरावर्दी के अधीन था. 

सुहरावर्दी ने मुस्लिम लीग के "डायरेक्ट एक्शन" अभियान को राजनीतिक संरक्षण दिया, पुलिस और प्रशासन को समय पर सक्रिय नहीं किया तथा हिंसा को रोकने के लिए पर्याप्त कदम नहीं उठाए. इससे हजारों हिंदुओं की जान गई. 

उस समय की रिपोर्टों और बाद के लेखकों ने दावा किया कि प्रशासनिक निष्क्रियता ने दंगों को और भयावह बना दिया. इसी वजह से उनके विरोधियों ने उन्हें "बुचर ऑफ बंगाल" (बंगाल का कसाई) कहना शुरू किया. 

गौरतलब है कि भारत विभाजन के बाद हुसैन सुहरावर्दी पाकिस्तान चला गया. कट्टरपंथी इमेज की वजह से वह पाकिस्तान का प्रधानमंत्री भी बना. 1946 के कलकत्ता दंगे और उसके बाद की हिंसा ने उनकी राजनीतिक विरासत पर ऐसा दाग लगाया कि "बुचर ऑफ बंगाल" की छवि आज तक उनके नाम के साथ जुड़ी हुई है. 

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गोपाल पाठा कौन हैं?

गोपाल पाठा यानी कि गोपाल मुखर्जी 1946 के दंगों के दौरान हिंदू समुदाय की रक्षा करने वाले के रूप में याद किए जाते हैं. उन्होंने स्थानीय युवाओं को संगठित कर प्रतिरोध किया. उनके समर्थक उन्हें "कलकत्ता बचाने वाला" कहते हैं. कोलकाता के एक मांस व्यापारी परिवार से आने वाले गोपाल पाठा ने दंगों के दौरान हिन्दुओं को संगठित किया और मुस्लिम लीग के दंगे का विरोध किया. आलोचक उन्हें एक स्थानीय बाहुबली और हिंसक जवाबी कार्रवाई का प्रतीक मानते हैं. 

TMC, कांग्रेस का प्रतिवार

सुहरावर्दी एवेन्यू का नाम गोपाल मुखर्जी के नाम पर किए जाने की कोलकता नगर निगम के फैसले की तारीफ करते हुए सीएम शुभेंदु ने कहा कि कई दशकों तक हमारे शहर की एक मुख्य सड़क का नाम ऐसे व्यक्ति के नाम पर था जिसने सिर्फ़ राजनीतिक फ़ायदे के लिए मासूम नागरिकों के नरसंहार की साज़िश रची और राज्य की सत्ता का हथियार के तौर पर गलत इस्तेमाल किया. अब इसका नाम बदलकर  गोपाल मुखर्जी के नाम पर रखा जा रहा है, जो एक निडर इंसान थे और जिन्होंने हज़ारों मासूम लोगों की जान बचाने के लिए मुख्य रक्षक की भूमिका निभाई थी. इस तरह एक सच्चे संरक्षक और रक्षक का सम्मान करके आखिरकार ऐतिहासिक न्याय हो सकेगा.

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लेकिन कांग्रेस और TMC ने बीजेपी के इतिहास ज्ञान पर सवाल खड़ा किया. कांग्रेस नेत सुप्रिया श्रीनेत ने फेसबुक पर लिखा कि बीजेपी कोलकाता की एक गली का नाम बदलने पर खुशी मना रही है, जिसका नाम हसन सुहरावर्दी के नाम पर रखा गया था. हसन सुहरावर्दी एक जाने-माने डॉक्टर थे और 1930 से 1934 के बीच कलकत्ता यूनिवर्सिटी के वाइस-चांसलर रहे थे. 

उन्होंने गलती से इसे हुसैन शहीद सुहरावर्दी के नाम पर रखा गया समझ लिया, जो बंगाल का पीएम था और 16 अगस्त, 1946 को हुए 'डायरेक्ट एक्शन डे' के दौरान हुई हत्याओं का मास्टरमाइंड था, और बाद में पाकिस्तान का प्रधानमंत्री बना. कांग्रेस नेता ने पवन खेड़ा ने भी यही बात कही. 

उन्होंने कहा कि वरिष्ठ बीजेपी नेता डॉ. नंद किशोर गर्ग द्वारा लिखी गई इस किताब में प्रधानमंत्री मोदी का संदेश है. इसमें दावा किया गया है कि डॉ. श्यामा प्रसाद मुखर्जी, डॉ. हसन सुहरावर्दी के मुख्य कानूनी सलाहकार और बड़े समर्थक थे.

उन्होंने आगे लिखा, "भक्त-ब्रिगेड को वही करना चाहिए जिसमें वे माहिर हैं, आपस में व्हाट्सएप सत्संग. कृपया देश को अपने बौद्धिक दिवालियापन से बख्श दें."

TMC नेता साकेत गोखले ने बीजेपी पर बरसते हुए कहा कि जब सरकार की कमान पूरी तरह बेवकूफ लोगों के हाथ में होती है तो ऐसा ही होता है.

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उन्होंने कहा, "कोलकाता में सुहरावर्दी एवेन्यू का नाम हसन सुहरावर्दी के नाम पर रखा गया था- जो एक एकेडमिक और आर्ट क्रिटिक थे और कलकत्ता यूनिवर्सिटी के पहले मुस्लिम वाइस-चांसलर भी बने थे. इस सड़क का नाम उनके सम्मान में अप्रैल 1933 में रखा गया था. इस सड़क का नाम हुसैन सुहरावर्दी के नाम पर नहीं रखा गया था, जिसे 'बंगाल का कसाई' कहा जाता है.

 'हम जानते हैं कि BJP को किताबें और ज्ञान पसंद नहीं है. लेकिन एक साधारण ऑनलाइन सर्च से उन्हें यह पता चल सकता था. KMC से लेकर CM ऑफिस तक किसी ने भी सच्चाई जानने की कोशिश नहीं की, यह बात दिखाती है कि BJP सरकार कैसे चल रही है.'

 'बंगाल, जिसका बौद्धिक इतिहास बहुत समृद्ध रहा है, उसे अब दुख की बात है कि ऐसे लोग चला रहे हैं जिन्हें इतिहास, बुद्धिमानी और तथ्यों से नफ़रत है.'

इस तरह सड़क का नाम बदलने का मुद्दा केवल नामपट्टिका बदलने तक सीमित नहीं रहा. यह बंगाल के इतिहास की तीन अलग-अलग स्मृतियों की टक्कर बन गया है. 

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