पश्चिम बंगाल की सियासत में इस वक्त एक बड़ा भूचाल आने की तैयारी है. ममता बनर्जी की पार्टी TMC यानी तृणमूल कांग्रेस के कई सांसद दिल्ली में BJP नेता भूपेंद्र यादव के घर पर जमा हुए. पार्टी ने कहा ये बस एक शिष्टाचार मुलाकात थी. लेकिन जो लोग बंगाल की सियासत को करीब से देखते हैं, वो जानते हैं कि ये 'मुलाकात' नहीं, ये एक बगावत की शुरुआत है.
दिल्ली में BJP नेता भूपेंद्र यादव का घर है. दोपहर को अचानक इस घर पर TMC के कई सांसद पहुंचने लगे. इनमें सबसे बड़ा नाम था सुखेंदु शेखर रॉय का. ये वो नेता हैं जिन्होंने हाल ही में राज्यसभा की अपनी सीट से इस्तीफा दे दिया था. यानी पार्टी छोड़ने का ऐलान पहले ही हो चुका था.
इसके बाद शाम को शताब्दी रॉय के घर टीएमसी के बागी सांसदों की मीटिंग हुई. इस बैठक में खुद बंगाल के मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी शामिल हुए. वहीं, TMC सांसद काकोली घोष का दावा है कि '20 सांसद प्रदेश के विकास के लिए केंद्र सरकार के साथ मिलकर काम करेंगे.'
उनके साथ और कौन थे?
TMC के सांसद जगदीश बसुनिया, प्रसून बनर्जी, शर्मिला सरकार, अरूप चक्रवर्ती और कालीपदा सोरेन भी वहां मौजूद थे. पार्टी ने इसे रूटीन बताया. लेकिन सवाल ये है कि जब आपके अपने सांसद BJP के नेता के घर जाएं और वहां बैठकर लंबी बातचीत करें तो वो 'सौजन्य मुलाकात' कैसे हो सकती है.
सुखेंदु शेखर रॉय ने इस्तीफे में क्या कहा?
जब सुखेंदु शेखर रॉय ने राज्यसभा छोड़ी, तो उन्होंने सीधे ममता बनर्जी की पार्टी पर निशाना साधा. उन्होंने कहा कि पार्टी में तीन बड़ी बीमारियां हैं. पहली - भ्रष्टाचार यानी पैसों की गड़बड़ी और बेईमानी. दूसरी - महिलाओं पर अत्याचार बढ़ रहा है. तीसरी - जो कुछ गलत देखे उसके खिलाफ बोलने की इजाजत नहीं है पार्टी में.
ये बातें बड़ी हैं क्योंकि ये एक अंदर का आदमी बोल रहा था जो सालों तक TMC में रहा और पार्टी की हर बात जानता था.
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ये बगावत अचानक नहीं आई.
ये कोई एक दिन की बात नहीं है. कई महीनों से TMC के अंदर धीरे-धीरे गुस्सा पक रहा था. कई नेता चुपके-चुपके पार्टी से दूरी बनाने लगे थे. बात सिर्फ एक-दो नेताओं की नहीं है.
सियासी गलियारों में जो आंकड़ा फुसफुसाया जा रहा है वो चौंकाने वाला है. कहा जा रहा है कि TMC के करीब 80 में से 60 विधायक ऋतब्रत बंद्योपाध्याय के खेमे की तरफ जा चुके हैं. मतलब पार्टी के तीन-चौथाई विधायक ममता के साथ नहीं हैं.
इसका सबूत क्या है. जब हाल ही में ममता के घर पर बैठकें बुलाई गईं तो बड़े पैमाने पर न्योता गया था. लेकिन ज्यादातर सांसद बहाने बनाकर नहीं आए. बस मुट्ठी भर लोग पहुंचे. ये बहुत बड़ा संकेत है.
ऋतब्रत बंद्योपाध्याय कौन हैं और उनका इसमें क्या रोल है?
ऋतब्रत बंद्योपाध्याय - ये वो नेता हैं जो अब TMC के भीतर के असंतुष्ट नेताओं का चेहरा बन रहे हैं. वो बंगाल विधानसभा में विपक्ष के नेता भी हैं. उन्होंने एक बड़ा खुलासा किया. उन्होंने कहा कि पिछले कुछ दिनों में TMC के कई सांसद उनसे संपर्क में हैं. यहां तक कि जिस रात दिल्ली में ये बैठक हुई, उस रात भी उन्होंने कुछ सांसदों से बात की जो उस वक्त दिल्ली में थे.
अब सोचिए अगर ये सच है तो फिर ये 'अचानक हुई मुलाकात' नहीं थी. इसकी पूरी तैयारी पहले से थी और विपक्ष को इसकी भनक पहले से थी.
दिल्ली में एक साथ सब क्यों थे? ये सबसे बड़ा सवाल है.
असल में दिल्ली में उस वक्त एक साथ कई बड़े किरदार मौजूद थे. ममता बनर्जी खुद दिल्ली में थीं. अभिषेक बनर्जी- TMC के जनरल सेक्रेटरी और ममता के भतीजे - वो भी दिल्ली में थे. सुवेंदु अधिकारी बंगाल के विधानसभा में विपक्ष के नेता वो भी दिल्ली में डेरा डाले थे. और इन सबके बीच सुखेंदु शेखर रॉय BJP के नेता के घर बागी सांसदों के साथ बैठे थे. जब किसी एक शहर में पूरी राजनीति के सारे मोहरे एक साथ हों और उसी वक्त बगावत की खबर आए तो ये महज इत्तेफाक नहीं हो सकता.
फिरहाद हाकिम वाला मामला क्या था?
ये एक और दिलचस्प मोड़ है. फिरहाद हाकिम को ममता का सबसे भरोसेमंद नेता माना जाता है. जिस दिन ममता दिल्ली में थीं, उसी दिन फिरहाद हाकिम ने बंगाल विधानसभा में बागी MLA और नेता प्रतिपक्ष ऋतब्रत बंद्योपाध्याय से एक घंटे की लंबी मुलाकात की. एक घंटे की मुलाकात वो भी ममता के सबसे करीबी आदमी की बागी खेमे के साथ. इसका मतलब क्या निकाला जाए.
दो संभावनाएं हैं. या तो ममता ने फिरहाद को भेजा था यह समझने के लिए कि बगावत की कितनी गहराई है. या फिर ये बातचीत किसी समझौते की कोशिश थी. दोनों में से जो भी हो. इसका मतलब है कि ममता को खतरा गंभीरता से महसूस हो रहा है.
ममता बनर्जी की चुप्पी सबसे बड़ा संकेत
ममता बनर्जी की जब भी दिल्ली यात्रा होती थी तो एक अलग ही हंगामा रहता था. कोलकाता एयरपोर्ट पर जाते वक्त बड़े बयान. दिल्ली में अचानक प्रेस कॉन्फ्रेंस. तीखे बयान. मीडिया से लगातार बातचीत. इस बार कुछ नहीं हुआ.
ममता दिल्ली में INDIA गठबंधन की बैठक में शामिल हुईं. लेकिन मीडिया से बिल्कुल दूरी बनाए रखी. कोई बड़ा बयान नहीं. कोई फायरब्रांड स्टेटमेंट नहीं. बंगाल की सियासत में एक कहावत है कि नेता की ताकत उसकी निकटता से मापी जाती है. जब ममता दिल्ली आती थीं, सांसद और मंत्री उनके आसपास लाइन लगाते थे. इस बार उनके दरवाजे के बाहर शांति थी. जबकि उसी वक्त सुखेंदु शेखर रॉय विपक्षी नेताओं से मिल रहे थे.
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आगे क्या होगा?
अभी तक की तस्वीर यह है कि TMC के अंदर एक बड़ी दरार है. ये दरार कितनी गहरी है ये वक्त बताएगा. दो रास्ते हैं. पहला - पूरी तरह टूट यानी बागी सांसद और विधायक खुलकर अलग हो जाएं और BJP या किसी और के साथ चले जाएं.
दूसरा - कोई समझौता यानी ममता कुछ बागियों की बात मानें और मामला शांत हो जाए. लेकिन जिस तरह से बातें सामने आ रही हैं - चुप्पी, बहाने, भूपेंद्र यादव के घर की बैठक, फिरहाद की लंबी मुलाकात. ये सब मिलाकर एक ही तस्वीर बना रहे हैं. बंगाल की सियासत बदलने वाली है.
तपस सेनगुप्ता