अखिलेश के करीबी से योगी के मंत्री तक: आखिर मनोज पांडे ही क्यों बने BJP की पहली पसंद?

रायबरेली के कद्दावर ब्राह्मण नेता और ऊंचाहार से विधायक मनोज पांडे को योगी कैबिनेट में जगह मिली है. सपा के मुख्य सचेतक रहे पांडे ने राज्यसभा चुनाव में बगावत कर बीजेपी का साथ दिया था. अवध में ब्राह्मण नेतृत्व और सनातन पर कड़े रुख के कारण भाजपा ने उन्हें मंत्री पद नवाजा है.

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ऊंचाहार विधायक मनोज पांडे को योगी कैबिनेट में मिली जगह (Photo- ITG) ऊंचाहार विधायक मनोज पांडे को योगी कैबिनेट में मिली जगह (Photo- ITG)

कुमार अभिषेक

  • लखनऊ ,
  • 12 मई 2026,
  • अपडेटेड 11:16 AM IST

यूपी में मंत्रिमंडल विस्तार हो चुका है. सपा के बागी और ऊंचाहार से तीन बार के विधायक मनोज पांडे को भी योगी कैबिनेट में जगह मिली है. गौरतलब है कि बीजेपी उम्मीदवार रहे संजय सेठ को राज्यसभा पहुंचाने में जिन सपा के विधायकों ने बगावत की थी उनमें कई नाम शामिल हैं. लेकिन जब योगी 2.0 की सरकार का मंत्रिमंडल विस्तार हुआ तो मंत्री पद सिर्फ मनोज पांडे को मिला. हालांकि, मंत्री बनाए जाने के बाद बगावत करने वाले राकेश प्रताप सिंह का दर्द भी छलक गया. राकेश सिंह ने मनोज पांडे को शुभकामनाएं देते हुए कहा कि मंत्री बनने के बाद मैंने उन्हें फोन किया था लेकिन उनका फोन नहीं उठा, ना ही कॉल बैक आया, शायद अब उनकी व्यस्तता बढ़ गई होगी.

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दरअसल, समाजवादी पार्टी के कई विधायकों ने राज्यसभा चुनाव के वक्त बगावत की थी लेकिन सबसे बड़ा कैच तब भी मनोज पांडे ही माने गए थे, क्योंकि मनोज पांडे तब सपा के विधानसभा में मुख्य सचेतक और अखिलेश यादव के बेहद करीबी माने जाते थे. मनोज पांडे ने स्वीकार भी किया है कि अखिलेश यादव ने उनका कहा कभी नहीं टाला, और मुलायम सिंह यादव की कोई बात उन्होंने कभी नहीं काटी, लेकिन मनोज ने सपा छोड़ने की तब जो वजह बताई थी वह सिर्फ स्वामी प्रसाद मौर्य का राम और रामचरितमानस के विरोध का स्टैंड था. बीजेपी ने इस मौके को पकड़ा और मनोज पांडे को लपक लिया.

सपा में रहते हुए मनोज पांडे का भगवान राम और सनातन को लेकर एक कड़क स्टैंड, इसके अलावा रायबरेली और आसपास के इलाकों में ब्राह्मणों पर उनका प्रभाव बीजेपी के लिए बेहद अहम था. हाल में यूजीसी के मद्दे पर बीजेपी जिस तरीके से ब्राह्मणों के निशाने पर आई लेकिन मनोज पांडे यूजीसी बिल के मुद्दे पर ब्राह्मण चेतना के साथ खड़े दिखे. इसने भी यह तय कर दिया था कि योगी कैबिनेट में मनोज पांडे बड़े ब्राह्मण चेहरे के तौर पर दिखाई देंगे, आखिर में वही हुआ.

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मनोज पांडे के प्रभाव का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि अमित शाह दो बार मनोज पांडे के रायबरेली आवास पर आ चुके हैं. सोनिया गांधी भी उनके घर पर आ चुकी हैं. ऐसे में रायबरेली के बड़े ब्राह्मण चेहरे के तौर पर इनकी पहचान स्थापित है. पांडे 2012 से लगातार रायबरेली की ऊंचाहार सीट जीत रहे हैं और वह भी उन विपरीत परिस्थितियों में जब बीजेपी की सुनामी 2017 और 2022 विधानसभा चुनाव में चली थी. 

रायबरेली में मनोज पांडे का सियासी सफर आसान नहीं रहा. मौजूदा विधायक अदिति सिंह के पिता बाहुबली स्वर्गीय अखिलेश सिंह से उनकी अदावत कभी छुपी नहीं रही, दिनेश प्रताप सिंह से छत्तीस का आंकड़ा रहा और दूसरे कई विधायकों से भी उनकी पटरी नहीं बैठी. लेकिन सपा से उनका मोह भंग होना तब शुरू हुआ जब समाजवादी पार्टी ने 2022 चुनाव के पहले स्वामी प्रसाद मौर्य को अपने पार्टी में ले लिया. ऊंचाहार में स्वामी प्रसाद मौर्य और मनोज पांडे की सियासी दुश्मनी किसी से छुपी नहीं थी. यह लड़ाई BJP के पहले बसपा और सपा की अदावत के वक्त से ही है. दोनों ने एक दूसरे को हराने में कोई और कसर कभी नहीं छोड़ी.

मनोज पांडे की राजनीति मुलायम सिंह यादव की छत्रछाया में पली बढ़ी और पनपी. मुलायम उनको युवा नेता के तौर पर मानते रहे. सबसे पहले दर्जा प्राप्त राज्य मंत्री उन्होंने ही बनाया. 2012 में जब अखिलेश यादव की सरकार बनी तो अखिलेश ने उन्हें अपनी कैबिनेट में लिया. कुछ चुनिंदा नेताओं जिनकी पहुंच अखिलेश यादव के घर तक थी उसमें मनोज पांडे का नाम भी है. अखिलेश भी हमेशा पांडे को अपने पिता की तरह ही सम्मान देते रहे. लेकिन इसे मनोज पांडे की महत्वाकांक्षा कहें या फिर स्वामी प्रसाद मौर्य से सियासी अदावत की पराकाष्ठा दोनों के राहें अब जुदा हो चुकी हैं.

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एक और बात...बीजेपी के पास लगभग सभी क्षेत्रों में कोई न कोई चेहरा या नेता था लेकिन अवध में भाजपा के पास कोई चेहरा नहीं था.
बीजेपी को भी मध्य यूपी या अवध में एक ब्राह्मण चेहरे की तलाश थी जो उन्हें मनोज पांडे के तौर पर मिल गई है. बीजेपी को लगता है कि मनोज पांडे के अब पूरी तरीके से बीजेपी के साथ आ जाने और उनके मंत्री बन जाने से वह इस इलाके में ब्राह्मण नेतृत्व की कमी पूरी कर सकेगी और ब्राह्मणों में पनपी कथित नाराजगी को कम करने में सफल होगी.

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