कानपुर के दो घरों में सोमवार दिन तक सब कुछ सामान्य था. गोविंद नगर में एक परिवार दादी की तेरहवीं की तैयारी में जुटा था. वहीं बर्रा में एक मां को उम्मीद थी कि उसका बेटा अगले कुछ दिनों में घर आएगा और हमेशा की तरह उसके साथ बैठकर बातें करेगा. लेकिन शाम होते-होते दोनों घरों की दुनिया बदल चुकी थी.
लखनऊ अग्निकांड में जान गंवाने वाले कानपुर के 28 वर्षीय संयम विज और 25 वर्षीय सूरजभान सिंह सिर्फ दोस्त नहीं थे. दोनों एक ही साथ काम करते थे, साथ सपने देखते थे और जिंदगी से लड़ने की वजह भी लगभग एक जैसी थी. सूरजभान के सिर से पिता का साया पहले ही उठ चुका था. जबकि संयम के पिता कोई बड़ा काम नहीं करते थे. ऐसे में दोनों अपनी मांओं की सबसे बड़ी उम्मीद थे. दोनों ही अपने घरों का भविष्य थे. सूरजभान के घर का दर्द शायद शब्दों में बयान नहीं किया जा सकता. जबकि संयम की दादी का कुछ दिन पहले ही निधन हुआ था. मंगलवार को तेरहवीं का कार्यक्रम था. रिश्तेदार घर पहुंच चुके थे. मां बार-बार यही कह रही थीं कि संयम आते ही होंगे. किसी को क्या पता था कि जिस बेटे का इंतजार हो रहा है, वह अब कभी उस दरवाजे से अंदर नहीं आएगा.
अचानक सब बदल गया
दादी की तेरहवीं के लिए बिछी कुर्सियां और घर में बैठे रिश्तेदार अचानक मातम में बदल गए. एक तरफ दादी के जाने का दुख था, दूसरी तरफ परिवार के जवान बेटे की मौत की खबर. परिवार के लोग बताते हैं कि कुछ घंटे पहले तक जिस घर में धार्मिक रस्मों की तैयारी चल रही थी, वहां शाम होते-होते चीखें गूंजने लगीं. मां ने अकेले संघर्ष करके बेटे को इस मुकाम तक पहुंचाया था. बेटा नौकरी कर रहा था, परिवार संभाल रहा था. मां को उम्मीद थी कि अब घर के कठिन दिन पीछे छूट जाएंगे. लेकिन किस्मत ने ऐसा वार किया कि मां की सारी उम्मीदें एक झटके में बिखर गईं.
सूरजभान की कहानी भी बहुत दर्दनाक
उधर सूरजभान सिंह की कहानी भी कम दर्दनाक नहीं है. उनके पित इस दुनिया में नहीं हैं. घर में मां और छोटा भाई हैं. सूरजभान नौकरी के लिए लखनऊ में रहते थे, लेकिन हर सप्ताह कानपुर जरूर आते थे. मां को उनके आने का इंतजार रहता था. बेटे के पसंद का खाना बनाना और उसके लौटने की राह देखना उनकी आदत बन चुकी थी. इस बार भी मां इंतजार कर रही हैं. फर्क सिर्फ इतना है कि घर के बाकी लोगों को सच्चाई पता है, लेकिन मां को नहीं. परिजनों ने अभी तक उन्हें बेटे की मौत की खबर नहीं दी है. उन्हें डर है कि अचानक इतना बड़ा सदमा उनकी सेहत पर भारी पड़ सकता है. घर में लोग रो रहे हैं, लेकिन मां के सामने खुद को संभाल लेते हैं. मां बार-बार पूछती हैं कि सूरजभान का फोन आया क्या, वह कब आएगा? और हर बार कोई न कोई बहाना बनाकर बात टाल दी जाती है. हादसे ने सिर्फ दो जिंदगियां नहीं छीनीं. बल्कि दो मांओं से परिवार का सहारा छीन लिया.
देते थे दोस्ती की मिसाल
मोहल्ले के लोग बताते हैं कि संयम और सूरजभान की दोस्ती की मिसाल दी जाती थी. दोनों मेहनती थे, मिलनसार थे और अपने परिवारों के लिए कुछ बड़ा करना चाहते थे. शायद किसी ने नहीं सोचा था कि दोनों दोस्तों का नाम एक दिन एक ही शोक संदेश में लिखा जाएगा. आज कानपुर के इन दो घरों में सन्नाटा है. एक मां अपने बेटे का इंतजार कर रही है, दूसरी बेटे की तस्वीर को देखकर रो रही है. और दोनों परिवारों की आंखों में सिर्फ एक सवाल है जिस बेटे के सहारे जिंदगी कट रही थी, उसके बिना अब आगे कैसे जिया जाएगा ?
कई गंभीर सवाल खड़े हो रहे
हादसे के बाद सामने आ रही जानकारियां कई गंभीर सवाल खड़े कर रही हैं. जिस कॉम्प्लेक्स में आग लगी, वहां सुरक्षा मानकों की अनदेखी के आरोप लग रहे हैं. जानकारी के मुताबिक, तीन मंजिला इमारत में बेसमेंट भी बनाया गया था, जबकि प्रवेश और निकास के लिए केवल एक संकरा रास्ता मौजूद था. यही रास्ता आपात स्थिति में लोगों के बाहर निकलने का एकमात्र सहारा था. बताया जा रहा है कि इस रास्ते के ऊपर कई इलेक्ट्रिक पैनल, एग्जॉस्ट फैन और अन्य उपकरण लगाए गए थे, जिससे रास्ता और संकरा हो गया था. सबसे बड़ा सवाल यह है कि बहुमंजिला व्यावसायिक गतिविधियों वाले भवन में कोई वैकल्पिक इमरजेंसी एग्जिट नहीं था. आग लगने के बाद दूसरी मंजिल पर मौजूद लोगों के पास बाहर निकलने का कोई सुरक्षित विकल्प नहीं बचा और देखते ही देखते 15 लोगों की जिंदगी धुएं और लपटों के बीच फंस गई.
एक्शन भी हुआ लेकिन नहीं मिल रहा जवाब
हादसे के बाद पुलिस ने एफआईआर दर्ज कर जांच शुरू कर दी है. मामले में चार नामजद आरोपियों की गिरफ्तारी भी हो चुकी है. शासन स्तर पर आईएएस अधिकारी अमृत अभिजात और आईपीएस अधिकारी प्रवीण कुमार की अगुवाई में विशेष जांच दल (एसआईटी) गठित किया गया है, जो हादसे के हर पहलू की पड़ताल कर रहा है. अब तक लखनऊ विकास प्राधिकरण (एलडीए), बिजली विभाग और फायर विभाग से जुड़े चार अधिकारियों को निलंबित किया जा चुका है. कार्रवाई का सिलसिला जारी है, लेकिन 15 जिंदगियों के चले जाने के बाद सबसे बड़ा सवाल अब भी कायम है. आखिर रिहायशी मानचित्र पर स्वीकृत भवन में व्यावसायिक गतिविधियां कैसे संचालित होती रहीं? सुरक्षा मानकों की निगरानी किसकी जिम्मेदारी थी? क्या समय रहते खामियों पर कार्रवाई होती तो 15 लोगों की जान बचाई जा सकती थी? इन सवालों के जवाब जांच रिपोर्ट में तलाशे जाएंगे, लेकिन फिलहाल लखनऊ के इस अग्निकांड ने प्रशासनिक जवाबदेही, भवन सुरक्षा और निगरानी व्यवस्था पर गंभीर प्रश्नचिह्न खड़े कर दिए हैं.
सिमर चावला