फर्रुखाबाद की गर्म दोपहर है... धूप तेज है, सड़कें तप रही हैं... और इसी बीच एक रेहड़ी धीरे-धीरे आगे बढ़ रही है. उस रेहड़ी पर सामान नहीं है... बल्कि 70 पार की एक बुजुर्ग दादी लेटी हुई हैं. हाथ में छाता है, चेहरे पर मजबूरी की थकान है... और साथ में चल रहा है उनका पोता.
ये कहानी उत्तर प्रदेश के फर्रुखाबाद की है. किशन प्यारी की उम्र करीब 72-73 साल है. पति सरकारी नौकरी में थे, बिजली विभाग में काम करते थे. उनके निधन के बाद पेंशन शुरू हुई. लेकिन वक्त के साथ जिंदगी ने करवट ली और अब हालत ऐसी है कि चलना-फिरना मुश्किल हो गया है. कूल्हे में चोट है, शरीर कमजोर है.
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अब सवाल ये था कि पेंशन कैसे निकले? किशन प्यारी के पोते मनु पाल अपनी दादी को बैंक लेकर जाना चाहते थे, ताकि पेंशन निकल सके. लेकिन हालात आसान नहीं थे- दादी खुद चलकर बैंक तक नहीं जा सकती थीं. पहले मनु बैंक पहुंचे भी, और वहां उन्होंने स्टाफ को दादी की स्थिति समझाई. लेकिन मैनेजर की तरफ से जवाब मिला- पेंशन के लिए व्यक्ति का आना जरूरी है.
अगले दिन मनु ने एक ऐसा फैसला लिया, जिसने सबको सोचने पर मजबूर कर दिया. उन्होंने अपनी दादी को हाथ ठेले पर लिटाया, छाता लगाया, ताकि धूप से बचाव हो सके. गर्मी, धूप और सड़क के बीच एक बुजुर्ग महिला... और उसका पोता पेंशन निकालने के लिए निकल पड़े. इस मामले का वीडियो किसी ने रिकॉर्ड कर लिया और सोशल मीडिया पर डाल दिया. देखते ही देखते वीडियो वायरल हो गया.
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अब लोग दो हिस्सों में बंट गए हैं. एक तरफ वो लोग हैं, जो कह रहे हैं कि ये सिस्टम की सख्ती नहीं, बल्कि संवेदनहीनता है. उनका कहना है कि आरबीआई की गाइडलाइंस के मुताबिक, 70 साल से ऊपर के बुजुर्गों या असहाय लोगों के लिए बैंक खुद घर जाकर प्रक्रिया पूरी कर सकते हैं. दूसरी तरफ लोग इस बात पर भी चर्चा कर रहे हैं कि आखिर एक परिवार को इतना मजबूर क्यों होना पड़ा कि उसे अपनी बीमार दादी को रेहड़ी पर लिटाकर बैंक ले जाना पड़े.
वहीं पोता मनु का कहना है कि उन्होंने मजबूरी में यह कदम उठाया, क्योंकि दादी की हालत ऐसी नहीं थी कि वह खुद चलकर बैंक जा सकें, लेकिन पेंशन जरूरी थी. अब पूरा मामला सोशल मीडिया पर बहस का मुद्दा बन गया है कि जिम्मेदारी किसकी थी, बैंक की, सिस्टम की या हालात की?
फिरोज़ खान