जिंदा मछली निगलने के लिए उमड़ती है भीड़, हैदराबाद की परंपरा फिर चर्चा में

हैदराबाद में हर साल एक ऐसी परंपरा निभाई जाती है, जिसे लेकर आस्था और विज्ञान आमने-सामने नजर आते हैं. 'फिश प्रसादम' नाम की इस परंपरा में लोगों को जिंदा मछली के साथ एक विशेष हर्बल मिश्रण दिया जाता है. समर्थकों का दावा है कि इससे दमा और सांस संबंधी समस्याओं में राहत मिलती है, जबकि वैज्ञानिक समुदाय इसके पक्ष में ठोस प्रमाण नहीं मानता.

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180 साल पुरानी इस परंपरा का आयोजन आमतौर पर मानसून की शुरुआत में किया जाता है (Photo:ITG) 180 साल पुरानी इस परंपरा का आयोजन आमतौर पर मानसून की शुरुआत में किया जाता है (Photo:ITG)

aajtak.in

  • नई दिल्ली,
  • 11 जून 2026,
  • अपडेटेड 11:31 AM IST

भारत में आस्था से जुड़ी कई ऐसी परंपराएं हैं, जो दशकों ही नहीं बल्कि सदियों से चली आ रही हैं. इन्हीं में से एक है हैदराबाद का मशहूर फिश प्रसादम, जिसे लेकर हर साल लाखों लोग तेलंगाना की राजधानी हैदराबाद पहुंचते हैं.

करीब 180 साल पुरानी इस परंपरा का आयोजन आमतौर पर मानसून की शुरुआत में किया जाता है. इस दौरान देश के अलग-अलग राज्यों से लोग हैदराबाद पहुंचते हैं और लंबी कतारों में खड़े होकर फिश प्रसादम प्राप्त करते हैं.

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क्या है फिश प्रसादम?

इस परंपरा में एक छोटी जिंदा मछली के मुंह में एक विशेष हर्बल पेस्ट भरा जाता है. इसके बाद इसे दमा और अन्य श्वसन संबंधी समस्याओं से पीड़ित लोगों को निगलने के लिए दिया जाता है.इस परंपरा को आगे बढ़ाने वाला परिवार दावा करता है कि यह हर्बल फार्मूला पीढ़ियों से उनके पास है और इसे लेने से सांस संबंधी बीमारियों में राहत मिल सकती है.

लाखों लोग क्यों पहुंचते हैं?

फिश प्रसादम लेने वालों का मानना है कि इससे उन्हें दमा के लक्षणों में सुधार महसूस होता है. कई लोग अपने व्यक्तिगत अनुभव शेयर करते हुए कहते हैं कि इस उपचार के बाद उन्हें पहले की तुलना में बेहतर महसूस हुआ.इसी भरोसे के चलते हर साल लाखों लोग इस आयोजन में शामिल होते हैं. कई परिवार तो पीढ़ियों से इस परंपरा का हिस्सा बनते आ रहे हैं.

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डॉक्टर क्या कहते हैं?

हालांकि चिकित्सा विशेषज्ञों की राय इससे अलग है. डॉक्टरों का कहना है कि अब तक ऐसा कोई ठोस वैज्ञानिक प्रमाण उपलब्ध नहीं है, जो यह साबित करे कि फिश प्रसादम दमा का इलाज कर सकता है.

विशेषज्ञों के अनुसार दमा एक जटिल बीमारी है और इसका इलाज वैज्ञानिक रूप से प्रमाणित दवाओं और उपचारों के माध्यम से ही किया जाना चाहिए. वे मरीजों को सलाह देते हैं कि किसी भी वैकल्पिक उपाय को अपनाने से पहले चिकित्सकीय सलाह जरूर लें.

आस्था बनाम विज्ञान की बहस

फिश प्रसादम को लेकर हर साल बहस छिड़ती है. एक ओर इसे आस्था, परंपरा और व्यक्तिगत अनुभवों से जोड़कर देखा जाता है, तो दूसरी ओर वैज्ञानिक समुदाय प्रमाण-आधारित चिकित्सा पर जोर देता है.यही वजह है कि यह आयोजन केवल स्वास्थ्य से जुड़ा विषय नहीं रह जाता, बल्कि आस्था और विज्ञान के बीच चल रही बहस का भी हिस्सा बन जाता है.

क्यों चर्चा में रहती है यह परंपरा?

डिजिटल युग में भी फिश प्रसादम की लोकप्रियता कम नहीं हुई है. हर साल इसके वीडियो और तस्वीरें सोशल मीडिया पर वायरल होती हैं. जिंदा मछली के जरिए दमा से राहत मिलने का दावा लोगों की जिज्ञासा बढ़ाता है और यही कारण है कि यह परंपरा लगातार चर्चा में बनी रहती है.

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चाहे इसे आस्था का विषय माना जाए या विवादास्पद चिकित्सा पद्धति, एक बात तय है कि हैदराबाद का फिश प्रसादम आज भी लाखों लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है.

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