बेलगाम होता AI, अमेरिकी प्रेसिडेंट ट्रंप की सख्ती, कंपनियों की मनमानी नहीं चलेगी

आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस दुनिया भर में बेलगाम होता दिख रहा है. कहीं AI से सीख कर हत्या हो रही है तो कहीं हजारों लोगों की जॉब जा रही है. ऐसे में अमेरिकी सरकार सख्त हो गई है.

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Donald Trump (Photo Reuters) Donald Trump (Photo Reuters)

मुन्ज़िर अहमद

  • नई दिल्ली ,
  • 05 जून 2026,
  • अपडेटेड 5:58 PM IST

दुनिया भर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस यानी AI को लेकर जितनी तेजी से काम हो रहा है, उतनी ही तेजी से अब सरकारें भी सतर्क होती नजर आ रही हैं. खासकर अमेरिका में, जहां AI कंपनियां सबसे आगे हैं, वहां अब सरकार इस तकनीक पर कंट्रोल मजबूत करने की तैयारी में है.

हाल ही में अमेरिकी प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप ने एक बड़ा ऑर्डर साइन किया है, जिसने पूरी टेक दुनिया में हलचल मचा दी है. इस ऑर्डर का सीधा मतलब यह है कि अब कोई भी बड़ी AI कंपनी जब नया और पावरफुल मॉडल लॉन्च करेगी, तो उसे पहले सरकार को उसकी जानकारी देनी होगी.

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यानी अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस सिर्फ कंपनियों के हाथ में नहीं रहेगा, सरकार भी इस पर नजर रखेगी. दरअसल, पिछले कुछ समय में AI तकनीक इतनी तेजी से आगे बढ़ी है कि इसके खतरे को लेकर भी चिंता बढ़ गई है.

डीपफेक, साइबर हमले, गलत जानकारी फैलाने जैसे खतरे अब सिर्फ कल्पना नहीं रहे, बल्कि हकीकत बन चुके हैं. यही वजह है कि अमेरिका अब पहले से तैयारी करना चाहता है.

ट्रंप के इस आदेश में कहा गया है कि जो भी AI मॉडल बहुत ज्यादा ताकतवर हैं, उन्हें लॉन्च से पहले टेस्ट किया जाएगा. यह टेस्ट इस बात के लिए होगा कि कहीं यह तकनीक लोगों के लिए खतरा तो नहीं बन सकती.

इसका एक बड़ा हिस्सा साइबर सिक्योरिटी से जुड़ा है. सरकार चाहती है कि आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का इस्तेमाल किसी देश के खिलाफ साइबर हमले में न हो, या फिर इसका इस्तेमाल गलत तरीके से न किया जाए.

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इस पूरे मामले में एक दिलचस्प बात यह भी सामने आई है कि खुद AI कंपनियां भी पूरी तरह इस नियम के पक्ष में नहीं हैं. OpenAI के हेड सैम ऑल्टमैन ने इस तरह के सरकारी कंट्रोल पर चिंता जताई है. 

नका कहना है कि अगर हर नए मॉडल के लिए सरकार की मंजूरी जरूरी होगी, तो इनोवेशन की रफ्तार धीमी हो सकती है. यानी टेक कंपनियां चाहती हैं कि नियम हों, लेकिन बहुत ज्यादा सख्ती न हो.

इस आदेश का एक और अहम पहलू यह है कि इसमें अर्ली एक्सेस यानी शुरुआती पहुंच की बात भी की गई है. इसका मतलब यह है कि सरकार कुछ चुनिंदा AI मॉडल्स को आम लोगों से पहले एक्सेस कर सकती है, ताकि वह उनकी कैपेसिटी और खतरे को समझ सके.

यह कदम इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि AI अब सिर्फ टेक्नोलॉजी नहीं रहा, बल्कि यह पॉलिटिक्स, सिक्योरिटी और इकॉनमी का हिस्सा बन चुका है. अगर हम पिछले कुछ महीनों की घटनाओं को देखें, तो साफ समझ आता है कि AI को लेकर डर भी बढ़ रहा है और विरोध भी.

कई जगहों पर AI के खिलाफ प्रदर्शन हो रहे हैं. लोग डर रहे हैं कि यह तकनीक उनकी नौकरी छीन सकती है या समाज में गलत जानकारी फैला सकती है. ऐसे में सरकारों पर दबाव है कि वे इस पर नियंत्रण करें.

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टेक कंपनियों का कहना है कि अगर हर चीज पर सरकारी मंजूरी लेनी पड़ेगी, तो नई तकनीक बनाने में समय लगेगा. इससे अमेरिका की बढ़त भी खतरे में पड़ सकती है, खासकर चीन जैसे देशों के मुकाबले. दूसरी तरफ, सरकार का मानना है कि अगर अभी नियम नहीं बनाए गए, तो बाद में हालात कंट्रोल से बाहर हो सकते हैं. यानी AI को लेकर दुनिया अब एक नए मोड़ पर खड़ी है.

एक तरफ तेजी से बढ़ती तकनीक है, जो सब कुछ बदल सकती है. दूसरी तरफ उसके खतरे हैं, जो समाज और सुरक्षा के लिए चुनौती बन सकते हैं. ट्रंप का यह आदेश इसी संतुलन को बनाने की कोशिश है. आने वाले समय में यह देखना दिलचस्प होगा कि क्या कंपनियां इन नियमों को मानती हैं या फिर इसके खिलाफ आवाज उठाती हैं.

 

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