परवरिश में खोट या एल्गोरिथम में खेल? सोशल मीडिया के 'डोपामाइन जाल' में फंसते जा रहे बच्चे, एक मां ने टेक दिग्गजों को कोर्ट में घसीटा

सोशल मीडिया और मोबाइल फोन की बढ़ती लत को लेकर एक बार फिर बहस तेज हुई है. इटली में एक 12 साल की बच्ची की मौत के बाद उसकी मां ने मेटा और टिकटॉक पर आरोप लगाया है कि उनके एल्गोरिथम बच्चों को एडिक्टिव बनाते हैं.

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सोशल मीडिया कंटेंट और एल्गोरिथम पर उठे सवाल (Photo: AI Generated) सोशल मीडिया कंटेंट और एल्गोरिथम पर उठे सवाल (Photo: AI Generated)

आजतक ब्यूरो

  • नई दिल्ली,
  • 19 जून 2026,
  • अपडेटेड 6:34 AM IST

आजकल मोबाइल फोन और सोशल मीडिया की लत इस स्तर तक पहुंच गई है कि लोग इसके लिए कुछ भी कर गुजरने को तैयार हैं. फोन छीन लिया तो फांसी लगा ली, इंस्टाग्राम पर रील्स नहीं बनाने दी तो घर छोड़ दिया. फोन चलाने पर टोका तो अपनों पर ही हाथ उठा दिया.

जब भी हमारे आसपास ऐसी खौफनाक खबरें आती हैं, तो हमारा समाज क्या कहता है? ये सब सोशल मीडिया और मोबाइल की लत की वजह से हो रहा है. ऐसे में लोग मां-बाप को कोसते हैं, खुद को दोषी मानते हैं, परवरिश पर सवाल उठाते हैं. लेकिन ये नहीं सोचते कि इसके लिए सोशल मीडिया कंपनियां, उनका कंटेंट और उनका एल्गोरिथम भी दोषी हो सकता है. मुमकिन है कि सोशल मीडिया आपके बच्चे के दिमाग को हैक कर रहा हो.

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इटली में एक ऐसी घटना हुई, जहां सोशल मीडिया की लत की वजह से एक 12 साल की बच्ची ने जान दे दी. लेकिन यहां उसकी मां ने बेटी की लत को इसके लिए दोषी नहीं माना, बल्कि घातक सोशल मीडिया कंटेंट और जानलेवा एल्गोरिथम को इसके लिए जिम्मेदार माना.

इस मां ने चुपचाप आंसू बहाने के बजाय दुनिया की बड़ी टेक कंपनियों, मेटा और टिकटॉक पर केस ठोक दिया है.

अपनी 12 साल की बेटी की मौत को लेकर इस मां ने मेटा और टिकटॉक पर आरोप लगाया कि इन कंपनियों ने जानबूझकर ऐसा एल्गोरिथम बनाया, जो बच्चों को एडिक्ट बनाता है. यह लत नहीं, बल्कि कंपनियों द्वारा परोसा गया धीमा जहर है, स्लो पॉइजन.

इस मां का सीधा आरोप है कि ये कंपनियां सिर्फ प्लेटफॉर्म नहीं, बल्कि शिकारी हैं, जो बच्चों को एडिक्शन के जाल में फंसाकर खुद अरबों डॉलर कमा रही हैं.

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यह भी पढ़ें: UAE में 15 साल से कम उम्र वालों पर सोशल मीडिया बैन, ऐसा करने वाला पहला अरब देश बना

उसका कहना है कि दोषी बच्चा नहीं है. असली दोषी वह एल्गोरिथम है, जिसे इन कंपनियों ने मासूम दिमागों को अपने वश में करने के लिए बनाया है.

और अगर आपको लगता है कि यह सिर्फ इटली की कहानी है, तो ऐसा नहीं है. भारत में सोशल मीडिया की यह लत अब एक महामारी बन चुकी है.

भारत दुनिया का सबसे बड़ा डेटा कंज्यूमर है. हमारे बच्चे दिन के 24 घंटों में से करीब 5 घंटे रील्स और शॉर्ट्स स्क्रॉल करने में गंवा रहे हैं.

यह लत कोई इत्तफाक नहीं है, इसे बाकायदा डिजाइन किया गया है. हर एक लाइक, हर एक फॉलोवर और हर एक स्क्रॉल बच्चे के दिमाग में डोपामाइन का ऐसा केमिकल छोड़ता है, जिससे बाहर निकलना किसी ड्रग्स की लत से कम नहीं है. औसतन एक टीनेजर दिन में 150 से ज्यादा बार सिर्फ नोटिफिकेशन चेक करता है.

सोशल मीडिया की वजह से हर तीन में से एक युवा एंग्जायटी, डिप्रेशन और नींद न आने की समस्या से जूझ रहा है. सोचिए, इस उम्र में नींद न आना. ICSSR हमारा सोर्स है, जिसके हवाले से यह जानकारी हम आपको बता रहे हैं.

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जब कोई ड्रग्स बेचने वाला पकड़ा जाता है तो सजा पेडलर को मिलती है. फिर सोशल मीडिया के इस डिजिटल ड्रग्स के मामले में कसूरवार सिर्फ बच्चा और माता-पिता ही क्यों माने जाएं? इटली से उठी यह आवाज भारत समेत पूरी दुनिया के लिए एक वेक-अप कॉल है.

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