15 साल की उम्र में कोई खिलाड़ी आईपीएल जैसे मंच पर उतरकर दुनिया के सर्वश्रेष्ठ गेंदबाजों की धज्जियां उड़ा दे, यह सामान्य घटना नहीं है. वैभव सूर्यवंशी ने सिर्फ एक शानदार सीजन नहीं खेला, बल्कि टी20 बल्लेबाजी को एक नए स्तर पर पहुंचा दिया. 776 रन, 237 से अधिक की स्ट्राइक रेट और 72 छक्के- ये आंकड़े किसी अनुभवी सुपरस्टार के नहीं, बल्कि एक ऐसे किशोर के हैं जिसने अभी पूरी तरह शारीरिक परिपक्वता भी हासिल नहीं की है.
भारतीय क्रिकेट के लिए यह गर्व का क्षण है. वैभव जैसी प्रतिभाएं हर पीढ़ी में नहीं आतीं. उनकी बल्लेबाजी में शक्ति से ज्यादा शुद्धता है. उनका बैट स्विंग, संतुलन और शॉट चयन पुराने दौर की क्लासिकल बल्लेबाजी की याद दिलाता है, लेकिन उसकी रफ्तार और आक्रामकता आधुनिक टी20 क्रिकेट की है. कभी उनकी तुलना ग्रेम पोलॉक से होती है, कभी गैरी सोबर्स से और कभी ब्रायन लारा की सहज प्रतिभा से.
... लेकिन इसी चमक के बीच एक असहज सवाल भी खड़ा हो रहा है
ऑस्ट्रेलिया के पूर्व कप्तान और भारतीय टीम के पूर्व कोच ग्रेग चैपल के मुताबिक, वैभव जैसे बल्लेबाजों का उभार सिर्फ व्यक्तिगत प्रतिभा की कहानी नहीं है, बल्कि यह टी20 क्रिकेट के बदलते ढांचे की भी तस्वीर है. चैपल ने हाल के एक कॉलम में कहा है कि खेल का संतुलन लगातार बल्लेबाजों के पक्ष में झुकता जा रहा है.
चैपल का मानना है कि आज का टी20 क्रिकेट कई वजहों से बल्लेबाजों के लिए आसान होता जा रहा है- छोटी बाउंड्री, सपाट पिचें, आधुनिक बल्ले और इम्पैक्ट प्लेयर जैसे नियमों ने गेंदबाजों की चुनौती कम कर दी है. उनके अनुसार, अगर यही रुझान जारी रहा तो आने वाले समय में बड़े स्कोर सामान्य हो जाएंगे और विकेट का महत्व कम होता जाएगा.
उनके मुताबिक, अगर टी20 क्रिकेट को सिर्फ मनोरंजन नहीं, बल्कि एक प्रतिस्पर्धी खेल बनाए रखना है, तो कुछ बड़े बदलाव जरूरी हैं. पिचों पर गेंदबाजों के लिए भी मदद रखनी होगी, इम्पैक्ट प्लेयर नियम पर दोबारा सोचना होगा और गेंदबाजों को कुछ अतिरिक्त विकल्प देने होंगे. वरना स्थिति यह हो सकती है कि 250 रन भी सामान्य लगने लगें और गेंदबाज केवल दर्शक बनकर रह जाएं.
यहां सवाल वैभव सूर्यवंशी पर नहीं है. उनकी प्रतिभा असाधारण है और उन्होंने सिर्फ उन परिस्थितियों का पूरा फायदा उठाया है जो मौजूदा समय में बल्लेबाजों के पक्ष में हैं.
असल बहस क्रिकेट के भविष्य को लेकर है. क्या टी20 क्रिकेट धीरे-धीरे सिर्फ बल्लेबाजों का खेल बनता जा रहा है? और अगर ऐसा है, तो क्या यह वही संतुलन है जिसने क्रिकेट को दशकों तक रोमांचक बनाए रखा?
क्रिकेट ने हमेशा खुद को बदला है, लेकिन उसका आकर्षण बल्ले और गेंद के बीच संतुलन में ही रहा है. अगर यह संतुलन बिगड़ता है, तो वैभव जैसे सितारे तो आते रहेंगे, लेकिन खेल की असली जंग कहीं पीछे छूट सकती है.
वैभव पर सवाल उठाना गलत होगा. उन्होंने सिर्फ उन परिस्थितियों का बेहतरीन इस्तेमाल किया है जो आज बल्लेबाजों के लिए अनुकूल हैं. उनकी प्रतिभा पर कोई संदेह नहीं है, लेकिन किसी खिलाड़ी की असली महानता तब साबित होती है जब वह मुश्किल हालात में भी उतना ही सफल रहे और मजबूत विरोधियों को मात दे.
आजतक स्पोर्ट्स डेस्क